राहुल गाँधी का संविधान, गोडसे और महात्मा गाँधी को लेकर झूठा दावा

बिहार के कटिहार में ‘वोटर अधिकार यात्रा’ के दौरान कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी ने महात्मा गाँधी, नाथूराम गोडसे और भारतीय संविधान को लेकर एक के बाद एक कई झूठ बोले, जिसने उन्हें सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बना दिया है। हाथ में संविधान की लाल किताब लेकर, राहुल गाँधी ने दावा किया कि नाथूराम गोडसे ने महात्मा गाँधी की हत्या इसलिए की क्योंकि वह संविधान से नफरत करता था और महात्मा गाँधी ने इसी संविधान के लिए अपना जीवन दिया।

हालाँकि, उनके ये दावे ऐतिहासिक तथ्यों के आगे टिक नहीं पाते। हकीकत यह है कि जब महात्मा गाँधी की हत्या हुई थी, तब भारतीय संविधान का मसौदा (ड्राफ्ट) भी सामने नहीं आया था। नाथूराम गोडसे को भी संविधान लागू होने से पहले ही फाँसी दी जा चुकी थी। राहुल गाँधी का यह बयान सच्चाई से कोसों दूर है।

महात्मा गाँधी की हत्या और संविधान का अस्तित्व

राहुल गाँधी ने दावा किया कि गोडसे ने महात्मा गाँधी की हत्या इसलिए की, क्योंकि गोडसे संविधान से नफरत करता था और गाँधी जी ने संविधान के लिए अपना पूरा जीवन दिया। यह दावा पूरी तरह से निराधार है।

बता दें कि 30 जनवरी 1948 को नाथूराम गोडसे ने महात्मा गाँधी की हत्या की थी। भारतीय संविधान को भारतीय संविधान सभा ने 26 नवंबर 1949 को अपनाया था और यह 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ था।

इन तारीखों से यह स्पष्ट है कि जब महात्मा गाँधी की हत्या हुई, तब भारत का संविधान अस्तित्व में नहीं था। संविधान का पहला मसौदा (ड्राफ्ट) भी गाँधी जी की हत्या के एक महीने बाद, यानी 21 फरवरी 1948 को प्रस्तुत किया गया था। इस प्रकार, यह कहना पूरी तरह से बेतुका है कि गोडसे ने उस चीज से नफरत की, जो उस समय मौजूद ही नहीं थी और गाँधी ने ऐसी चीज का बचाव किया, जिसका अस्तित्व उनके जीवनकाल में नहीं था।

गोडसे की फाँसी और संविधान का लागू होना

राहुल गाँधी का दूसरा बड़ा झूठ यह था कि गोडसे की नफरत संविधान से थी, जिसके कारण उसने गाँधी जी को गोली मारी। सच्चाई तो यह है कि गोडसे को संविधान लागू होने से पहले ही फाँसी दे दी गई थी।

दरअसल, 15 नवंबर 1949 को नाथूराम गोडसे को महात्मा गाँधी की हत्या के लिए फाँसी दी गई थी। भारतीय संविधान 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ था, यानि गोडसे को फाँसी दिए जाने के दो महीने बाद।

यह तथ्य ही राहुल गाँधी के पूरे कथन को खोखला साबित कर देता है। गोडसे को भारतीय गणराज्य द्वारा संविधान अपनाए जाने से पहले ही सजा मिल चुकी थी। ऐसे में, यह दावा कि उसकी नफरत संविधान से थी, हास्यास्पद है।

महात्मा गाँधी जी और संविधान सभा में उनकी भूमिका

राहुल गाँधी ने यह भी कहा कि महात्मा गाँधी ने संविधान के लिए अपना जीवन दिया। यह बात भी ऐतिहासिक रूप से सही नहीं है। जब 1947 में भारत को आजादी मिली तो महात्मा गाँधी ने खुद को संक्रमण प्रक्रिया से अलग कर लिया था। वह न तो अंतरिम सरकार का हिस्सा थे और न ही संविधान सभा के सदस्य थे। महात्मा गाँधी संविधान सभा का हिस्सा इसलिए नहीं बनना चाहते थे क्योंकि उनका मानना था कि इसका गठन वायसराय ने किया है और यह ब्रिटिश सरकार द्वारा बनाई गई है।

महात्मा गाँधी इसे एक सार्वभौम (Sovereign) सभा नहीं मानते थे। इसलिए उन्होंने खुद को इस प्रक्रिया से दूर रखा और इसमें शामिल नहीं हुए। महात्मा गाँधी ने कुछ विशिष्ट प्रस्ताव जरूर दिए थे, जैसे कि ग्राम-आधारित शासन मॉडल, जिसे ग्राम स्वराज के नाम से जाना जाता है। महात्मा गाँधी के अनुसार, सच्चा लोकतंत्र गाँव की संस्थाओं में निहित होता है, जो आत्मनिर्भर और स्वशासित हों।

संविधान निर्माण का काम मुख्य रूप से डॉ बीआर अंबेडकर की अध्यक्षता में गठित प्रारूप समिति ने किया था। ऐसे में, यह दावा कि महात्मा गाँधी ने संविधान के लिए अपना जीवन दिया, सिर्फ एक राजनीतिक बयानबाजी है जिसका कोई ऐतिहासिक आधार नहीं है।

RSS और बीजेपी पर राहुल गाँधी का आरोप

राहुल गाँधी ने यह भी दावा किया कि RSS और बीजेपी ने संविधान को नहीं बनाया। दरअसल, बीजेपी का गठन 1980 में हुआ था, जबकि संविधान 1950 में लागू हो गया था। इसलिए, बीजेपी की संविधान बनाने में कोई भूमिका नहीं हो सकती। यह एक बेतुका दावा है। RSS एक सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन है और उसकी संविधान निर्माण में कोई भूमिका नहीं थी।

राहुल गाँधी के ये दावे न केवल ऐतिहासिक तथ्यों से परे हैं, बल्कि वे एक बड़ी झूठ की बुनियाद पर टिके हैं। राहुल गाँधी की ये टिप्पणियाँ, जिसमें वह संविधान की प्रति हाथ में लेकर झूठे दावे कर रहे थे, न केवल देश के इतिहास को गलत तरीके से पेश करती हैं, बल्कि महात्मा गाँधी और संविधान के महत्व को भी कम करती हैं। राहुल गाँधी हमेशा से अपने राजनीतिक फायदे के लिए इतिहास को तोड़-मरोड़ के पेश करते हैं, जिसका मजाक वो खुद ही बनकर रह जाते हैं।



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