दिल्ली में हिन्दू विरोधी दंगों में हाईकोर्ट ने क्यों नहीं दी खालिद,शरजील इमाम और अन्य को बेल: तीन आधार बने अहम वजह


शरजील इमाम, उमर खालिद

दिल्ली उच्च न्यायालय ने 2020 में हुए पूर्वोत्तर दिल्ली में हिंदू विरोधी दंगों को लेकर साजिशकर्ता उमर खालिद और शरजील इमाम समेत कई लोगों को बेल देने से मना कर दिया। 2 सितंबर को हाईकोर्ट के फैसले के तीन अहम वजह बताए गए। अपराध की गंभीरता, खुद को पाक साफ साबित करने में असमर्थता और मुकदमे में देरी के आधार पर बेल नहीं दी जा सकती।

बचाव पक्ष ने दावा किया कि खालिद और इमाम शांतिपूर्ण विरोध में शामिल थे

बहस के दौरान, उमर खालिद और शरजील इमाम दोनों के बचाव पक्ष ने दिल्ली उच्च न्यायालय के समक्ष तर्क दिया कि वे केवल शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन में शामिल थे। उन्होंने कहा कि ऐसा कोई सबूत नहीं है, जिससे यह साबित हो सके कि वे उस जगह पर मौजूद थे, जहाँ दंगे भड़के थे। ये भी साबित नहीं हो रहा है कि ये लोग उन बैठकों में शामिल थे, जहाँ हिंसा की साजिश रची गई थी।

उमर खालिद को लेकर बचाव पक्ष ने ये भी दावा किया कि 17 फरवरी 2020 के अमरावती भाषण में उन्होंने ‘शांतिपूर्ण गांधीवादी तरीकों से विरोध’ का आह्वान किया था। हिंसा के लिए कोई उकसावे वाली बात नहीं कही गई थी। शरजील इमाम के वकीलों ने जोर देकर कहा कि उन्हें पहले ही पुलिस ने हिरासत में ले लिया था। मुख्य दंगों से कई हफ्ते पहले, 28 जनवरी 2020 से वह हिरासत में था। इसलिए दंगों की योजना बनाने या अंजाम देने से उसे नहीं जोड़ा जा सकता। उन्होंने गवाहों की विश्वसनीयता को भी चुनौती दी और उनके बयानों को ‘मनगढ़ंत, जबरदस्ती से लिया गया और दोहराया गया’ बताया।

बचाव पक्ष ने आगे तर्क दिया कि अगर कुछ बातों को मान भी लिया जाए, तो यह केवल यूएपीए की धारा 13 के अंतर्गत आएगी, न कि अध्याय IV के गंभीर आतंकवादी अपराधों के अंतर्गत, जिनके लिए धारा 43डी(5) के तहत सख्त प्रतिबंध लागू होते हैं। उन्होंने कई उदाहरणों का हवाला देते कहा कि जब कारावास लंबा हो और मुकदमे का कोई अंत नजर न आए, तो बेल दी जा सकती है।

अभियोजन पक्ष की दलीलें

सॉलिसिटर जनरल और विशेष लोक अभियोजक (Special Public Prosecutor) ने इन दलीलों का कड़ा विरोध किया। उन्होंने तर्क दिया कि यह न तो आकस्मिक थी और न ही स्वतःस्फूर्त। बल्कि दंगे ‘सुनियोजित और रणनीतिक रूप से अमेरिका के राष्ट्रपति की राजकीय यात्रा के समय रची गई थी।”

उन्होंने दिसंबर 2019 में नागरिक संशोधन विधेयक (सीएबी) पारित होने के बाद इमाम और खालिद द्वारा कई व्हाट्सएप ग्रुप बनाने की बात भी कही। इनमें विरोध करने के लिए पर्चे बाँटने, चक्का जाम करने और हिंसा फैलाने का आह्वान किया गया था। साथ ही उन भाषणों का भी जिक्र किया गया, जिनमें हिंसा की बात कही गई थी।

सरकार के मुताबिक, खालिद एक ‘देशद्रोही’ था, जिसने इमाम को विश्वविद्यालयों और मुस्लिम बहुल इलाकों में लोगों को संगठित करने का निर्देश दिया था। 13 दिसंबर 2019 को इमाम के अपने पर्चे में साफ तौर पर मुसलमानों के मताधिकार से वंचित करने की बात कही थी। उसने चक्का जाम करने का आह्वान करते हुए कहा था, “हजारों मुस्लिम युवा दिल्ली को जाम करने के लिए तैयार हैं। इससे अंतर्राष्ट्रीय मीडिया का ध्यान हमारे मुद्दों की ओर आएगा।”

सरकार ने कई गवाहों का हवाला देते हुए कहा कि खालिद और इमाम ने सरकार को ‘मुस्लिम विरोधी’ करार दिया और प्रदर्शनकारियों से सरकार को झुकाने के लिए ‘खून बहाने’ का आग्रह किया।

न्यायालय की अहम टिप्पणियाँ

अपने फैसले में, न्यायमूर्ति नवीन चावला और न्यायमूर्ति शैलिंदर कौर की खंडपीठ ने कहा कि खालिद और इमाम के खिलाफ आरोप प्रथम दृष्टया सही थे। फैसले में इस बात पर जोर दिया गया कि “प्रथम दृष्टया ऐसा प्रतीत होता है कि दिसंबर 2019 की शुरुआत में नागरिकता संशोधन विधेयक पारित होने के बाद, आरोपितों ने सबसे पहले कार्रवाई की, व्हाट्सएप ग्रुप बना कर और पर्चे बाँटकर… आवश्यक आपूर्ति बाधित करने सहित”।

इसके अलावा, फैसले में कहा गया कि बेल की अर्जी देने वालों ने कथित ‘भड़काऊ और उत्तेजक भाषण’ दिए, जो ‘कथित साजिश में उनकी भूमिका’ की ओर इशारा करते हैं।

दंगों से पहले हिरासत में होने के इमाम के दावे और दंगा स्थलों से खालिद की अनुपस्थिति को लेकर भी टिप्पणी की गई। अदालत ने कहा, “केवल अनुपस्थिति उनकी भूमिका को कम करने के लिए पर्याप्त नहीं हो सकती है, क्योंकि उन पर घटनाओं की योजना बनाने और उसे तैयार करने में मुख्य साजिशकर्ता होने का आरोप लगाया गया है।”

फैसले में यूएपीए की धारा 43डी(5) का भी हवाला दिया गया, जिसमें याद दिलाया गया कि एक बार प्रथम दृष्टया आरोप सही लगने पर जमानत पर रोक लग जाती है।

फोरम शॉपिंग और जमानत में देरी में कपिल सिब्बल की भूमिका

दिल्ली उच्च न्यायालय में खालिद की टीम ने तर्क दिया कि उनकी लंबी कैद अक्टूबर 2022 में दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा बेल देने से इनकार करने के बाद विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) पर सर्वोच्च न्यायालय में हुई देरी के कारण हुई। उन्होंने दावा किया कि बार-बार स्थगन और अंततः फरवरी 2023 में एसएलपी वापस लेना कार्यवाही की धीमी गति और परिस्थितियों में बदलाव के कारण हुआ था। उस समय, वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने सर्वोच्च न्यायालय में कहा था कि अब खालिद निचली अदालत में अपनी किस्मत आज़माएँगे।

बचाव पक्ष ने ये साबित करने की कोशिश की कि खालिद देरी के लिए जिम्मेदार नहीं थे, बल्कि अदालती रवैये का शिकार हुए। मुकदमा अभी पूरा नहीं हुआ है, इसलिए जमानत दी जानी चाहिए।

जानबूझकर देरी करने में लगा रहा बचाव पक्ष

अभियोजन पक्ष ने तारीखों और तथ्यों के आधार पर बचाव पक्ष के तर्क को खारिज कर दिया। विशेष लोक अभियोजक अमित प्रसाद ने कहा कि 2023-24 में चौदह में से सात बार सुनवाई बचाव पक्ष के कारण रुकी। अमित प्रसाद ने कहा कि खालिद पक्ष रणनीतिक रूप से स्थगन की माँग करके व्यवस्था का दुरुपयोग कर रहा था।

यह भी बताया गया कि अक्टूबर 2022 में उच्च न्यायालय द्वारा उसकी ज़मानत याचिका खारिज करने के बाद, खालिद ने अप्रैल 2023 में सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाने से पहले लगभग छह महीने तक इंतज़ार किया। सवाल यह भी उठा कि अगर वह वास्तव में देरी से व्यथित था, तो इतना लंबा इंतज़ार क्यों किया?

एसएलपी ने कहा कि वापस लेना देरी के कारण नहीं, बल्कि फोरम शॉपिंग के कारण था। अक्टूबर 2022 से फरवरी 2024 तक, खालिद के वकील कपिल सिब्बल ने बार-बार स्थगन की माँग की और फिर जब यह स्पष्ट हो गया कि न्यायिक माहौल उनके मुवक्किल के पक्ष में नहीं है, तो उन्होंने अपना फैसला वापस ले लिया। इसके अलावा, खालिद के वकील ने सुप्रीम कोर्ट से ज़मानत याचिका वापस लेने के पीछे ‘परिस्थितियों में बदलाव’ को एक कारण बताया।

परिस्थितियों में यह तथाकथित बदलाव दो घटनाओं के साथ हुआ। पहला, न्यायमूर्ति अनिरुद्ध बोस के पद छोड़ने के बाद पीठ में बदलाव हुआ। मामला न्यायमूर्ति बेला त्रिवेदी के बैंच में चला गया। खालिद के वकीलों ने इसका विरोध किया और बार-बार मामलों को डी-टैग और पुनः सूचीबद्ध करने की माँग की।

दूसरा, जनवरी 2024 में यूएपीए के तहत गुरविंदर सिंह मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद कानून में बदलाव आया। इसमें साफ किया गया कि ऐसे मामलों में, ‘जेल सामान्य है और बेल अपवाद।’

अदालत की अहम टिप्पणियाँ

2 सितंबर 2025 के अपने फैसले में दिल्ली उच्च न्यायालय ने उमर खालिद की ज़मानत पर फिर से विचार किया। पीठ ने याद दिलाया कि अक्टूबर 2022 में उच्च न्यायालय ने उनकी ज़मानत याचिका खारिज कर दी थी, जहाँ अदालत ने, सामग्री की जाँच के बाद, उनके खिलाफ प्रथम दृष्टया मामला पाया था। न्यायाधीशों ने जोर देकर कहा कि उनके समक्ष प्रस्तुत तर्क पहले भी उठाए जा चुके हैं और उन पर पहले भी विचार किया जा चुका है और पहले का निष्कर्ष अभी भी सही है।

फैसले में यह भी उल्लेख किया गया है कि खालिद ने सर्वोच्च न्यायालय में एक विशेष अनुमति याचिका दायर की थी, जिसे बाद में उनके वकील के अनुरोध पर ‘परिस्थितियों में बदलाव’ के आधार पर वापस ले लिया गया था। इस वापसी के बाद, उन्होंने निचली अदालत में एक नई ज़मानत याचिका दायर की, जिसमें उन्होंने फिर से देरी और कानून में कथित बदलावों को आधार बनाया।

हालाँकि फैसले में यह स्पष्ट रूप से नहीं कहा गया था कि विशेष अनुमति याचिका वापस लेने का पहले के फैसले पर कोई असर नहीं पड़ा, लेकिन इसके तर्क ने इस प्रभाव को स्पष्ट कर दिया। एक बार फिर यह पुष्टि करते हुए कि खालिद के खिलाफ मामला प्रथम दृष्टया सही था, उच्च न्यायालय ने संकेत दिया कि मंच बदलने या परिस्थितियों में कथित बदलावों का हवाला देकर उसके पहले के फैसले के सार को पलटा नहीं जा सकता।

जेल से बाहर सह-आरोपी द्वारा की गई देरी

ज़मानत की माँग करते हुए, बचाव पक्ष ने बार-बार अनुच्छेद 21 और शीघ्र सुनवाई के अधिकार का हवाला दिया। उन्होंने केए नजीब और अन्य फैसलों का हवाला देते हुए तर्क दिया कि मुकदमे के निष्कर्ष के बिना पाँच साल की कैद अत्यधिक है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि आरोप अभी तय नहीं हुए हैं और 700 गवाहों से पूछताछ होनी है। बचाव पक्ष ने दलील दी, “निकट भविष्य में मुकदमे के समाप्त होने की कोई संभावना नहीं है, इसलिए खालिद को बेल दी जानी चाहिए “

हालाँकि, अभियोजन पक्ष ने अपना विरोध जताया और मुकदमे के रिकॉर्ड का हवाला दिया। तस्लीम अहमद के फैसले में यह कहा गया कि 5 अगस्त 2023 को, धारा 207 सीआरपीसी के तहत अनुपालन पूरा हो गया था और निचली अदालत ने 11 सितंबर 2023 से आरोपों पर दिन-प्रतिदिन सुनवाई का आदेश दिया था। लेकिन जब वह दिन आया, तो ज़मानत पर बाहर आरोपी देवांगना कलिता, नताशा नरवाल और अन्य ने यह कहते हुए आपत्ति जताई कि जाँच अभी भी जारी है।

ट्रायल कोर्ट में कहा गया था कि, “आरोपों पर बहस शुरू करने के लिए पर्याप्त समय दिए जाने के बावजूद, समय पर कोई स्थगन आवेदन दायर नहीं किया गया। अभियुक्तगण बाद में मुकदमे में देरी के आधार पर ज़मानत का दावा करेंगे।” एक हफ़्ते के भीतर, 18 सितंबर 2023 को, मीरान हैदर, अतहर खान, खालिद सैफी, फैजान खान, इशरत जहाँ, शरजील इमाम, सफूरा ज़रगर, सलीम मलिक, शिफा-उर-रहमान, शादाब अहमद और गुलफिशा फातिमा सहित एक ग्रुप ने भी स्थगन की माँग की। इसका मतलब यह था कि अभियोजन पक्ष आरोपों पर बहस करने के लिए तैयार था, फिर भी बचाव पक्ष ने जानबूझकर प्रक्रिया को अवरुद्ध कर दिया।

अभियोजन पक्ष ने जोर देकर कहा कि उमर खालिद और ताहिर हुसैन सहित कुछ अभियुक्तों ने वास्तव में कहा था कि वे 18 सितंबर 2023 को आगे बढ़ने के लिए तैयार हैं। लेकिन देवांगना और नताशा द्वारा दायर आवेदनों ने प्रक्रिया को पटरी से उतार दिया।

मई 2024 में खालिद की ज़मानत खारिज करने वाले सत्र न्यायालय और सितंबर 2025 में दिल्ली उच्च न्यायालय, दोनों ने ही कहा कि देरी की कहानी खोखली थी। उसी दिन आए तस्लीम अहमद मामले के फैसले ने ट्रायल कोर्ट के आदेश पत्रों को फिर से प्रस्तुत करके इस मुद्दे को संदेह से परे कर दिया। 11 सितंबर 2023 और 18 सितंबर 2023 को, देवांगना कलिता और नताशा नरवाल सहित अन्य ने आरोपों पर बहस को रोकने पर आपत्ति जताई। जनवरी से अगस्त 2024 तक, “ज़मानत पाने वाले अभियुक्त इस आधार पर आरोपों पर बहस शुरू नहीं होने दे रहे थे कि जाँच पूरी नहीं हुई है।” 4 अक्टूबर 2024 को, ट्रायल कोर्ट ने कहा, “सहमति से तय कार्यक्रम के बावजूद, कोई भी वकील तैयार नहीं है… किसी भी देरी को अदालत गंभीरता से लेगी।”

इसलिए उच्च न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि बेल पर रहे अभियुक्तों ने ही देरी कराई। तस्लीम अहमद के मामले में, न्यायालय ने कहा, “रिकॉर्ड में मौजूद सामग्री से पता चलता है कि कुछ अभियुक्तों को ज़मानत मिल गई है और कुछ जेल में हैं। जिन अभियुक्तों को ज़मानत मिल गई है, वे इस आधार पर आरोप-पत्र पर बहस में देरी करने की कोशिश कर रहे हैं कि जाँच अभी लंबित है। जमानत पर बाहर आए अभियुक्तों द्वारा जेल में बंद अभियुक्तों की कीमत पर आरोप-पत्र पर बहस में देरी की जा रही है। न्यायालय द्वारा अभियुक्तों के वकीलों को आपस में यह तय करने का निर्देश देने के बावजूद कि अभियुक्तों द्वारा आरोप-पत्र पर बहस कैसे और किस क्रम में आगे बढ़ाई जाएगी, इसको लेकर कोई आम सहमति नहीं दिखती।”

Source: Delhi High Court

ये पूरा घटनाक्रम जानबूझकर किए गए देरी के पैटर्न को उजागर करता है। बेल पर रिहा लोगों ने जाँच पर सवाल उठाते हुए आवेदन दायर करके कार्यवाही में देरी की। उमर खालिद जैसे जेल में बंद लोगों ने उसी देरी को बेल के लिए आधार बनाने की कोशिश की। उच्च न्यायालय ने सभी दलीलें खारिज करते हुए और कहा कि धारा 43डी(5) के तहत प्रतिबंध बरकरार है क्योंकि आरोप प्रथम दृष्टया सत्य थे।

दस्तावेज- उमर खालिद, शरजील इमाम और अन्य की ज़मानत याचिकाओं पर फैसला।

तस्लीम अहमद की ज़मानत याचिका पर फैसला।

(यह लेख मूल रूप से अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

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