गुजरात के दलित-नाई विवाद को मीडिया ने बताया भेदभाव, ऑपइंडिया की रिपोर्ट में निकला आपसी झगड़ा

गुजरात के बनासकांठा जिले के धनेरा तालुका के अलवाड़ा गाँव में दलित समुदाय के साथ नाई की दुकानों पर भेदभाव की खबरें मीडिया में सुर्खियाँ बनीं। टाइम्स ऑफ इंडिया ने दावा किया कि 24 साल के कीर्ति चौहान पहले दलित बने जिन्होंने गाँव में बाल कटवाए, और इसे दशकों पुराने भेदभाव का अंत बताया। लेकिन ऑपइंडिया की जाँच में अलग तथ्य सामने आए।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, गाँव के रहने वाले कीर्ति चौहान पहले दलित बने जिन्होंने गाँव की नाई की दुकान पर बाल कटवाए। अखबार ने लिखा कि उस दिन दलित समुदाय के लिए माहौल स्वतंत्रता दिवस जैसा था।

गाँव की सभी पाँच नाई की दुकानें पहली बार दलितों के लिए खोली गईं। लगभग 6,500 की आबादी वाले इस गाँव में करीब 250 दलित रहते हैं, जिन्हें पीढ़ियों से नाई की दुकानों पर जाने से रोका जाता था। मजबूरन वे बाल कटवाने के लिए दूसरे गाँव जाते थे, कई बार अपनी पहचान छिपाकर। लेकिन पिछले हफ़्ते गाँव में सभी समुदायों के नेताओं की बैठक हुई, जिसमें इस अलिखित सामाजिक प्रतिबंध को हटाने पर सहमति बनी। इसके बाद पहली बार दलितों को गाँव की नाई की दुकानों में बराबरी का हक मिला।

TOI की रिपोर्ट का स्क्रीनशॉट

गुजरात के बनासकांठा जिले के धनेरा तालुका के अलवाड़ा गाँव में दलितों के साथ बाल कटाने को लेकर पीढ़ियों से जारी भेदभाव खत्म हो गया है। अब गाँव के दलित भी पहली बार खुले तौर पर स्थानीय नाई की दुकानों पर बाल कटवा पा रहे हैं।

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में गाँव की दलित युवती कीर्ति चौहान का जिक्र है। भावुक कीर्ति ने कहा “मैं यहाँ बाल कटवाने वाली पहली दलित हूँ। बचपन से ही हमें बाल कटवाने के लिए दूसरे गाँव जाना पड़ता था। अपने 24 साल के जीवन में पहली बार, मैं अपने गाँव में आजाद और स्वीकार्य महसूस कर रही हूँ।”

रिपोर्ट में कार्यकर्ता चेतन डाभी और कुछ अन्य लोगों का नाम भी लिया गया है, जिन्होंने इस पीढ़ियों पुरानी प्रथा को खत्म करवाने में भूमिका निभाई।

गाँव के सरपंच सुरेश चौधरी ने कहा “सरपंच होने के नाते, मुझे इस पुरानी प्रथा पर अफसोस है। गर्व है कि मेरे कार्यकाल में यह समाप्त हुई।” गाँव के एक बुज़ुर्ग छोगाजी चौहान ने याद करते हुए कहा कि उन्हें बाल कटवाने के लिए मीलों पैदल जाना पड़ता था और आजादी से पहले उनके पिता ने भी यही कठिनाई झेली थी।

गाँव के नाई पिंटू नाई ने कहा कि वे पहले सिर्फ समाज के नियमों का पालन करते थे। लेकिन जब बड़े-बुज़ुर्ग मान गए, तो उन्होंने भी दलितों के बाल काटने शुरू कर दिए और कहा कि यह व्यापार के लिए भी अच्छा है।

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट आने के बाद अन्य मीडिया संस्थानों ने भी इसे बड़े पैमाने पर कवर किया। लेकिन रिपोर्टिंग की गुणवत्ता पर सवाल भी उठे कहीं कीर्ति का नाम बदलकर किरण लिख दिया गया, तो कहीं उन्हें महिला बता दिया गया।

कुछ रिपोर्टों में यह तक कहा गया कि आजादी के बाद पहली बार दलितों को गाँव में बाल कटवाने की अनुमति मिली। बाद में गुजराती अखबारों ने भी ऐसी ही खबरें हूबहू प्रकाशित कीं। बीबीसी गुजराती ने भी इस मुद्दे पर रिपोर्ट प्रकाशित की।

उसमें कुछ दलित युवकों और गाँव के नाई के हवाले से कहा गया कि वास्तव में दलितों को नाई की दुकानों पर बाल कटवाने की अनुमति नहीं थी और उन्हें दूसरे गाँव जाना पड़ता था। स्थानीय नाई ने बीबीसी से कहा “हमने दलितों के बाल नहीं काटे क्योंकि गाँव के लोगों से समस्या थी। लेकिन अब समझौता हो गया है और सभी के बाल कट रहे हैं।”

सरपंच ने ऑपइंडिया को क्या बताया

गुजरात के बनासकांठा जिले के अलवाड़ा गाँव में दलितों को नाई की दुकान पर बाल कटवाने से रोके जाने की खबरें मीडिया में तेजी से वायरल हुई थीं। लेकिन ऑपइंडिया की जाँच में इन दावों से अलग सच सामने आया है।

ऑपइंडिया ने गाँव के सरपंच और स्थानीय पुलिस से बात की। दोनों ने स्पष्ट कहा कि गाँव में कभी भी जातिगत भेदभाव नहीं हुआ। यह मामला केवल एक दलित युवक और नाई के बीच हुए झगड़े से जुड़ा था।

गाँव के सरपंच की वास्तविक पदाधिकारी सुरेश चौधरी की पत्नी हैं, जबकि मीडिया ने गलती से सुरेश को ही सरपंच बताया। सुरेश चौधरी ने ऑपइंडिया को बताया “असलियत मीडिया की खबरों से बिल्कुल अलग है। यह सिर्फ दो लोगों का विवाद था, जिसका जाति या समुदाय से कोई संबंध नहीं था। गाँव के दलित हमेशा से स्थानीय दुकानों पर बाल कटवा सकते थे।”

जानकारी के अनुसार, कुछ समय पहले गाँव के एक दलित युवक ने रात करीब 10 बजे नाई को बुलाकर बाल काटने को कहा। नाई ने देर रात काम करने से मना कर दिया, जिसके चलते दोनों के बीच झगड़ा हुआ। मामला थाने तक पहुँचा, लेकिन बाद में पुलिस और सरपंच की मौजूदगी में समझौता हो गया। इसके बाद नाई ने उसी युवक के बाल भी काट दिए और विवाद वहीं खत्म हो गया।

भेदभाव का कोई सवाल ही नहीं: पुलिस

गुजरात के बनासकांठा जिले के अलवाड़ा गाँव में दलितों को नाई की दुकानों पर बाल कटवाने से रोके जाने की खबरों को पुलिस ने खारिज कर दिया है।

धनेरा थाने के पीआई महेश चौधरी ने ऑपइंडिया से बातचीत में कहा “ऐसा कोई मामला नहीं है। गाँव में दलित भी बाकियों की तरह बाल कटवाते रहे हैं। यह सिर्फ दो युवकों के बीच का मामूली विवाद था, जिसे सुलझा लिया गया।”

उन्होंने बताया कि हो सकता है किसी नाई ने व्यक्तिगत विवाद के कारण किसी युवक के बाल काटने से मना कर दिया हो, लेकिन बाद में समझौता हो गया और मामला वहीं समाप्त हो गया।

पुलिस अधिकारी ने यह भी कहा कि उन्होंने दलित समुदाय के लोगों से मुलाकात की है। समुदाय के लोगों ने भी उन्हें साफ बताया कि उन्हें कभी किसी तरह के भेदभाव या परेशानी का सामना नहीं करना पड़ा। पीआई महेश चौधरी के मुताबिक, उनके पास दलित समुदाय के इन बयानों के वीडियो भी मौजूद हैं।

यह खबर मूल रूप से गुजराती में मेघल सिंह परमार ने लिखी है, मूल खबर को इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं।

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