लोकसभा में राहुल गाँधी की ओर से ऑपरेशन सिंदूर पर दिया गया बयान एक ऐसे मौके पर आया, जब देश पहलगाम आतंकी हमले की जवाबी कार्रवाई और एक सफल सैन्य प्रतिक्रिया को लेकर एकमत था।

हालाँकि इस मौके पर राष्ट्रीय एकता की उम्मीदों को दरकिनार करते हुए, गाँधी का भाषण न केवल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर तीखा हमला था, बल्कि भारतीय संप्रभुता, सैन्य प्रतिष्ठा और विदेश नीति की स्थिरता पर भी सीधा प्रहार था।

राहुल ने इस सैन्य ऑपरेशन को महज एक ‘जनसंपर्क अभियान’ बताया। उन्होंने सेना के हाथ बंधे होने का दावा किया और सरकार पर राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी का आरोप लगाया।

इसके पीछे छिपा असली उद्देश्य था- मोदी को उकसाकर उनकी प्रतिक्रिया को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बेतुका दिखाना और अमेरिका जैसे रणनीतिक साझेदारों के साथ भारत की सावधानीपूर्वक बनाई गई विदेश नीति को नुकसान पहुँचाना।

जानबूझकर उकसावे की कोशिश: राहुल का असली निशाना मोदी की अमेरिकी रणनीति

राहुल गाँधी के भाषण का सबसे हैरान करने वाला पल वह था जब उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी को संसद में खुलेआम अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को ‘झूठा’ कहने की चुनौती दी। यह सिर्फ एक तीखा बयान नहीं था, बल्कि एक सोची-समझी चाल थी।

गाँधी का मकसद था मोदी को भावनात्मक रूप से भड़काना, ताकि वे कोई ऐसा जवाब दें जिससे भारत और अमेरिका के बीच बने मजबूत लेकिन नाजुक रिश्तों को नुकसान पहुँचे।

यह बात किसी से छिपी नहीं है कि ट्रंप के दोबारा राष्ट्रपति बनने के बाद से उनका व्यवहार कितना अस्थिर और अप्रत्याशित रहा है। अगर भारत-अमेरिका के रिश्तों में कोई खटास आती है, तो इसका असर सीधे-सीधे भारत की रणनीतिक स्थिति पर पड़ेगा, खासकर ऐसे समय में जब भारत, चीन से बढ़ते तनाव के बीच खुद को पश्चिमी देशों के लिए एक भरोसेमंद और पसंदीदा साझेदार के रूप में सामने रख रहा है।

यहाँ तक कि कॉन्ग्रेस के समर्थक माने जाने वाले पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने भी राहुल गाँधी के बयानों को ‘दिखावा’ कहा और माना कि अगर राहुल खुद प्रधानमंत्री होते, तो शायद ऐसा कुछ नहीं कहते, जैसा वह दूसरों से कह रहे हैं।

हालाँकि, मोदी ने इस उकसावे में नहीं आए और अपनी रणनीतिक समझ और धैर्य का परिचय दिया। मोदी सरकार की विदेश नीति का मकसद है- अमेरिका जैसे ताकतवर देश से एक बराबरी वाले साझेदार की तरह अपनी शर्तों पर बात करना, न कि किसी कमजोर या दबाव में आए देश की तरह उसकी बात को मानना।

आज जब भारत अपनी अर्थव्यवस्था, तकनीक और रक्षा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने की कोशिश कर रहा है, तब एक भी गलत कदम देश को पीछे धकेल सकता है। राहुल गाँधी का ये बयान जवाबदेही से ज्यादा एक तरह की राजनीतिक तोड़फोड़ की कोशिश लगती है। ऐसा प्रयास जिससे सरकार को अंतरराष्ट्रीय मंच पर कमजोर दिखाया जा सके और बाद में उसका राजनीतिक फायदा उठाया जा सके।

मोदी का दृष्टिकोण: संयम, लाभ और रणनीतिक धैर्य

राहुल गाँधी ने प्रधानमंत्री मोदी पर जो ‘साहस की कमी’ का आरोप लगाया, वह पूरी तरह गलत साबित हुआ। इसके उलट, ऑपरेशन सिंदूर एक सटीक, शांत और सोच-समझकर किया गया सैन्य कदम था, जो अच्छे नेतृत्व और दूरदर्शी रणनीति का उदाहरण है।

पहलगाम में हुए आतंकवादी हमले के सिर्फ 48 घंटे के अंदर भारत ने पाकिस्तान के कब्जे वाले इलाकों में एक सटीक सैन्य कार्रवाई की, जिसमें कई आतंकी ठिकाने तबाह कर दिए गए। प्रधानमंत्री मोदी ने संसद में साफ बताया कि यह कार्रवाई किसी अंतरराष्ट्रीय दबाव में आकर नहीं रोकी गई, बल्कि इसलिए रुकी क्योंकि पाकिस्तान खुद पीछे हट गया और दया की गुहार लगाने लगा।

पीएम मोदी ने यह भी कहा कि इस दौरान किसी भी वैश्विक नेता ने भारत को रोकने की कोशिश नहीं की। जब अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने उन्हें सैन्य ब्रीफिंग के बीच फोन किया, तो मोदी का जवाब साफ था: “अगर वे हमें रोकना चाहते हैं, तो इसकी उन्हें भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। हम गोली का जवाब गोले से देंगे।”

भारत ने इस पूरे अभियान में संयम दिखाया। उसने आम नागरिकों या शहरों को निशाना नहीं बनाया, बल्कि आतंक के खिलाफ सटीक जवाब दिया। इस तरह भारत ने न सिर्फ अपनी ताकत दिखाई, बल्कि तनाव बढ़ने से भी बचा और अपनी अंतरराष्ट्रीय साख भी बनाए रखी। यही असली नेतृत्व होता है, सोच समझकर किया गया एक मजबूत फैसला।

अमेरिका के साथ रिश्तों को लेकर भी यही समझदारी दिखती है। न्यूयॉर्क टाइम्स के एक लेख में बताया गया है कि कैसे दुनिया के नेता ट्रंप जैसे अस्थिर स्वभाव वाले नेता से डील करने के लिए चापलूसी, रणनीतिक चुप्पी और सीमित असहमति का इस्तेमाल कर रहे हैं ताकि अपने देश के लिए बेहतर सौदे हासिल कर सकें।

जो देश ट्रंप से सीधे टकराते हैं, उन्हें नुकसान भी झेलना पड़ता है। इसका उदाहरण यूक्रेन है, जहाँ राष्ट्रपति जेलेंस्की से विवाद के बाद अमेरिका ने कुछ समय के लिए यूक्रेन को हथियार भेजना रोक दिया, जबकि वह पहले से रूस के साथ जंग में फँसा हुआ था।

ऐसे में भारत का संयम दिखाना कमजोरी नहीं, बल्कि एक रणनीतिक ताकत है। जहाँ जवाब भी दिया गया और भविष्य के लिए रिश्तों को भी संभाल कर रखा गया।

ग्लोबल साउथ, रूस और स्वतंत्रता की पुनर्परिभाषा

सबसे अहम बात यह है कि प्रधानमंत्री मोदी की विदेश नीति का मकसद सुर्खियों में आना या दिखावा करने का नहीं है, बल्कि इसका असली लक्ष्य है भारत की ऐतिहासिक रूप से पश्चिम पर रही निर्भरता को कम करना और देश को एक आत्मनिर्भर, स्वतंत्र ताकत बनाना।

पहली बात, भारत खुद को ‘ग्लोबल साउथ’ यानी विकासशील देशों की आवाज के रूप में पेश कर रहा है। इसके तहत वह अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और आसियान देशों के साथ रिश्ते मजबूत कर रहा है। साथ ही, ब्रिक्स जैसे समूहों को और मजबूत करके उन्हें पश्चिमी देशों के दबदबे के एक संतुलन के रूप में खड़ा कर रहा है।

दूसरी बात, भारत और रूस के बीच रिश्ते केवल पुरानी दोस्ती की वजह से नहीं टिके हुए हैं, बल्कि ये पूरी तरह से व्यवहारिक सोच पर आधारित हैं। जब यूक्रेन युद्ध के दौरान अमेरिका और यूरोप ने भारत से उम्मीद की कि वह उनके लगाए प्रतिबंधों का साथ दे, तब भारत ने एक तटस्थ और स्वतंत्र रुख अपनाया। इससे कई पश्चिमी सरकारें नाराज भी हुईं, लेकिन भारत ने साफ कर दिया कि वह अब किसी का मोहताज नहीं है न ही किसी के दबाव में आने वाला देश है।

तीसरी और शायद सबसे अहम बात यह है कि मोदी सरकार ने चुपचाप लेकिन ठोस कदमों के साथ भारत में टेक्नोलॉजी और डेटा संप्रभुता की नींव रखनी शुरू कर दी है। यह आज की दुनिया में बेहद जरूरी और रणनीतिक रूप से अहम मुद्दा है। कॉन्ग्रेस ने या तो इस पर ध्यान नहीं दिया, या फिर विदेशी कंपनियों और ताकतों के साथ समझौता कर लिया।

इन तीनों पहलुओं से साफ होता है कि मोदी की विदेश नीति भारत को एक आत्मनिर्भर, मजबूत और सम्मानित वैश्विक ताकत बनाने की दिशा में आगे बढ़ रही है।

तकनीकी संप्रभुता: पश्चिम की सेंसरशिप मशीन से सबक

यूक्रेन युद्ध ने एक कड़वी सच्चाई को सबके सामने ला दिया है, जिसे भारत अब नजरअंदाज नहीं कर सकता। बड़ी अमेरिकी टेक कंपनियाँ जैसे मेटा, गूगल, यूट्यूब और एप्पल, सिर्फ बिजनेस नहीं करतीं, बल्कि वे अमेरिका की विदेश नीति का हिस्सा बन चुकी हैं। इन कंपनियों ने अपने एल्गोरिदम का इस्तेमाल करके लोगों की बातों को दबाया, कंटेंट को सेंसर किया और ऐसे नैरेटिव बनाए जो वाशिंगटन की रणनीति के हिसाब से फिट बैठते हों।

सोचिए, अगर कल भारत का अमेरिका से किसी मुद्दे जैसे व्यापार, टैरिफ या कश्मीर पर मतभेद हो जाए, तो क्या गारंटी है कि ये टेक कंपनियाँ भारत की आवाज को दबाने या भारत विरोधी बातें फैलाने में इस्तेमाल नहीं होंगी? ये कोई कल्पना नहीं है, बल्कि दुनिया में पहले से हो चुका है। मोदी सरकार ने इस खतरे को समय रहते समझ लिया है और इसके खिलाफ तैयारी शुरू कर दी है।

इंडिया स्टैक, डिजिटल इंडिया एक्ट और सेमीकॉन इंडिया मिशन- ये सब केवल डिजिटल प्रगति के नाम पर नहीं हो रहे, बल्कि इनका असली मकसद है भारत को तकनीकी रूप से आत्मनिर्भर बनाना और विदेशी कंपनियों की पकड़ को कमजोर करना।

सरकार अब डेटा को देश के भीतर रखने (डेटा लोकलाइजेशन), सीमाओं के पार डिजिटल डेटा के प्रसार पर सख्ती और ओपन-सोर्स तकनीक पर आधारित पब्लिक डिजिटल प्लेटफॉर्म को बढ़ावा दे रही है। यह सब इसलिए किया जा रहा है ताकि भारत की डिजिटल आजादी और सुरक्षा किसी बाहरी दबाव में न आ कर अपनी शर्तों पर बनी रहे।

नयारा मामला: भारत की संप्रभुता की लड़ाई, एक-एक क्षेत्र में

इस पूरे संघर्ष का एक साफ उदाहरण नायरा मामला है, जिसमें भारत ने अपने अहम राष्ट्रीय बुनियादी ढाँचे पर विदेशी कंपनियों से नियंत्रण वापस लेने की कोशिश की। बाहर से देखने पर यह बस एक निजी ऊर्जा सौदे जैसा लगता है, लेकिन असल में यह भारत की संप्रभुता और आत्मनिर्भरता से जुड़ा मामला है।

सरकार का मकसद साफ है, यह सिर्फ निवेश की बात नहीं है, बल्कि यह तय करना है कि कोई भी विदेशी पूँजी या कंपनी इतनी ताकतवर न बन जाए कि वह भारत के अंदर राजनीतिक फैसलों को प्रभावित कर सके या सरकार पर दबाव बना सके।

चाहे बात ऊर्जा की हो, डेटा की या फिर रक्षा क्षेत्र की भारत अब यह संदेश साफ दे रहा है- देश का भविष्य भारत खुद तय करेगा, न कि विदेशी निवेशक या विदेशी सरकारें।

कॉन्ग्रेस और अमेरिकी डीप स्टेट: समर्पण का इतिहास

विडंबना यह है कि भारत की मौजूदा विदेश नीति पर सवाल उठाने का सबसे कम हक अगर किसी को है, तो वह कॉन्ग्रेस पार्टी को है। नेहरू के समय में भारत ने गुटनिरपेक्ष नीति अपनाई, लेकिन असल में यह नीति रणनीतिक गहराई देने के बजाय सिर्फ अमेरिका को नाराज करने का कारण बनी।

बाद में इंदिरा गाँधी के सोवियत संघ से गहरे रिश्तों ने अमेरिका की नजरों में भारत को और संदिग्ध बना दिया। लेकिन असली झुकाव तो यूपीए-2 सरकार के समय दिखा, जब कॉन्ग्रेस ने अमेरिकी ‘डीप स्टेट’ के सामने पूरी तरह झुकने का रवैया अपना लिया। निगरानी सहयोग (सर्विलांस), व्यापार में छूट और नीति संबंधी फैसलों में अमेरिका को खुश करने की कोशिश साफ नजर आई।

विकीलीक्स द्वारा सामने आए दस्तावेजों से यह भी साफ हुआ कि उस समय अमेरिकी दूतावास भारत के नीति-निर्माण वाले गलियारों में कितनी गहराई तक घुसा हुआ था। आज, मोदी सरकार उसी असंतुलित विरासत को संतुलित करने की कोशिश कर रही है।

भारत को आत्मनिर्भर और स्वतंत्र रणनीतिक सोच वाला देश बनाने के लिए। लेकिन दूसरी तरफ राहुल गाँधी वही बातें दोहरा रहे हैं जो विदेशी मीडिया, पश्चिमी फंड से चलने वाले NGO, और जॉर्ज सोरोस जैसे विवादित अंतरराष्ट्रीय चेहरों से जुड़ी थिंक टैंक संस्थाएँ फैला रही हैं।

चाहे वो जानबूझकर कर रहे हों या अनजाने में, पर राहुल ऐसी ताकतों की मदद कर रहे हैं जो नहीं चाहतीं कि भारत एक मजबूत, आत्मनिर्भर और निर्णय लेने में स्वतंत्र देश बने। वे भारत को फिर से कमजोर, दबाव में रहने वाला और विदेशों पर निर्भर बनाना चाहते हैं और राहुल की बातें उसी दिशा में जाती दिखती हैं।

ऑपरेशन सिंदूर दुनिया के लिए एक संदेश था, और यह तोड़फोड़ भी एक संदेश है

राहुल गाँधी जब ऑपरेशन सिंदूर को सिर्फ एक प्रचार का हथकंडा बताते हैं, तो वह सिर्फ प्रधानमंत्री मोदी पर हमला नहीं कर रहे, बल्कि वे हमारे सशस्त्र बलों के हौसले और बलिदान को भी छोटा दिखा रहे हैं।

वे इस सैन्य अभियान की सफलता को नज़र अंदाज़ कर रहे हैं, उन जवानों के साहस और त्याग को कमतर बता रहे हैं जिन्होंने अपनी जान जोखिम में डालकर इस मिशन को पूरा किया। इतना ही नहीं, यह कहकर कि भारत ने झिझक दिखाई, राहुल दुश्मन को गलत संदेश दे रहे हैं और उनका हौसला बढ़ा रहे हैं।

जैसा कि प्रधानमंत्री मोदी ने मंगलवार को लोकसभा में बहुत साफ शब्दों में कहा, “भारत ने जो ठान लिया था, वह हासिल करके दिखाया। हमारी सेना ने यह सुनिश्चित किया कि पाकिस्तान आने वाले दशकों तक इस सबक को कभी न भूले।”

राहुल गाँधी जिस बात को ‘राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी’ कह रहे हैं, असल में वह एक तरह की अराजकता फैलाने की कोशिश है। यह कोई सामान्य असहमति नहीं है। यह राष्ट्रीय हितों के साथ किया गया एक गंभीर विश्वासघात है।

उनकी यह बयानबाज़ी किसी साहस या सोच से नहीं, बल्कि राजनीति में खुद को जरूरी बनाए रखने की हताशा से भरी है। इसके लिए अगर देश को अनावश्यक विवादों में धकेलना पड़े या भारत को फिर से बाहरी ताकतों के दबाव में झुकाना पड़े तो भी उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता।

मोदी संप्रभु भविष्य का निर्माण कर रहे हैं, राहुल औपनिवेशिक अतीत बेच रहे हैं

ऑपरेशन सिंदूर मोदी की छवि चमकाने के लिए नहीं था। यह दुनिया को एक साफ संदेश देने के लिए था।
मेसैज साफ था: भारत जवाब देगा, लेकिन अपनी शर्तों पर। भारत आतंकवाद से लड़ेगा, लेकिन विदेशी ताकतों या पूंजीपतियों को खुश करने के लिए नहीं। भारत अपनी संप्रभुता की रक्षा करेगा, ना कि उसे किसी के साथ ‘समझौते’ में सौंप देगा।

जहाँ प्रधानमंत्री मोदी चुपचाप लेकिन मजबूती से भारत की तकनीकी, कूटनीतिक और आर्थिक आजादी की नींव रख रहे हैं, वहीं राहुल गाँधी संसद में सिर्फ गुस्सा निकालने और नारेबाज़ी करने में लगे हैं। वो चाहते हैं कि भारत ठोस नीति बनाए बिना शोर मचाए लेकिन इससे देश को कोई फायदा नहीं होगा।

ये साहस नहीं, बल्कि एक तरह की मिलीभगत है। ऐसे लोगों के साथ, जो नहीं चाहते कि भारत अपने पैरों पर खड़ा हो। लोकसभा में राहुल गाँधी के कुछ डायलॉग पर उनके समर्थक इंटरनेट पर तालियाँ जरूर बजा सकते हैं, लेकिन भारत का भविष्य अब ऐसे ‘वायरल पलों’ से तय नहीं होगा।

भारत अब खुद फैसले करता है, वो जमाना गया जब वाशिंगटन में बैठकर भारत के लिए नीतियाँ लिखी जाती थीं। अब देश शोर या ड्रामे से नहीं, बल्कि रणनीति, आत्मनिर्भरता और स्थिर नेतृत्व से आगे बढ़ रहा है और एक हताश ‘राजकुमार’ की यह दिखावटी कोशिशें भारत की इस रफ्तार को नहीं रोक सकतीं।

यह रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी में जिनित जैन ने लिखी है। जिसको पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करे। हिंदी में इसका अनुवाद विवेकानंनद मिश्र ने किया है।

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