22 अक्टूबर, 2022 को केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह 61 वर्ष के हो जाएँगे। सरकारी नौकरियों में ये भले ही रिटायरमेंट की उम्र हो, राजनीति में व्यक्ति इस उम्र के बाद और सक्रिय दिखने लगता है। 75 वर्ष के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विदेश यात्राएँ करते हैं, रैलियाँ करते हैं, सरकार व पार्टी की बैठकों में हिस्सा लेते हैं और रणनीतियाँ बनाते हैं। ऐसे में कोई नेता अगर रिटायरमेंट की बात करे तो लोगों का चौंक जाना स्वभाविक है।
हालाँकि, जब अमित शाह रिटायरमेंट की बात करते हैं तो हैरानी नहीं होनी चाहिए। दूर की रणनीतियाँ बनाने वाले और हर क़दम गणना करके रखने वाले अमित शाह ने ज़रूर सोच रखा होगा कि किस उम्र व किन परिस्थितियों में उन्हें रिटायर होना है। राजनीति में रिटायरमेंट जैसा कुछ नहीं होता, फिर भी अमित शाह अगर इसका जिक्र करने का साहस करते हैं तो ये बताता है कि क्यों अमित शाह, अमित शाह हैं। आइए, जानते हैं पूरा माजरा क्या है।
क्या है अमित शाह का रिटायरमेंट प्लान?
असल में गुजरात, मध्य प्रदेश और राजस्थान की महिलाओं और सहकारी कार्यकर्ताओं के साथ अमित शाह ने ‘सहकर संवाद’ आयोजित किया था। जुलाई 2021 में ही नए सहकारिता मंत्रालय का गठन किया गया था। इससे पहले सहकारिता के क्षेत्र में राजनीतिक परिवारों का दबदबा हुआ करता था, जिसे तमाम सुधारों के जरिए अमित शाह ठीक करने की कोशिश में जुटे हैं। अमित शाह ने महिलाओं के साथ संवाद करते हुए कहा कि रिटायरमेंट के बाद वो वेद-उपनिषद का अध्ययन करेंगे और प्राकृतिक खेती करेंगे।
उन्होंने कहा, “मैंने तो तय किया है कि मैं जब भी रिटायर हो जाऊँगा, मैं बाक़ी का जीवन वेद, उपनिषद और प्राकृतिक खेती के लिए ख़र्च करूँगा। ये प्राकृतिक खेती एक वैज्ञानिक प्रयोग है, जिसके कई फायदे हैं। फर्टिलाइजर वाला गेहूँ खाने से कैंसर होता है, रक्तचाप और डायबिटीज बढ़ता है, थायराइड की समस्या आती है। शरीर को स्वस्थ रखने के लिए बगैर फर्टिलाइजर वाला भोजन करना, मतलब दवाइयों की ज़रूरत नहीं। मैंने मेरे खेत पर प्राकृतिक खेती आजमाई, जिससे उत्पादन डेढ़ गुना बढ़ गया।”
अमित शाह जी का पोस्ट-रिटायरमेंट प्लान – वेद, उपनिषद और प्राकृतिक खेती
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— BJP (@BJP4India) July 9, 2025
अक्सर हमारे देश की समस्या ये रही है कि यहाँ विदेश से पढ़कर आने वालों को ही नीतिज्ञ माना गया। भारत के सनातन साहित्य को लेकर हमें हीनभावना से ही ग्रसित रखा गया। ऐसे में वेद-उपनिषद की बात करने वाले अमित शाह के बारे में एक नई बात जान लीजिए। उनकी बात को मजाक में मत लीजिए। 1980 के दशक में वेदांत के विद्वान वामदेव के पाँव दबाकर अमित शाह ने धर्म-दर्शन की बारीकियाँ सीखी हैं। ऋषि सेवा का ही फल है उनकी सफलता!
कुशल राजनेता व रणनीतिकार के पीछे छिपा है वेदांत का अध्येता
अब तक आपने अमित शाह को राजनीति करते, चुनाव जीतते, अनुच्छेद-370 हटाने और CAA लाने जैसे ऐतिहासिक फ़ैसले लेते हुए देखा होगा। भारत में नक्सलवाद के अंत का पूरा श्रेय भी उन्हें ही जाने वाला है। अब तक आपने अमित शाह को संगठन के पेंच कसते, देशभर में घूम-घूमकर मंडल कार्यकर्ताओं से लेकर मुख्यमंत्रियों तक की बैठक लेते और रैलियों में गरजते देखा होगा। लेकिन, रणनीतिकार व दूरदृष्टा अमित शाह के पीछे एक वेदांत दर्शन का अध्येता छिपा हुआ है!
उन्होंने कई दिनों तक वामदेव की सेवा की। वो वामदेव नामक ब्राह्मण ही थे जिन्होंने उन्हें महाकुंभ में हिस्सा लेने के लिए कहा था और अमित शाह ने ऐसा किया भी। इसके पीछे ऋषि का उद्देश्य यह था कि अमित शाह अधिक से अधिक संख्या में साधु-संतों से संवाद करके भारतीय धर्म-दर्शन को सीखें, जानें, समझें। यही हुआ भी! अमित शाह गुरु की बात मानकर कुंभ में शामिल हुए।
एक रोचक बात जानिए अब। प्रत्येक सुबह वामदेव अपने शिष्य को एक हस्तलिखित पर्ची देते थे। उस पर्ची को रोज़ अलग-अलग संतों के पास लेकर जाना होता था। उसमें अमित शाह के लिए सिफ़ारिश होती थी। इस तरह अमित शाह रोज़ किसी न किसी नए संत के साथ समय व्यतीत करते थे, भंडारे में खाते और दक्षिणा इकट्ठा किया करते थे। अमित शाह पैरवी लगाते थे, लेकिन किसी पद या किसी वित्तीय फ़ायदे के लिए नहीं — ज्ञान के लिए, सनातन धर्म को समझने के लिए।
और हाँ, क्या आपको पता है वो दक्षिणा के पैसे का क्या करते थे? उन्होंने उन सिक्कों को जमा करके एक साइकल ली। उस साइकल से वो कुंभ में घूमते थे, सनातन के हर रूप का अवलोकन करते थे। हरिद्वार में 1986 में आयोजित हुए कुंभ में यूँ तो 2 लाख श्रद्धालु थे, लेकिन उनमें एक 21 साल का वो युवक भी था जो आगे चलकर इस देश के इतिहास को बदलने के क्रम का हिस्सा बनने वाला था। 21 साल का वो लड़का, जो स्वामी वामदेव के शिविर में रहकर संतों-महंतों से सीख रहा था।
विजयराजे सिंधिया को तो जानते होंगे आप? वही, ग्वालियर की राजमाता। ज्योतिरादित्य सिंधिया की दादी। एक दिन उनके शिविर से अमित शाह को 10 रुपए मिले। जानते हैं उन रुपयों का क्या हुआ? उस रुपए से अमित शाह स्वामी वामदेव के लिए एक हार ख़रीदकर ले गए। एक शिष्य ने अपने गुरु के प्रति इस निष्ठा और समर्पण का प्रदर्शन किया है, तभी आज वो देश का दूसरा सबसे शक्तिशाली नेता है।
सनातन साहित्य से आता है बड़े फ़ैसले लेने का साहस
चाणक्य, शंकराचार्य और सावरकर — ये 3 हस्तियाँ आज अमित शाह की विचारधारा को प्रभावित करती हैं। यही वो अध्ययन है जो उन्हें बड़े फ़ैसले लेने का साहस देता है, रणनीति देता है। 2014 में जो रणनीतिकार था, वो 2019 आते-आते जननेता बन गया और 250 रैलियों के जरिए भाजपा की जीत सुनिश्चित की। 2024 लोकसभा चुनाव में भी 188 रैलियाँ करके अमित शाह ने अपना लोहा मनवाया।
इन सबके दौरान स्वामी वामदेव को मत भूलिए। वही तो थे, जिनके साथ ने एक युवक का जीवन बदलकर उसे अमित शाह बना दिया। वामदेव, जो महंत अवैद्यनाथ और परमहंस रामचन्द्रदास के साथ राम मंदिर के आंदोलन में सक्रियता से शामिल थे।

1997 में वामदेव 75 वर्ष की आयु में अपना भौतिक शरीर छोड़ गए, लेकिन अपने शिष्य को नए भारत का निर्माण करने के लिए स्थापित करके गए। एक संयोग देखिए कि जिस वर्ष वामदेव का निधन होता है उसी वर्ष अमित शाह पहली बार विधायक बनते हैं। शायद अमित शाह के इसी अनुभव व अध्ययन का परिणाम है कि आज भारत में वो बड़े से बड़े फ़ैसले यूँ ही हो जाते हैं, जिनके बारे में कभी सोचना भी अपराध माना जाता था। ये फ़ैसले पूरी क़ानूनी तैयारी के साथ होते हैं, इनके कार्यान्वयन का फल भी दिखाई देता है। अब UCC (समान नागरिक संहिता) की बारी है।