रजिस्टर्ड न होने से अमान्य नहीं होता हिंदू विवाह, इलाहाबाद हाई कोर्ट ने तलाक के मामले में निचली अदालत का आदेश किया रद्द: कहा- अनिवार्य नहीं रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट


इलाहाबाद हाई कोर्ट ने हिंदू विवाह को लेकर एक अहम फैसला देते हुए कहा कि रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट के ना होने से कोई विवाह अमान्य नहीं हो जाता है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट ही शादी को साबित करने का इकलौता साक्ष्य नहीं है। हाई कोर्ट ने विवाह के पंजीकरण का सर्टिफिकेट माँगने वाले निचली अदालत के फैसले को रद्द कर दिया है।

क्या है पूरा मामला?

सुनील दुबे और उनकी पत्नी मीनाक्षी ने अक्टूबर 2024 में हिंदू विवाह अधिनियम 1955 की धारा 13(बी) के तहत आपसी सहमति से तलाक के लिए आजमगढ़ की फैमिली कोर्ट में एक याचिका दाखिल की थी। इस कार्रवाई के दौरान फैमिली कोर्ट ने दोनों पक्षों को आदेश दिया कि वे अपनी शादी का प्रमाणपत्र जमा करें।

इस पर पति ने एक आवेदन दिया कि उनके पास विवाह प्रमाणपत्र उपलब्ध नहीं है क्योंकि उनकी शादी रजिस्टर्ड नहीं है। उन्होंने दलील दी कि हिंदू विवाह अधिनियम में विवाह का रजिस्ट्रेशन अनिवार्य नहीं है और इसलिए उन्हें इस नियम से छूट दी जाए।

फैमिली कोर्ट ने उनका आवेदन खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि हिंदू विवाह और तलाक नियमावली, 1956 के नियम 3(क) के अनुसार विवाह प्रमाणपत्र जरूरी है और इस फैसले के खिलाफ दुबे ने हाई कोर्ट का रुख किया था।

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने क्या कहा?

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए कहा है कि रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट के ना होने से कोई विवाह अमान्य नहीं हो जाता है। जस्टिस मनीष कुमार निगम की पीठ ने कहा, “सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न हाई कोर्ट्स के फैसलों से यह स्पष्ट है कि विवाह का रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट केवल विवाह को साबित करने का एक सबूत है। अगर विवाह रजिस्टर्ड नहीं भी है, तो भी हिंदू विवाह अधिनियम 1955 की धारा 8(5) के तहत वह विवाह अमान्य नहीं हो जाएगा।”

हालाँकि, हाई कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकारों को विवाह पंजीकरण के लिए नियम बनाने का अधिकार है, इसमें हिंदू विवाह रजिस्टर बनाए रखने का प्रावधान भी शामिल है जिसमें विवाह से जुड़ी जानकारी दर्ज की जा सके। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस तरह का पंजीकरण केवल विवाह का सुविधाजनक सबूत उपलब्ध कराने के लिए होता है।

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा, “सुप्रीम कोर्ट के फैसलों और 1956 के नियमों के नियम 3(क) को देखते हुए मेरा मानना है कि फैमिली कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश द्वारा विवाह प्रमाणपत्र दाखिल करने पर जोर देना पूरी तरह अनावश्यक था…निचली अदालत का आदेश रद्द किया जाता है।”

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने आजमगढ़ फैमिली कोर्ट को जल्द से जल्द इस मामले पर सुनवाई करने को कहा है। हाई कोर्ट ने कहा, “तलाक की याचिका 2024 से लंबित है इसलिए आजमगढ़ फैमिली कोर्ट के अतिरिक्त प्रधान न्यायाधीश को निर्देश दिया जाता है कि वे इस मामले पर जल्द से जल्द सुनवाई और निर्णय करें। दोनों पक्षों को अपना पक्ष और सबूत पेश करने का पूरा मौका दिया जाए लेकिन अनावश्यक तारीखें किसी भी पक्ष को न दी जाए।”

हाई कोर्ट ने कहा, “हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 8(1) से 8(4) के तहत बनाए गए किसी भी नियम के बावजूद अगर विवाह का पंजीकरण रजिस्टर में दर्ज नहीं हुआ है तो भी विवाह की वैधता पर कोई असर नहीं पड़ता। विवाह पंजीकरण प्रमाणपत्र दाखिल करने की आवश्यकता केवल उसी स्थिति में होती है जब विवाह धारा 8 के तहत रजिस्टर्ड हो।”

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