एअर इंडिया हादसे की शुरूआती जाँच रिपोर्ट के बाद लगातार एक्शन और आदेशों का दौर जारी है। भारत से लेकर देश-विदेश तक एयरलाइन अपने विमानों की जाँच में जुटी हैं। सरकारें भी उन्हें कील-कांटे दुरुस्त करने को कह रही हैं। लेकिन इस बीच कहानी का एक हिस्सा पहले दिन से अभी तक एक जैसा ही है। यह है किसी तरह पायलटों को दोषी बताने का। चाहे AAIB की जाँच रिपोर्ट के सामने आने से पहले आई विदेशी मीडिया की खबरों की बात हो या फिर जाँच रिपोर्ट के तथ्यों को तोड़ना-मरोड़ना, यह प्रयास अब भी जारी हैं।
इस मामले में सामने आई AAIB की जाँच रिपोर्ट ने बताया था कि एअर इंडिया की फ्लाईट AI 171 के क्रैश होने का कारण फ्यूल कंट्रोल स्विच का बंद हो जाना था। रिपोर्ट में बताया गया था कि इसके चलते इंजनों को तेल नहीं पहुँचा और यह बंद हो गए। रिपोर्ट में यह भी बताया गया था कि फ्यूल कंट्रोल स्विच के बंद होने को लेकर पायलटों की आपस में बात हुई थी। इस बातचीत में एक पायलट ने स्विच बंद करने को लेकर दूसरे से पूछा और दूसरे पायलट ने इससे इनकार कर दिया।
अब इस मामले में अमेरिकी विमान नियामक FAA और विमान निर्माता बोइंग ने दावा किया है कि उसके विमानों में फ्यूल कंट्रोल स्विच एकदम सही हैं। FAA ने कहा है कि फ्यूल कंट्रोल स्विच को रोकने के लिए लगाए जाने वाले लॉक को लेकर कोई भी निर्देश जारी करने की जरूरत अभी नहीं दिखाई पड़ती है। FAA के आदेश का अर्थ यह है कि बोइंग के किसी भी विमान में वर्तमान में फ्यूल कंट्रोल स्विच को लेकर जाँच करने की जरूरत नहीं है और बोइंग के हिस्से पर कोई गड़बड़ नहीं है।
FAA की यह एडवायजरी ऐसे समय में आई है जब भारत से लेकर दक्षिण कोरिया और एतिहाद जैसी एयरलाइन अपने विमानों में फ्यूल कंट्रोल स्विच को लेकर नए निर्देश जारी किए हैं। FAA की एडवायजरी एक तरह से बोइंग का बचाव भी करती है। लेकिन यह कोई नया प्रयास नहीं है। ऐसा लगता है कि बोइंग को बचाने की पटकथा शुरुआत से ही लिखी जा रही थी। इसका पहला प्रमाण विदेशी मीडिया की रिपोर्ट लगी थीं।
दरअसल, अमेरिकी अखबार वॉल स्ट्रीट जनरल ने गुरुवार (10 जुलाई,2025) को इसी संबंध में एक खबर प्रकाशित की थी। इस खबर में दावा किया गया था कि जाँचकर्ता अब एअर इंडिया हादसे की जाँच इंजन या अन्य फेलियर के एंगल से नहीं परंतु पायलटों की ‘भूल’ के एंगल से कर रहे हैं। यह खबर तब प्रकाशित की गई थी जब AAIB की जाँच रिपोर्ट सामने नहीं आई थी। बाद में जब AAIB की रिपोर्ट सामने आई तो इसमें पायलटों की भूल की बात तक नहीं की गई।
यह प्रयास सिर्फ वॉल स्ट्रीट जनरल ने नहीं किया था। वॉल स्ट्रीट जनरल के अलावा ब्लूमबर्ग, रॉयटर्स, ABC न्यूज और विमानन पर रिपोर्ट करने वाली वेबसाइट एयर करेंट ने भी विमान हादसे का कारण इंजन को ईंधन पहुंचाने वाले फ्यूल स्विच के ‘गलती से बंद होना’ बताने का प्रयास किया था। इन सभी मीडिया पोर्टल में यह खबरें 8 जुलाई से 10 जुलाई के बीच प्रकाशित हुई थी जबकि AAIB की जाँच रिपोर्ट 12 जुलाई को प्रकाशित हुई थी।
यह प्रयास AAIB रिपोर्ट के बाद रुके नहीं थे। AAIB रिपोर्ट को भी विदेशी मीडिया संस्थानों जैसे रॉयटर्स, बीबीसी, डेली मेल आदि ने इस रिपोर्ट को जानबूझकर गलत तरीके पेश किया। AAIB रिपोर्ट में पायलटों की गलती को लेकर कोई बात नहीं कही गई थी। फिर भी इन मीडिया संस्थानों ने पायलटों को ही को दोषी ठहराने की कोशिश की। अब इस कड़ी में FAA की वह नोटिफिकेशन भी सामने आई है जिसमे बोइंग को क्लीन चिट दी गई है।
ऐसे में लगता है कि सारा दोष पायलटों पर मढ़ के बोइंग की साख को बचाने के लिए किया जा रहा है। पायलटों को बलि का बकरा बनाना वैसे भी बोइंग की पुरानी आदत रही है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण वर्ष 2019 और 2020 में हुए 737 मैक्स विमान के हादसे हैं। यह हादसे इंडोनेशिया की लायन एयर और इथियोपिया की इथियोपियन एयरलाइंस के विमानों के साथ हुए थे। इन हादसों में 346 लोग मारे गए थे।
इन हादसों के बाद न्यू यॉर्क टाइम्स के साथ एक बातचीत में बोइंग के CEO डेविड कोल्हान ने कहा था,”वहाँ (एशिया और अफ्रीका) के पायलटों का अनुभव, अमेरिकी पायलटों के मुकाबले कहीं नहीं ठहरता।” उन्होंने सीधे तौर पर पायलटों को कम अनुभव वाला और हादसे के लिए जिम्मेदार ठहराने का प्रयास किया था। इन्हीं हादसों को लेकर डेविड कोल्हान से पहले बोइंग के CEO रहे डेनिस मुलिनबर्ग ने भी ऐसी ही टिप्पणी की थी।
उन्होंने हादसों के बाद अमेरिकी संसद के सामने कहा था कि उनके विमान (737 मैक्स) एकदम ठीक थे लेकिन पायलटों ने सारे कदम नहीं उठाए, जिसके चलते विमान हादसे का शिकार हो गए। इन दोनों की बातें आगे चलकर एकदम झूठ साबित हुई थीं। यह दोनों विमान हादसे बोइंग की ही एक गलती के चलते हुए थे। बोइंग ने अपने 737 मैक्स में MCAS नाम का एक सॉफ्टवेयर लगाया था जो विमान के आगे के हिस्से को अधिक ऊपर उठने से रोकता था।
इसके विषय में बोइंग ने पायलटों को नहीं बताया था। यह सॉफ्टवेयर खुद ही काम करता था। बोइंग के पायलटों को इस विषय में ना बताने के पीछे कारण था कि यह विमान खरीदने वाली एयरलाइंस को उन्हें ट्रेनिंग देनी पड़ती जो बड़ा खर्च होता। इसके अलावा इस सिस्टम का प्रमाणन भी बोइंग को करवाना पड़ता, यह भी एक खर्चीली प्रक्रिया है। बोइंग की बेइमानी का परिणाम यह हुआ कि यह दोनों हादसे हो गए। इन दोनों हादसे में विमान के उड़ान भरने के कुछ ही देर बाद वह नीचे की तरफ गोते खाने लगा और अंत में जाकर क्रैश हो गया।
इसके पीछे कारण था कि MCAS सॉफ्टवेयर लगातार इन दोनों में विमानों को नीचे की तरफ दबाता रहा और पायलट चाह कर भी कुछ नहीं कर पाए। बोइंग ने पहले तो अपनी गलती स्वीकार ही नहीं की और इन दोनों एयरलाइंस के पायलट पर ही दोष मढ़ दिया। बाद में हुई जाँच में सच्चाई खुली और बोइंग को लगभग ₹20 हजार करोड़ का जुर्माना झेलना पड़ा था और MCAS में गड़बड़ी की बात भी स्वीकार करनी पड़ी थी।













