आतंकी ताहिर हबीब का 'जनाजा ए गायब'

ऑपरेशन महादेव के तहत मारे गए आतंकी ताहिर का पीओके के रावलकोर्ट के खाई गाला गाँव में जनाजा निकला। लेकिन ये आम जनाजा नहीं बल्कि ‘जनाजा ए गायब’ था। इस दौरान आतंकियों के खिलाफ लोगों का गुस्सा फूट पड़ा।

दरअसल ‘जनाजा ए गायब’ में लश्कर ए तैयबा के आतंकी शामिल होना चाहते थे। उसे देख कर रावलकोट के खाई गाला गाँव के लोगों का गुस्सा भड़क उठा। गाँव वालों ने लश्कर के कमांडर रिजवान हनीफ को खदेड़ दिया। दरअसल ताहिर के परिवार ने साफ मना कर दिया था कि ‘जनाजा ए गायब’ में लश्कर के आतंकियों को शामिल होने की जरूरत नहीं है।

इसके बावजूद लश्कर का स्थानीय कमांडर रिजवान हनीफ वहाँ पहुँच गया। उसके साथियों ने गाँव वालों को बंदूक दिखा कर डराना चाहा। इस पर गाँव वालों का गुस्सा भड़क उठा। आतंकियों और ग्रामीणों के बीच तीखी नोकझोंक हुई। इसके बाद लोगों ने लश्कर के आतंकियों को गाँव से खदेड़ दिया।

आतंकवाद का विरोध करने लगी है पीओके की जनता

घटना से साफ पता चलता है कि पहलगाम आतंकी हमले में पाकिस्तान शामिल था, वहीं ये भी सामने आया कि पीओके की जनता अब आतंकियों के खिलाफ खुल कर अपना विरोध जता रही है। आतंकी ताहिर के ‘जनाजा ए गायब’ को आतंकियों की भर्ती का जरिया बनाना चाहते थे। भारत के खिलाफ जहर उगलना चाहते थे। लेकिन ग्रामीणों ने उनकी नहीं सुनी। लोग अब हर हाल में अपने बच्चों को आतंकी बनने से बचाना चाहते हैं। इसलिए ग्रामीण अब आतंकियों के खिलाफ सार्वजनिक बहिष्कार की योजना बना रहे हैं। ये पीओके में आई नई सोच और जागरुकता को दर्शाता है।

घटना को लेकर कुइयाँ और ख्याला क्षेत्र के ग्रामीण एक सार्वजनिक ‘जिगरा’ यानी पारंपरिक परिषद की बैठक करना चाहते हैं। बैठक में आतंकवाद का विरोध करेंगे। ‘जनाजा एक गायब’ के बाद एक वीडियो सामने आया है जिसमें एक व्यक्ति दूसरे से पूछ रहा है, “ये कौन लोग हैं जो हमारे बच्चों का ब्रेनवॉश करते हैं और भारत जैसी सैन्य शक्ति के खिलाफ खड़ा करते हैं।”

क्या होता है ‘जनाजा ए गायब’

‘जनाजा ए गायब’ शवों की गैरमौजूदगी में किया जाना वाला सुपुर्दे खाक का एक तरीका है। इस्लामी परंपरा के मुताबिक जब किसी मुस्लिम की मौत ऐसी जगह हो जाए, जहाँ से शव न आ पाए और जनाजे की नमाज पढ़ने के लिए कोई मौजूद न हो, तो उसके परिजन शव की गैरमौजूदगी में नमाज अदा करते हैं और अंतिम दुआ करते हैं।

कौन था ताहिर हबीब

ताहिर पाकिस्तान का आतंकी था। लश्कर ए तैयबा में शामिल होने से पहले वह पाकिस्तानी फौज में था। वह पाकिस्तानी छात्र संगठन इस्लामी जमीयत तलाबा का सदस्य भी रहा है। उसने स्टूडेंट लिबरेशन फ्रंट से भी कनेक्शन थे। वह अफगानिस्तान के सदोजाई पठान समुदाय था था, जो 18वीं शताब्दी में अफगानिस्तान से आकर पुंछ के इलाके में बस गए थे। उसके समुदाय सरोजाई पठान ने पुंछ विद्रोह में अहम भूमिका निभाई थी। अफगान कनेक्शन की वजह से खुफिया रिकॉर्ड में उसे ‘अफगानी’ नाम दिया गया।

भारत ने मोस्ट वॉटेड आतंकी उसे घोषित किया था। पहलगाम हमले में उसने अहम भूमिका निभाई थी। इस हमले में 26 पर्यटक मारे गए थे। इसके बाद भारत ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ शुरू किया और पाकिस्तान में मौजूद आतंकी ठिकानों को नष्ट किया। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के साथ-साथ आतंकियों को टारगेट करने के लिए ‘ऑपरेशन महादेव’ शुरू किया गया। इसके तहत पहलगाम हमले में शामिल आतंकियों का एनकाउंटर कश्मीर की दुर्गम घाटी में किया गया।

भारत में आतंकियों के शवों का क्या किया जाता है?

अगर आतंकी भारत का है और उसकी पहचान हो जाती है तो उसके शव को परिजनों को सौंप दिया जाता है। लेकिन परिजन जब आतंकी के शव को लेने से मना कर दें तो उस आतंकी की रीति रिवाज के मुताबिक दफनाया जाता है या अंतिम संस्कार किया जाता है। इसका खर्च स्थानीय प्रशासन वहन करता है।

अगर पाकिस्तान या दूसरे देश का आतंकवादी होता है, तो पहले शव को पाकिस्तान या संबंधित देश को सौंपने की कोशिश की जाती है। अगर संबंधित देश शव को ले जाने को तैयार नहीं होता है तो आतंकी के शव को गुप्त रूप से उसके रीति रिवाज के मुताबिक दफना दिया जाता है। आम तौर पर सुरक्षा कारणों से इसकी जानकारी सार्वजनिक नहीं की जाती है।

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