बीआरएस, केसीआर

तेलंगाना विधानसभा का चुनाव हारते ही KCR के नेतृत्व वाली BRS सरकार ने 62 हार्ड डिस्क नष्ट कर दिए थे। ये हार्ड डिस्क 600 से अधिक प्रभावशाली लोगों की जासूसी से जुड़े थे। इनमें कई नेता, पत्रकार और एक्टिविस्ट शामिल थे। बीआरएस सरकार ने इनके फोन टैप करवाए थे। लेकिन चुनाव हारते ही करीब 1 घंटे के लिए सीसीटीवी कैमरे बंद कर हार्ड डिस्क नष्ट करवा दिए।

तेलंगाना की विशेष खुफिया शाखा (SIB) के हैदराबाद स्थित दफ्तर में 4 दिसंबर 2023 की रात को यह घटना हुई। रात 8:34 बजे से लेकर 9:34 बजे तक पूरे एक घंटे के लिए SIB ऑफिस के CCTV कैमरे बंद कर दिए गए थे। जाँच में सामने आया है कि इसी एक घंटे के अंदर 62 हार्ड डिस्क नष्ट किए गए।

इन हार्ड डिस्क को काटा गया, उन्हें पीसकर छोटे-छोटे टुकड़ों में बदला गया और फिर उन्हें एक नदी में फेंक दिया गया। ये सब SIB ऑफिस के एक छोटे से कमरे में हुआ।  

‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट के अनुसार हैदराबाद पुलिस की जाँच में सामने आया है कि इन हार्ड डिस्क में 600 से ज्यादा प्रभावशाली लोगों की फोन टैपिंग से जुड़ी जानकारी थी। कहा जा रहा है कि भारत राष्ट्र समिति (BRS) ने अपने कार्यकाल के दौरान इन लोगों की फोन रिकॉर्डिंग करवाई थी।

​जो तकनीक नक्सलियों से लड़ने के लिए उससे राजनीतिक विरोधियों की जासूसी

यह मामला एक बड़े जाँच का हिस्सा है, जिसमें यह आरोप है कि 5 वरिष्ठ पुलिस-खुफिया अधिकारी और एक टीवी चैनल के संचालक ने मिलकर करीब 600 लोगों की अवैध निगरानी (जासूसी) की। यह निगरानी उस समय की सत्तारूढ़ पार्टी BRS के फायदे के लिए की गई थी।

जिन लोगों की जासूसी की गई उनमें नेता, अफसर, व्यापारी और मौजूदा हाई कोर्ट के एक जज तक शामिल हैं। इनलोगों के परिजनों, ड्राइवर और दोस्तों के भी फोन टैप किए गए। चौंकाने वाली बात यह है कि यह निगरानी उन तकनीकी सिस्टम्स के जरिए की गई, जिन्हें असल में नक्सली गतिविधियों पर नजर रखने के लिए बनाया गया था। अब इस पूरे मामले की गहराई से जाँच चल रही है।

बीजेपी नेता ने दर्ज कराया बयान

जिन लोगों की निगरानी की गई उनमें केंद्रीय गृह राज्य मंत्री और बीजेपी नेता बांदी संजय कुमार के होने की बात भी कही जा रही है। वे शुक्रवार (8 अगस्त 2025) को हैदराबाद पुलिस के सामने पेश हुए। बयान दर्ज कराने के बाद उन्होंने दावा किया कि इस जासूसी मामले में करीब 6500 फोन टैप किए गए थे। इनमें तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी और BRS के कई विधायकों के फोन भी शामिल हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, एक अलग टीम सिर्फ रेवंत रेड्डी और उनके करीबियों की निगरानी के लिए बनाई गई थी।

किसके आदेश पर नष्ट किए गए हार्ड डिस्क?

जाँचकर्ताओं का मानना है कि डिस्क को नष्ट करने का आदेश उस समय के SIB प्रमुख टी प्रभाकर राव ने दिया था। उन्होंने राज्य में कॉन्ग्रेस सरकार बनने के ठीक एक दिन बाद 4 दिसंबर 2023 को अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अपनी याचिका में राव ने दावा किया है कि डेटा नष्ट करने का फैसला 2 दिसंबर को ही ले लिया गया था। यह फैसला  एक समिति द्वारा लिया गया था। इस समिति में मुख्य सचिव, सामान्य प्रशासन विभाग के सचिव और विधि सचिव शामिल थे।

डिस्क के अंदर क्या था?

पुलिस का कहना है कि नष्ट की गई ज्यादातर डिस्कों में ‘राजनीतिक खुफिया जानकारी’ थी। जिसमें नेताओं की निजी प्रोफाइल, फोन पर हुई बातचीत और ऑनलाइन चैट्स थे। हालाँकि कुछ डिस्क में CPI (माओवादी) से जुड़ी जानकारी भी थी, जिसे इकट्ठा करना SIB का काम होता है। जाँचकर्ताओं के मुताबिक, इन ड्राइव को नष्ट करने से कई दशकों की उपयोगी खुफिया जानकारी खत्म हो गई और यह देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए भी खतरा बन सकती है।

SOT के पास भी थे ​नष्ट किए गए डिस्क

62 डिस्कों में से 36 डिस्क एक स्पेशल ऑपरेशंस टीम (SOT) के कंट्रोल में थी, जो 2020 में SIB  के तहत बनाई गई थी। यह टीम नक्‍सल गतिविधियों पर नहीं, बल्कि राजनीतिक जासूसी पर फोकस कर रही थी। इस टीम का नेतृत्व डीएसपी डी प्रनीत कुमार, जिन्हें प्रनीत राव के नाम से भी जाना जाता है, कर रहे थे। उन्हें इस मामले में बाद गिरफ्तार किया गया था, लेकिन अब वे जमानत पर बाहर हैं। प्रनीत राव के पास SIB दफ्तर में तीन अलग कमरे, 11 स्टाफ मेंबर, 17 डेस्कटॉप कंप्यूटर, दो लैपटॉप, अलग फोन लाइन और एक प्राइवेट इंटरनेट कनेक्शन की सुविधा थी।

किसके आदेश पर हुए फोन टैप?

जाँच में पता चला है कि SOT विभिन्न टेलीकॉम कंपनियों को चिट्ठी भेजकर फोन कॉल्स को इंटरसेप्ट (जासूसी के लिए सुनने) करने की अनुमति माँगता था। इस प्रक्रिया को ‘लीगल इंटरसेप्शन’ कहा जाता है। इसे प्रभाकर राव नाम के अधिकारी द्वारा मँजूरी दी जाती थी।

कानून के मुताबिक, ऐसे डेटा को हर छह महीने में नष्ट करना जरूरी होता है। लेकिन इस मामले में एक गवाह ने पुलिस को बताया कि डेटा नष्ट करने का आदेश एक महीने पहले ही आ गया। इस दौरान CCTV कैमरे भी बंद कर दिए गए, जबकि ऐसा करने की कोई जरूरत नहीं थी।

गौर करने वाली बात यह है कि किसी मशीन में खराबी आने पर भी टेक्नीशियन को SOT रूम के अंदर जाने की इजाजत नहीं होती थी। उन्हें मशीन बाहर ही लेकर मरम्मत करनी पड़ती थी।

एक निजी निगरानी कंपनी से सहायता

हैदराबाद की एक निजी कंपनी के साथ मिलकर SOT निगरानी कर रही थी। यह निगरानी कंपनी ऑनलाइन चैट्स, जैसे WhatsApp पर होने वाली बातचीत को इंटरसेप्ट करने में माहिर है। जाँचकर्ताओं के मुताबिक, इस कंपनी ने SOT को तीन खास तकनीकी टूल दिए।

पहला टूल सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स जैसे X, Facebook, Instagram, YouTube और Snapchat से जानकारी निकालने के लिए था। दूसरा टूल नेटवर्क डेटा को डिक्रिप्ट यानी पढ़ने लायक बनाने के लिए इस्तेमाल होता है। वहीं तीसरे टूल की मदद से टारगेट किए गए मोबाइल फोनों से WhatsApp मैसेज पढ़े जा सकते हैं।

कैसे शुरू हुआ विरोधियों की निगरानी का खेल?

तेलंगाना में अवैध फोन टैपिंग और निगरानी की शुरुआत 2018-19 में हुई थी। लेकिन नवंबर 2023 के विधानसभा चुनावों से ठीक पहले यह बेहद तेज हो गया। 16 नवंबर से 30 नवंबर (चुनाव वाले दिन) तक, कम से कम 600 लोगों की जासूसी की गई। यह SIT की रिपोर्ट में सामने आया है।

जिन लोगों की निगरानी की गई, उनमें प्रमुख राजनीतिक नेता भी शामिल थे। उदाहरण के तौर पर तेलंगाना प्रदेश कॉन्ग्रेस कमेटी के अध्यक्ष महेश कुमार गौड़ और केंद्रीय मंत्री बंडी संजय कुमार। इस मामले का खुलासा मार्च 2024 में तब हुआ जब SIB  के एक एडिशनल एसपी ने डीएसपी प्रनीत राव के खिलाफ FIR दर्ज कराई। उन पर गलत तरीके से जानकारी इकट्ठा करने का आरोप है।

बाद में पंजागुट्टा पुलिस ने इस मामले में 6 लोगों को आरोपित बनाया। इनमें पूर्व SIB प्रमुख टी प्रभाकर राव, डीएसपी प्रनीत राव, एएसपी एम तिरुपथन्ना, एन भुजंगा राव, पूर्व डीसीपी टी राधा किशन राव, टीवी चैनल मालिक एन श्रवण कुमार शामिल हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने प्रभाकर राव को अगस्त तक गिरफ्तारी से छूट दी है। बाकी आरोपितों को पहले गिरफ्तार किया गया, लेकिन बाद में उन्हें जमानत मिल गई। एन श्रवण कुमार अभी भी चंचलगुड़ा जेल में हैं। हालाँकि उन्हें फोन टैपिंग केस में अंतरिम राहत मिल चुकी है।

जाँच अधिकारियों के मुताबिक, इस निगरानी के लिए भारतीय टेलीग्राफ नियमों की धारा 419(A) का गलत इस्तेमाल किया गया। यह नियम केवल उच्च सरकारी अधिकारियों या आपात स्थिति में विशेष रूप से अधिकृत अधिकारियों को फोन इंटरसेप्ट करने की अनुमति देता है। लेकिन इस मामले में इसे तोड़-मरोड़कर ऐसे लोगों की जासूसी की गई जिनका नक्सलवाद या किसी सुरक्षा खतरे से कोई लेना-देना नहीं था। यानी यह सब राजनीतिक फायदे के लिए किया गया।

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