विश्व की बड़ी अर्थव्यस्थाओं के समूह BRICS (ब्रिक्स) की 2025 की शिखर बैठक 6-7 जुलाई को ब्राजील के रियो डी जनेरियो शहर में आयोजित हुई। इसमें ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका के साथ-साथ नए शामिल हुए सदस्य देशों ने भी हिस्सा लिया। भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी इस बैठक में शामिल हुए।
इस बार की बैठक में जहाँ आंतकवाद समेत तमाम मुद्दों पर बात हुई, वहीं तुर्की की सदस्यता पर फैसला नहीं हो पाया। तुर्की ने पिछले साल BRICS का सदस्य बनने के लिए आधिकारिक रूप से आवेदन किया था। हालाँकि, उस समय उसे केवल ‘पार्टनर देश’ का दर्जा दिया गया था। इसे सदस्य बनने की दिशा में पहला कदम माना जाता है।
उम्मीद की जा रही थी कि 2025 की शिखर बैठक में तुर्की को पूर्ण सदस्य का दर्जा प्राप्त हो जाएगा। लेकिन इस आवेदन पर कोई बड़ा फैसला नहीं लिया गया और उसकी हैसियत बस पार्टनर देश तक ही सीमित रखी गई। इसका मतलब है कि तुर्की को अभी और इंतजार करना होगा। हालाँकि, इस बार तुर्की की सदस्यता पर चर्चा हुई है।
बताया गया कि तुर्की के सदस्य ना बन पाने के पीछे भारत और चीन थे। तुर्की को BRICS सदस्य बनाने के पक्ष में वर्तमान में भारत और चीन नहीं है। दोनों देशों की आपत्तियाँ अलग-अलग हैं। चीन तुर्की की BRICS सदस्यता का विरोध इसलिए कर रहा है क्योंकि उसके आपसी रिश्तों में कुछ मतभेद मौजूद हैं।
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Turkey has formally asked to join the BRICS group pic.twitter.com/9J6rmYbbOU
— Megatron (@Megatron_ron) September 2, 2024
BRICS का विस्तार धीरे-धीरे हो रहा है, और नए सदस्य जोड़ने से पहले सभी मौजूदा सदस्य देशों की सहमति जरूरी होती है। चीन और भारत BRICS के संस्थापक सदस्य हैं। यदि वह सहमत नहीं होते तो तुर्की को कभी भी इसकी सदस्यता नहीं मिल सकती।
भारत ने तुर्की के BRICS में आने पर क्यों लगाया वीटो?
भारत और तुर्की के रिश्ते हालिया सालों में कोई विशेष अच्छे नहीं रहे हैं। भारत, तुर्की की BRICS सदस्यता का विरोध इसीलिए कर रहा है क्योंकि वह लगातर पाकिस्तान के पक्ष में खडा खड़ा रहा है। हाल ही में हुए ऑपरेशन सिंदूर के दौरान तुर्की ने खुले तौर पर पाकिस्तान का समर्थन किया था।
तुर्की ने पहलगाम आतंकी हमले की निंदा भी नहीं की थी। ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तानी मंत्री शाहबाज शरीफ और आर्दोआन की मुलाक़ात भी हुई थी, जहाँ दोनों ने एक दूसरे के लिए काफी मीठी मीठी बातें की थी। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी तुर्की ने पाकिस्तान को मजबूत किया था।
पाकिस्तान ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत के खिलाफ जो ड्रोन इस्तेमाल किए थे, वह तुर्की के ही थे। इसने भारत के लिए सुरक्षा खतरे भी खड़े किए थे। इसके अलावा कश्मीर मुद्दे पर भी तुर्की हमेशा पाकिस्तान के ही पक्ष में खड़ा रहा है। राष्ट्रपति एर्दोआन ने कई बार भारत के खिलाफ बयान दिए हैं।
भारत ने न केवल तुर्की की BRICS सदस्यता का विरोध किया है, बल्कि देश में तुर्की कंपनियों के खिलाफ सख्त कदम भी उठाए हैं, जैसे एयरपोर्ट सेवाएं देने वाली तुर्की की कंपनी के सुरक्षा मंजूरी को रद्द कर दिया। वही भारत में तुर्की के सामानों का बहिष्कार भी किया जा रहा है।
चीन क्यों कर रहा है विरोध?
BRICS में तुर्की की एंट्री पर भारत के अलावा दूसरा वीटो चीन का रहा। दरअसल, चीन से तुर्की का दूसरा विवाद है तुर्की में उइगर मुसलमानों की बड़ी आबादी रहती है और तुर्की सरकार ने कई बार चीन के शिनजियांग प्रांत में रहने वाले उइगरों के मानवाधिकारों के उल्लंघन पर चिंता जताई है।
तुर्की ने सार्वजनिक रूप से चीन द्वारा उइगरों के साथ किए जा रहे कथित दुर्व्यवहार की आलोचना की है। इससे चीन को यह लगता है कि तुर्की उसकी आंतरिक नीतियों में हस्तक्षेप कर रहा है। चीन यह भी मानता है कि तुर्की उइगर अलगाववादियों को समर्थन देता है, जो उसकी एकता और सुरक्षा के लिए खतरा है।
तुर्की ने 2019 और 2021 में संयुक्त राष्ट्र मंच पर भी चीन की नीतियों की आलोचना की थी और उइगरों के अधिकारों की रक्षा की माँग की थी। तुर्की के कुछ मीडिया चैनल और राजनीतिक नेता चीन की नीतियों को ‘नस्लीय दमन’ तक कह चुके हैं। इसके साथ ही, तुर्की ने कई बार उइगर प्रवासियों को अपने देश में शरण भी दी है।
इस रुख से चीन लगातार तुर्की के खिलाफ रहा है और उसे अपने साथ मंच साझा नहीं करने देना चाहता है। इसके अलावा, तुर्की सैन्य गठबंधन NATO का हिस्सा है जो अमेरिकी अगुवाई वाला है। चीन यह कतई बर्दाश्त नहीं कर सकता कि कोई NATO सदस्य उसके बराबर शक्ति किसी संगठन में पाए।
तुर्की क्यों बनना चाहता है BRICS का हिस्सा?
अब यहाँ सवाल उठते हैं कि तुर्की BRICS का हिस्सा बनना ही क्यों चाहता है। तुर्की स्वयं NATO का सदस्य है और उसके संबंध यूरोप तथा अमेरिका से अधिक हैं। जबकि BRICS को मोटे तौर पर अमेरिकी अगुवाई वाले G-7 के विकल्प के तौर पर देखा जाता है।
दरअसल, इसके पीछे तुर्की और और उसके नेता आर्दोआन की ग्लोबल महत्वाकांक्षा है। तुर्की वैश्विक स्तर पर बड़ा नेता बनना चाहता है। इसलिए वह हर उस संगठन में शामिल होना चाहता है, जो वैश्विक राजनीतिक पर असर डालता हो। इसके अलावा BRICS कोई सैन्य गठबंधन नहीं है, जिससे अमेरिकी हितों को नुकसान पहुँचे।
ऐसे में NATO का सदस्य होने के बावजूद वह BRICS में घुसना चाहता है। इसके अलावा एक कारण और है। दरअसल, BRICS में सऊदी अरब भी सदस्य बनने के रास्ते में है। सऊदी अरब इस्लामी नेता माना जाता है और तुर्की उससे यह तमगा लेना चाहता है। ऐसे में वह भी यहाँ आना चाहता है। हालाँकि, जब तक वह भारत और चीन से अपने रिश्ते ठीक नहीं करता, उसकी BRICS सदस्यता की इच्छा पूरी नहीं होने वाली।