इनमें से तीन राज्यों पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल में विपक्षी INDI गठबंधन की सरकार है। असम और पुद्दचेरी में एनडीए सरकार है। इस लिहाज से देखा जाए तो 2026 का चुनाव विपक्ष के लिए काफी अहम है। उनकी साख दाँव पर है। क्योंकि ये राज्य राजनीतिक ताकत, मनोवैज्ञानिक बढ़त और 2029 की राष्ट्रीय रणनीति—तीनों को तय करने वाला है। ये चुनाव तय करेगा कि विपक्ष की 2029 में होने वाले लोकसभा चुनाव के लिए रणनीति क्या होगी। इन तीन राज्यों में बीजेपी कभी सत्ता में नहीं रही। इसलिए बीजेपी के पास खोने के लिए इन राज्यों में कुछ भी नहीं है।
पहले बात करते हैं पश्चिम बंगाल की। पिछले 15 सालों से लेफ्ट को सत्ता से हटा कर सत्तासीन हुई ममता बनर्जी की टीएमसी यूँ तो इंडी गठबंधन का हिस्सा है, जिसमें कॉन्ग्रेस और लेफ्ट दोनों पार्टियाँ हैं। लेकिन, बंगाल में ममता बनर्जी न तो कॉन्ग्रेस को उभरने देना चाहती है और न ही लेफ्ट की बैसाखी पर चलना चाहती है। वह अपने दम पर चुनाव जीतना चाहती हैं। इसलिए पिछले चुनाव में भी ‘एकला चलो रे’ की नीति का अनुसरण करते हुए आगे बढ़ रही है।
चुनाव जीतने के लिए नित योजनाओं की घोषणा हो रही है। एसआईआर का विरोध कर चुनाव आयोग को कटघरे में खड़े करने की कोशिश हो रही है। इसके अलावा बंगाली अस्मिता का सवाल उठा कर लोगों को जोड़ने की कोशिश की जा रही है। बंगाल में अगर तृणमूल कांग्रेस जीत जाती है तो INDI गठबंधन में उसकी स्थिति मजबूत हो जाएगी। आगामी लोकसभा चुनाव में कॉन्ग्रेस को झुका कर ममता बनर्जी दिल्ली का रास्ता तय करने की कोशिश कर सकती हैं। वह राज्य की जिम्मेदारी अपने भतीजे अभिषक बनर्जी को सौंप सकती है। ये दावा कर सकती हैं कि लगातार हार रहे विपक्ष को उन्होंने हौसला दिया है और बीजेपी के जीत के अभियान पर ब्रेक लगाया है।
वहीं बीजेपी भी अपना पूरा दमखम बंगाल में लगा रही है। बांग्लादेशी घुसपैठिया, भ्रष्टाचार, घोटाला, महिला सुरक्षा, डेमोग्राफी जैसे मुद्दे के दम पर वह हिन्दू वोटरों को एकीकृत करने की कोशिश कर रही है। साथ ही वादा कर रही है कि राज्य में अगर बीजेपी सत्ता में आई तो राज्य में विकास की बयार बहेगी।
तमिलनाडु दक्षिण भारत का सबसे मजबूत भाजपा-विरोधी किला माना जाता है। तमिलनाडु में एमके स्टालिन के नेतृत्व में द्रविड़ मुनेत्र कड़गम यानी डीएमके की सरकार है। कॉन्ग्रेस इसे समर्थन करती है। तमिलनाडु में जीत से इंडी गठबंधन कह सकता है कि दक्षिण भारत पूरी तरह विपक्ष के साथ है। एनडीए कहीं नहीं है। उत्तर भारत बनाम दक्षिण भारत की राजनीति के लिए ये निर्णायक है, यानी मोदी सरकार के खिलाफ नैरेटिव बनाने में तमिलनाडु काफी अहम है।
मौजूदा भारतीय राजनीति में पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु विपक्ष के सबसे मजबूत गढ़ बने हुए हैं। इन दोनों गढ़ों का राजनीतिक रूप से ढहना देश में विपक्ष की आवाज के काफी कमजोर पड़ जाने का संकेत होगा। पीएम नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी अब तक इन दोनों अभेद्य राजनीतिक किलों को भेदने में सफल नहीं हो सकी है। लेकिन 2026 के विधानसभा चुनावों में यह जोड़ी पूरी तैयारी और उम्मीद के साथ पहली बार इन दुर्गों को फतह करने के इरादे से मैदान में उतरेगी।
तमिलनाडु में बीजेपी चुनाव दर चुनाव अपनी स्थिति मजबूत करती जा रही है। 2024 के लोकसभा चुनावों में, बीजेपी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने राज्य की सभी 39 सीटें गंवा दी थी और DMK के नेतृत्व वाले गठबंधन ने क्लीन स्वीप किया था। हालाँकि बीजेपी का वोट शेयर बढ़ा था। लोकसभा चुनाव 2019 में यह 3.7% से बढ़कर 2024 में 11.24% हो गया। यह राज्य में पार्टी का अब तक का सबसे अधिक वोट शेयर है। 2021 के विधानसभा चुनाव में भी बीजेपी ने 4 सीटें जीती थीं। तमिलनाडु की छोटी छोटी पार्टियों को लेकर लोकसभा चुनाव 2024 में उतरी बीजेपी इस बार पूरा जोर लगा रही है। एनडीए की पूर्व सहयोगी एआईएडीएमके को भी साथ लेने की कोशिश की जा रही है।
अगर स्टालिन अपने राजनीतिक दुर्ग को सुरक्षित रखने में सफल रहते हैं तो राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष की रणनीति और मुद्दों के निर्धारण में उनका प्रभाव बढ़ जाएगा। वे खुद को उस तरह की केंद्रीय भूमिका में देखने लगेंगे, जैसी भूमिका एन.टी. रामाराव ने 1990 के दशक में निभाई थी। रामाराव ने उस वक्त केंद्र की राजीव गाँधी की सरकार को चुनौती देने के लिए एक मजबूत जमीन तैयार कर दी थी। इस वक्त केन्द्र में मोदी सरकार है इसलिए डीएमके अपनी ताकत इंडी गठबंधन में वर्चस्व स्थापित करने में लगा सकता है।
केरल में बीजेपी का कमल स्थानीय निकाय चुनाव में खिला है। पार्टी ने 40 साल से कब्जा वाले तिरुवनंतपुरम नगर निगम में जीत दर्ज की। इससे पार्टी काफी उत्साहित है। बीजेपी ने त्रिशूर लोकसभा सीट भी जीती थी। हालाँकि राज्य में लेफ्ट की सरकार है और कॉन्ग्रेस मुख्य विपक्षी दल है। दोनों पार्टियाँ इंडी गठबंधन में शामिल हैं। ऐसे में बीजेपी का पूरा फोकस राज्य में कॉन्ग्रेस की यूडीएफ को बेदखल कर मुख्य विपक्षी पार्टी बनना है।
इसके लिए हिन्दुओं को पार्टी साथ ला रही है, जो अब तक वामपंथी दलों के साथ रहे हैं। धर्मांतरण जैसे मुद्दे बीजेपी जोरशोर से उठा रही है। अगर कॉन्ग्रेस और लेफ्ट को विधानसभा चुनाव में कमजोर करने में बीजेपी सफल होती है, तो बीजेपी की मनोवैज्ञानिक जीत होगी और इंडी गठबंधन काफी कमजोर हो जाएगा। यूँ भी पूरे देश में लेफ्ट के पास एकमात्र राज्य केरल बचा है। यहाँ से जाने का मतलब है देश से कम्यूनिस्टों का खात्मा।
पूर्वोत्तर में भाजपा का सबसे मज़बूत राज्य असम है। यह पूर्वोत्तर के ‘अभेद्य किले’ की तरह है। असम विधानसभा चुनाव इंडी गठबंधन के लिए सबसे मुश्किल लेकिन सबसे अहम है। इसकी जीत से पूर्वोत्तर का द्वार विपक्ष के लिए खुल जाएगा। लेकिन बीजेपी के नेतृत्व वाली हिमंता सरकार यहाँ जमकर पसीना बहा रही है। केन्द्र की योजनाओं का लोगों को फायदा हुआ है। रेलवे से कनेक्शन और सड़कों से सुदूर इलाकों का जुड़ना जनता को काफी फायदा पहुँचा रहा है।
बीजेपी ने राज्य में घुसपैठ के खिलाफ अभियान चला रखा है। घुसपैठियों को राज्य से बाहर करने और एसआईआर के द्वारा उनकी पहचान की जा रही है। अब देखना होगा कॉन्ग्रेस अपना वजूद यहाँ बचा पाती है या नहीं।
पुद्दुचेरी विधासभा में बीजेपी-एआईएडीएमके के साथ कॉन्ग्रेस-डीएमके गठबंधन की टक्कर है। इस केन्द्र शासित प्रदेश को लेकर भी दोनों गठबंधन आमने-सामने हैं।
