दुनिया की राजनीति और पैसे के मामले में 26 और 27 जनवरी 2026 की तारीखें बहुत बड़ी होने वाली हैं। भारत और यूरोप के देशों के बीच एक बहुत बड़ा समझौता होने जा रहा है, जिसे ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ (यानी सभी समझौतों की जननी) कहा जा रहा है। इसका इंतजार पिछले 20 सालों से था। इस खास डील को पूरा करने के लिए यूरोप के सबसे बड़े नेता उर्सुला वॉन डेर लेयेन और एंटोनियो कोस्टा दिल्ली पहुँच चुके हैं, जहाँ भारत सरकार ने उनका शानदार स्वागत किया है।

यह मौका इसलिए भी खास है क्योंकि भारत के इतिहास में पहली बार यूरोप के नेता हमारे गणतंत्र दिवस (26 जनवरी) पर मुख्य मेहमान होंगे और यूरोप की सेना की एक टुकड़ी दिल्ली के कर्तव्य पथ पर परेड भी करेगी। इस पूरे समझौते का मुख्य मकसद ‘फ्री ट्रेड‘ यानी व्यापार को आसान बनाना है।

इससे 2 अरब लोगों के लिए एक बहुत बड़ा बाज़ार खुल जाएगा। साथ ही, यह भारत और यूरोप दोनों को व्यापार के लिए चीन और अमेरिका पर निर्भर रहने के बजाय एक-दूसरे का मजबूत साथी बनाएगा।

‘मदर ऑफ ऑल डील्स’: 2 अरब लोगों का बाजार और 25% वैश्विक GDP

यूरोप की बड़ी नेता उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने इस समझौते को ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ कहा है, जिसका मतलब है कि यह अब तक का सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण व्यापारिक समझौता है। इसके पीछे की बड़ी वजह यह है कि जब भारत और यूरोप के 27 देश एक साथ आएँगे, तो यह पूरी दुनिया का सबसे बड़ा और ताकतवर व्यापारिक बाजार बन जाएगा। यह बाजार इतना विशाल होगा कि पूरी दुनिया में होने वाली कुल कमाई का लगभग चौथा हिस्सा अकेले इसी डील से जुड़ा होगा।

इस समझौते का सबसे बड़ा फायदा भारत के छोटे और बड़े व्यापारियों को होगा। अभी जब भारत से कपड़े, जूते, गहने या आईटी (IT) सर्विस यूरोप भेजी जाती है, तो वहाँ उन पर भारी टैक्स लगता है। लेकिन इस डील के बाद हमारे सामान बिना किसी अतिरिक्त टैक्स के यूरोप के बाजारों में बिक सकेंगे, जिससे भारतीय कंपनियों को काफी मुनाफा होगा।

वहीं दूसरी ओर, यूरोप की शानदार कारें (जैसे मर्सिडीज और फॉक्सवैगन) और वहाँ की खास वाइन पर जो भारी टैक्स भारत में लगता है, वह कम हो जाएगा। इसका सीधा मतलब यह है कि आने वाले समय में भारतीयों के लिए ये विदेशी ब्रांड्स पहले के मुकाबले काफी सस्ते हो सकते हैं।

रक्षा और तकनीक: ‘SAFE’ कार्यक्रम में भारत की एंट्री

यह समझौता सिर्फ सामान के लेनदेन तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत और यूरोप अब दोस्ती का एक नया अध्याय शुरू कर रहे हैं जिसे ‘सुरक्षा और रक्षा साझेदारी’ कहा जा रहा है। यह कदम भारत को अपनी सेना और हथियारों के मामले में आत्मनिर्भर बनाने में बहुत मदद करेगा। इस समझौते के बाद, भारत की डिफेंस कंपनियाँ पहली बार यूरोप के उस खास खजाने (SAFE प्रोग्राम) का हिस्सा बन पाएँगी, जिसमें करीब 150 अरब यूरो रखे गए हैं।

आज तक किसी भी गैर-यूरोपीय देश को इतने बड़े फंड का फायदा उठाने का मौका नहीं मिला है, जो भारत के लिए गर्व की बात है। इसके साथ ही, भारत और यूरोप अब आपस में खुफिया जानकारियाँ भी साझा करेंगे। चाहे समुद्र की सुरक्षा हो, इंटरनेट पर होने वाले साइबर हमले हों या फिर आतंकवाद से लड़ना- दोनों पक्ष मिलकर काम करेंगे।

यूरोप ने हाल ही में हुए आतंकी हमलों के बाद खुलकर भारत का साथ दिया है और कहा है कि भारत को अपनी रक्षा के लिए मुँहतोड़ जवाब देने का पूरा हक है। यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की एक बड़ी कूटनीतिक जीत है। एक और अहम बात यह है कि अब यूरोप की बड़ी कंपनियाँ चीन को छोड़कर भारत को अपना नया ठिकाना बनाना चाहती हैं।

वे अपनी फैक्ट्रियाँ भारत में लगाना चाहती हैं, जिससे न केवल हमारे यहाँ चिप (सेमीकंडक्टर) और क्लीन एनर्जी जैसे आधुनिक क्षेत्रों में काम बढ़ेगा, बल्कि भारत पूरी दुनिया के लिए एक बड़ा मैन्युफैक्चरिंग सेंटर बनकर उभरेगा।

नौकरियों की बारिश: युवाओं और स्किल्ड प्रोफेशनल के लिए सुनहरा मौका

इस बड़े समझौते का सबसे शानदार असर हमारे देश में नौकरियों पर पड़ने वाला है। जानकारों का कहना है कि इसके आने से लाखों लोगों को काम मिलेगा। सबसे अच्छी बात यह है कि भारतीय इंजीनियरों, डॉक्टरों और वैज्ञानिकों के लिए अब यूरोप जाकर काम करना बहुत आसान हो जाएगा। इसके लिए दोनों पक्ष एक खास नियम (मोबिलिटी फ्रेमवर्क) बना रहे हैं, जिससे वीजा मिलने में आने वाली दिक्कतें दूर होंगी और हमारे टैलेंट को विदेश में बेहतर मौके मिलेंगे।

साथ ही, यूरोप की बड़ी कार कंपनियाँ अब अपनी फैक्ट्रियाँ और पार्ट्स बनाने वाली यूनिट्स भारत में ही लगाएँगी। इससे हजारों इंजीनियरों और टेक्नीशियन्स के लिए भर्ती के द्वार खुलेंगे। इसके अलावा, यूरोप अब अपनी दवाओं की सप्लाई के लिए भारत पर भरोसा कर रहा है। इससे हमारे देश की दवा कंपनियों (फार्मा सेक्टर) में रिसर्च और दवा बनाने के काम में भारी बढ़ोतरी होगी और हज़ारों नई नौकरियाँ आएँगी।

यही नहीं, भविष्य की ऊर्जा यानी सोलर, हवा और हाइड्रोजन से बिजली बनाने के क्षेत्र में भी भारत और यूरोप मिलकर काम करेंगे। इस वजह से क्लीन एनर्जी के क्षेत्र में काम करने वाले विशेषज्ञों के लिए भारत में ही नौकरियों की भरमार हो जाएगी। कुल मिलाकर, यह डील भारतीय युवाओं के करियर को एक नई ऊँचाई पर ले जाने वाली साबित होगी।

नया वर्ल्ड ऑर्डर और भारत का दबदबा

यह ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ सिर्फ कागज का एक टुकड़ा नहीं है, बल्कि यह बदलती हुई दुनिया का एक बड़ा इशारा है। आज जब अमेरिका अपनी व्यापारिक नीतियों में कड़े बदलाव कर रहा है और चीन पर भरोसा कम हो रहा है, तब यूरोप ने भारत को अपना सबसे भरोसेमंद और लोकतांत्रिक साथी चुना है। यह समझौता भारत को दुनिया की एक ऐसी आर्थिक शक्ति बना देगा, जो अमेरिका और चीन के दबाव से अलग अपनी एक नई पहचान रखेगी।

बड़े जानकारों का कहना है कि आज यूरोप की आबादी बूढ़ी हो रही है, इसलिए उन्हें काम करने के लिए भारत के युवाओं और यहाँ के बड़े बाजार की सख्त जरूरत है। दूसरी तरफ, भारत को आगे बढ़ने के लिए यूरोप की आधुनिक टेक्नोलॉजी और वहाँ से आने वाले बड़े निवेश (पैसे) की जरूरत है। यानी इस दोस्ती में दोनों का ही बड़ा फायदा है। हालाँकि, भारत को एक बात का ध्यान रखना होगा कि इस समझौते का फायदा उठाकर चीन जैसा कोई तीसरा देश अपना सस्ता माल हमारे बाजार में न खपा दे। 27 जनवरी को जब इस पर पक्की मुहर लग जाएगी, तो यह आज के भारत की अब तक की सबसे बड़ी और ऐतिहासिक जीत कहलाएगी।

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