अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के भारत पर 50 फीसदी टैरिफ लगाए जाने को सलाहकार पीटर नवारो ने एक के बाद एक 9 ट्वीट कर भारत पर झूठे आरोप लगाए। उनके झूठ की कलई खुल गई है।

नवारो ने भारत के रूस से तेल खरीदने का मुद्दा उठाया। साथ ही, कहा कि भारत राष्ट्रपति पुतिन की ‘युद्ध मशीनरी’ को ताकत दे रहा है।

यूक्रेन युद्ध को ‘मोदी का युद्ध’ कहने वाले नवारो ने कहा कि भारतीय कंपनियाँ रूस के लिए ‘मनी लॉन्ड्रिंग’ कर रही हैं। उन्होंने 9 ट्वीट का एक थ्रेड लिखा, जिसमें भारत पर लगाए गए 50 फीसदी टैरिफ का समर्थन किया गया।

नवारो ने दावा किया, “ये केवल भारत के व्यापार के बारे में नहीं है, बल्कि ये पुतिन के युद्ध मशीन को भारत द्वारा दी गई आर्थिक जीवनरेखा को काटने के बारे में है।”

ये बताना जरूरी है कि रूस दुनिया का सबसे बड़ा कच्चा तेल उत्पादक और निर्यातक देश है। रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद, कच्चे तेल की कीमतें 137 डॉलर प्रति बैरल तक पहुँच गई हैं।

लगभग 1.4 अरब की आबादी वाले भारत को अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करना था। ईरानी तेल और वेनेज़ुएला के तेल पर संयुक्त राज्य अमेरिका, जी-7 देशों और यूरोपीय संघ (ईयू) ने प्रतिबंध लगाई है, जबकि रूसी तेल पर प्रतिबंध नहीं लगाई है। इनलोगों ने रूसी तेल पर ‘प्राइस कैप’ लगाई है, जो रूसी कच्चे तेल को अंतरराष्ट्रीय कीमत को कम रखने रखने में मदद करता है।

भारत ने रूसी तेल की खरीद के माध्यम से किसी भी अंतर्राष्ट्रीय मानदंड का उल्लंघन नहीं किया, क्योंकि उसने ‘प्राइस कैप’ का पालन किया है।

भारत अगर रूसी तेल नही खरीदता है, तो वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 200 डॉलर प्रति बैरल तक पहुँच सकती हैं। इसका असर सिर्फ भारत पर ही नहीं, बल्कि दुनिया के बाकी देशों पर भी पड़ेगा।

मोदी सरकार के इस फैसले से वैश्विक कच्चे तेल की कीमतें स्थिर और संतुलित बनी रहीं। और इस तथ्य को कम से कम तीन अमेरिकी अधिकारियों ने स्वीकार किया है, जिनमें अमेरिकी वित्त मंत्री जेनेट येलेन, राजदूत एरिक गार्सेटी और राजनयिक ज्योफ्री पायट शामिल हैं।

एक दूसरे ट्वीट में पीटर नवारो ने आरोप लगाया, ‘‘भारत हमारे डॉलर का इस्तेमाल रियायती दर पर रूसी कच्चा तेल खरीदने के लिए करता है।”

वास्तविकता में, भारत तीसरे देशों से रूसी कच्चा तेल खरीदता है, जहाँ लेन-देन अमेरिकी डॉलर में नहीं, बल्कि संयुक्त अरब अमीरात के दिरहम (एईडी) जैसी मुद्राओं में किया जाता है।

ये बात भी सच है कि अमेरिका ने पहले कभी भी रूसी तेल की खरीद पर आपत्ति नहीं जताई थी, क्योंकि इससे भारत के तेल खरीदने से कच्चे तेल की कीमतें 200 डॉलर प्रति बैरल तक बढ़ने से रुकी थीं।

यदि अमेरिका चाहता कि अन्य देश रूसी तेल खरीदना बंद कर दें, तो वह रूसी कच्चे तेल पर प्रतिबंध लगा सकता था, जैसा उसने वेनेजुएला और ईरान के मामले में किया था।

पीटर नवारो ने दावा किया, “भारतीय रिफाइनिंग कंपनियाँ, अपने रूसी साझेदारों के साथ मिलकर, अंतर्राष्ट्रीय बाजार में बड़े मुनाफे के लिए तेल को रिफाइन करके बेचती हैं। इससे रूस को युद्ध के लिए पैसा जुटाने में मदद मिल रही है।”

रूसी कच्चे तेल को ‘काला बाजारी तेल’ कहना भी गलत है, क्योंकि इसकी खरीद पर प्रतिबंध नहीं लगाया गया है। सिर्फ ‘प्राइस कैप’ यानी अधिकतम कीमत तय की गई है। भारत सभी अंतरराष्ट्रीय ढाँचों का पालन करता है और रूस में प्रतिबंधित परियोजनाओं से एलएनजी और एलपीजी नहीं खरीदता है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के व्यापार और विनिर्माण मामलों के वरिष्ठ सलाहकार ने दावा किया कि भारत द्वारा रूसी तेल का आयात ‘घरेलू मांग’ से प्रेरित नहीं है, बल्कि अवैध मुनाफाखोरी से प्रेरित है।

इस दावे का कोई सबूत नहीं है। भारत को अपनी 1.4 अरब आबादी के ऊर्जा खर्च को वहन करना है। रूस-यूक्रेन युद्ध छिड़ने के बाद, कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल आया।

भारत में तेल लोक सेवा उपक्रमों (PSU) ने रूसी तेल खरीदा। अप्रैल 2022 से जनवरी 2023 तक तीन PSUs की कुल हानि Rs 21,000 करोड़ रुपए यानी 2.5 बिलियन अमेरिकी डॉलर था। ये घाटा सिर्फ इसलिए उठाया गया ताकि घरेलू बाजार में ईंधन की कीमतें स्थिर रहें।

मोदी सरकार ने ऐसे नियम बनाए, जिनके तहत निजी रिफाइनिंग कंपनियों को अपने निर्यात किए गए पेट्रोल का कम से कम 50% घरेलू बाजार में वापस बेचना अनिवार्य कर दिया गया । डीजल के निर्यात पर भी 30% की सीमा लगा दी गई।

साथ ही, बड़े पैमाने पर मुनाफाखोरी को रोकने के लिए निर्यात पर टैक्स लगाया गया। इन रणनीतिक फैसलों से न केवल भारत में, बल्कि दुनिया भर में ईंधन की कीमतों को स्थिर रखने में मदद मिली।

यह बताना जरूरी है कि उस समय ओपेक+ देशों ने कच्चे तेल के उत्पादन में 58.6 लाख बैरल प्रतिदिन की कटौती की थी। भारत के समय पर हस्तक्षेप करने और अहम फैसलों ने ईंधन की कीमत नियंत्रित रखने में मदद की।

अपने एक ट्वीट में पीटर नवारो ने दावा किया, “भारत की बड़ी तेल लॉबी ने दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को क्रेमलिन के लिए एक विशाल रिफाइनिंग केंद्र और तेल मनी लॉन्ड्रोमेट में बदल दिया है।”

सच तो यह है कि भारत 2022 से नहीं, बल्कि कई दशकों से पेट्रोलियम उत्पादों का चौथा सबसे बड़ा रिफाइनकर्ता और निर्यातक रहा है। भारत 150 देशों को पेट्रोलियम उत्पादों का निर्यात करता है।

महत्वपूर्ण बात यह है कि रूस से ‘रियायती कीमतों’ पर खरीदे गए अधिकांश कच्चे तेल को देश की 23 रिफाइनरियों में से एक में संसाधित करने के बाद घरेलू स्तर पर ही खपत कर लिया गया।

यह सच है कि यूरोप, अफ्रीका और एशिया ने भारत से परिष्कृत कच्चा तेल और ईंधन खरीदा। लेकिन, देशों के बीच के लेन-देन को ‘लॉन्ड्रिंग’ नहीं कहा जा सकता।

अपने एक ट्वीट में पीटर नवारो ने दावा किया, “भारत की बड़ी तेल लॉबी ने दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को क्रेमलिन के लिए एक विशाल रिफाइनिंग केंद्र और तेल मनी लॉन्ड्रोमेट में बदल दिया है।”

सच तो यह है कि भारत 2022 से नहीं, बल्कि कई दशकों से पेट्रोलियम उत्पादों का चौथा सबसे बड़ा रिफाइनर और निर्यातक रहा है। भारत 150 देशों को पेट्रोलियम उत्पादों का निर्यात करता है।

महत्वपूर्ण बात यह है कि रूस से ‘रियायती कीमतों’ पर खरीदे गए अधिकांश कच्चे तेल को देश की 23 रिफाइनरियों में से एक में संसाधित करने के बाद घरेलू स्तर पर ही खपत कर लिया गया।

यह सच है कि यूरोप, अफ्रीका और एशिया ने भारत से परिष्कृत कच्चा तेल और ईंधन खरीदा, लेकिन वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में शामिल होने के नाते उन्होंने अपनी इच्छा से ऐसा किया। इसलिए, देशों के बीच के लेन-देन को ‘लॉन्ड्रिंग’ नहीं कहा जा सकता।

एक अन्य ट्वीट में पीटर नवारो ने दावा किया, ” भारत अब प्रतिदिन 1 मिलियन बैरल से अधिक रिफाइन पेट्रोलियम का निर्यात करता है, जो कि रूस से मँगाए गए कच्चे तेल की मात्रा के आधे से भी अधिक है। “

भारत के कुल तेल आयात में रूसी तेल का लगभग 30-35% हिस्सा है। और सभी रिफाइन पेट्रोलियम उत्पादों का 70% घरेलू माँग को पूरा करने के लिए उपयोग किया जाता है। इसलिए, व्यापार और विनिर्माण मामलों के वरिष्ठ सलाहकार के दावों में सच्चाई नहीं है।

हालाँकि, परिष्कृत रूसी कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों के फिर से बेचने या निर्यात पर कभी भी ‘कीमत कवर’ नहीं लगाई गई थी। हाल ही में जुलाई 2025 में रूसी कच्चे तेल से परिष्कृत उत्पादों पर कुछ प्रतिबंध लगाए गए थे।

वित्तीय वर्ष 2024-2025 में यूरोपीय संघ ने भारत से पेट्रोलियम उत्पादों का आयात बढ़ा दिया। ये करीब 221 मिलियन मीट्रिक टन (एमएमटी) हो गया है। यूरोपीय संघ रूसी कच्चे तेल से रिफाइन ईंधन के आयात को निलंबित कर सकता था, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। फ्रांस, नीदरलैंड और बेल्जियम भारत से पेट्रोलियम उत्पादों के शीर्ष आयातक बने हुए हैं।

पीटर नवारो ने भारत विरोधी बयानबाजी के माध्यम से सोशल मीडिया पर सस्ती लोकप्रियता हासिल करने के लिए ‘व्यापार घाटे’ का मुद्दा उठाया।

उन्होंने बेशर्मी से कहा, ” भारत के साथ हमारा 50 अरब डॉलर का व्यापार घाटा है—और वे हमारे डॉलर का इस्तेमाल रूसी तेल खरीदने के लिए कर रहे हैं। वे खूब पैसा कमा रहे हैं और यूक्रेन के लोग मर रहे हैं। “

सच तो यह है कि अमेरिका यूरोपीय संघ, मेक्सिको और यहाँ तक कि ‘कट्टर प्रतिद्वंद्वी’ चीन के साथ भी बड़ा व्यापार घाटा झेल रहा है। जैसा कि पहले बताया गया है, भारत रूसी तेल खरीदने के लिए अमेरिकी डॉलर का इस्तेमाल नहीं करता (क्योंकि यह तेल तीसरे देशों की रिफाइनरियों द्वारा खरीदा जाता है)।

विडंबना यह है कि संयुक्त राज्य अमेरिका रूस से संवर्धित यूरेनियम खरीदता है और पीटर नवारो के संदिग्ध तर्क के अनुसार, यह देश पुतिन के युद्ध कोष को ‘आर्थिक मदद’ है।

रूस से अमेरिका का वर्तमान आयात 2024 में 3 बिलियन डॉलर तक पहुँच गया। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने अगस्त 2025 में दावा किया है कि अमेरिका के साथ देश का द्विपक्षीय व्यापार 20% बढ़ गया है।

पीटर नवारो ने भारत पर ‘रणनीतिक मुफ्तखोरी’ का आरोप लगाया। उन्होंने दावा किया, “भारत रूसी हथियार खरीदना जारी रखे हुए है, जबकि माँग कर रहा है कि अमेरिकी कंपनियाँ संवेदनशील सैन्य तकनीक हस्तांतरित करें और भारत में संयंत्र स्थापित करें।”

एक संप्रभु देश होने के नाते, भारत किसी भी साझेदार देश से हथियार खरीदने का विकल्प चुन सकता है। रूस भारत का एक विश्वसनीय सहयोगी रहा है। इसलिए हथियारों और गोला-बारूद का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता है।

भारत फ्रांस, इजराइल और संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे देशों से भी हथियार खरीदता है। भारत एशिया की एकमात्र बड़ी शक्ति है जो सैन्य रूप से चीन के खतरे का मुकाबला कर सकती है।

भारत और अमेरिका क्वाड और हिंद-प्रशांत रक्षा सहयोग का हिस्सा हैं। चूँकि कूटनीति और व्यापार में कुछ भी मुफ्त नहीं होता, इसलिए भारत-अमेरिका द्विपक्षीय संबंधों में ‘रणनीतिक मुफ्तखोरी’ की कोई अवधारणा नहीं है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के व्यापार एवं विनिर्माण मामलों के वरिष्ठ सलाहकार ने भारत से अमेरिकी आयात पर लगाए गए 50% टैरिफ को सही ठहराया है।

उन्होंने कहा, ” यूक्रेन में शांति का रास्ता नई दिल्ली से होकर गुजरता है। ” सच्चाई यह है कि भारत ने लगातार यूक्रेन और रूस के बीच शांति का आह्वान किया है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद एक साक्षात्कार में कहा है , “रूस और यूक्रेन, दोनों के साथ मेरे घनिष्ठ संबंध हैं।” उन्होंने कहा, “मैं राष्ट्रपति पुतिन के साथ बैठकर कह सकता हूँ कि यह युद्ध का समय नहीं है। मैं राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की से भी दोस्ताना अंदाज में कह सकता हूँ कि भाई, दुनिया में चाहे कितने भी लोग आपके साथ खड़े हों, युद्ध के मैदान में कभी कोई समाधान नहीं निकलेगा।”

भारत और उसकी सरकार ने हमेशा शांति और कूटनीति की वकालत की है। विडंबना यह है कि जो अमेरिका रूस से यूरेनियम खरीदता है, वही अमेरिका उसी देश से कच्चा तेल खरीदने और वैश्विक बाजारों को स्थिर रखने के लिए भारत पर 50% टैरिफ लगा रहा है।

यह कुछ और नहीं बल्कि ट्रम्प प्रशासन का झूठा बहाना है और भारत को बलि का बकरा बनाने की एक सोची समझी साजिश है।



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