नए साल की शुरुआत के साथ ही संगम नगरी प्रयागराज एक बार फिर आस्था के महासागर में डूबने को तैयार है। 3 जनवरी 2026 से शुरू होकर 15 फरवरी 2026 तक चलने वाला माघ मेला 2026 लाखों-करोड़ों श्रद्धालुओं को अपनी ओर खींच रहा है। महाकुंभ 2025 की भव्य सफलता के बाद यह माघ मेला उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार के लिए एक और बड़ी परीक्षा है।
योगी सरकार ने इसे महाकुंभ मॉडल पर आयोजित करने का फैसला किया है, ताकि श्रद्धालुओं को सुरक्षित, स्वच्छ और दिव्य अनुभव मिल सके। अनुमान है कि इस बार 12 से 15 करोड़ श्रद्धालु संगम में पवित्र डुबकी लगाने आएँगे।
मुख्यमंत्री @myogiadityanath जी ने अधिकारियों को निर्देश दिए कि माघ मेला– 2026 के दौरान श्रद्धालुओं के साथ किसी भी प्रकार की मनमानी न हो। इसके लिए होटल, रेस्टोरेंट, वाहन किराया एवं अन्य सेवाओं की दरें निर्धारित कर सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित की जाएं।
साथ ही मुख्यमंत्री जी ने… pic.twitter.com/EOlNYJspyU
— CM Office, GoUP (@CMOfficeUP) January 1, 2026
माघ मेला कुंभ का छोटा रूप माना जाता है, लेकिन इसका धार्मिक महत्व किसी से कम नहीं। त्रिवेणी संगम पर माघ मास में स्नान करने से हजारों अश्वमेध यज्ञों के बराबर पुण्य मिलता है। यह मेला न केवल स्नान का पर्व है, बल्कि तप, संयम और आत्मशुद्धि का भी महोत्सव है।
माघ मेला का धार्मिक महत्व
हिंदू धर्म में माघ मास को विशेष स्थान प्राप्त है। शास्त्रों के अनुसार, माघ में गंगा स्नान करने से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और मोक्ष की प्राप्ति होती है। प्रयागराज का त्रिवेणी संगम गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती का संगम दुनिया का सबसे पवित्र स्थल माना जाता है। यहाँ स्नान करने से व्यक्ति के सभी जन्मों के पाप धुल जाते हैं।
माघ मेला हर साल आयोजित होता है, जबकि कुंभ हर 12 साल में और अर्धकुंभ हर 6 साल में। लेकिन महाकुंभ 2025 की सफलता के बाद यह माघ मेला विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो गया है। श्रद्धालु मानते हैं कि संगम पर माघ स्नान से आत्मा शुद्ध होती है और जीवन में सुख-शांति आती है। यह पर्व संयम, दान और भक्ति का प्रतीक है।
कल्पवास: तपस्या की अनुपम परंपरा
माघ मेले का सबसे खास हिस्सा है कल्पवास। कल्पवास का अर्थ है कल्प (लंबे समय) तक वास करना। श्रद्धालु पौष पूर्णिमा (3 जनवरी 2026) से महाशिवरात्रि (15 फरवरी 2026) तक संगम तट पर टेंट में रहते हैं और कठोर तपस्या करते हैं।
कल्पवास के मुख्य नियम हैं
- जमीन पर सोना, कुश के आसन पर।
- दिन में एक बार सादा भोजन (फल, दूध, सात्विक आहार)।
- ब्रह्मचर्य का पालन।
- रोजाना संगम स्नान।
- भजन-कीर्तन, रामायण-महाभारत पाठ और ध्यान।
शास्त्रों में कहा गया है कि कल्पवास करने से व्यक्ति को 12 साल की तपस्या का फल एक साथ मिल जाता है। यह मोक्ष प्राप्ति का सीधा मार्ग माना जाता है। लाखों कल्पवासी संगम तट पर छोटे-छोटे टेंट लगाकर रहते हैं और पूरी अवधि सादगी से बिताते हैं।
2026 में प्रमुख स्नान तिथियाँ
प्रयागराज के त्रिवेणी संगम पर आयोजित माघ मेला 2026 में छह मुख्य स्नान पर्व हैं, जिनमें तीन अमृत स्नान (शाही स्नान) शामिल हैं। ये तिथियाँ हिंदू पंचांग के अनुसार निर्धारित हैं और प्रत्येक का विशेष धार्मिक महत्व है। शास्त्रों में वर्णित है कि माघ मास में संगम स्नान से सहस्रों अश्वमेध यज्ञों के समान पुण्य प्राप्त होता है तथा पूर्वजन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं (पद्म पुराण, प्रयाग माहात्म्य)।
इन दिनों लाखों-करोड़ों श्रद्धालु संगम तट पर एकत्र होते हैं, जहाँ पवित्र डुबकी के साथ भजन-कीर्तन, दान-पुण्य और तपस्या का वातावरण बनता है। अमृत स्नान के अवसर पर साधु-संतों के अखाड़ों की भव्य पेशवाई निकलती है, जिसमें हाथी-घोड़ों पर सवार नागा साधु, ध्वज-पताकाएँ और ढोल-नगाड़ों की गूँज देखते ही बनती है। यह दृश्य सनातन परंपरा की जीवंत झलक प्रस्तुत करता है।
माघ मेला 2026 में छह मुख्य स्नान पर्व हैं। इनमें तीन अमृत स्नान सबसे महत्वपूर्ण हैं-
3 जनवरी 2026 (पौष पूर्णिमा): यह माघ मेले और कल्पवास की औपचारिक शुरुआत की तिथि है। पहला प्रमुख स्नान इसी दिन होता है। पूर्णिमा के दिन चंद्रमा की पूर्ण कला में स्नान करने से मन की शुद्धि और आत्मिक शांति मिलती है। स्कंद पुराण में उल्लेख है कि पौष पूर्णिमा पर संगम स्नान से व्यक्ति को देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त होता है। इस दिन कल्पवासी टेंट लगाकर तपस्या शुरू करते हैं और मेला क्षेत्र पूरी तरह जीवंत हो उठता है।
14 जनवरी 2026 (मकर संक्रांति): पहला अमृत स्नान इसी दिन होता है। सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने पर यह पर्व मनाया जाता है, जिसे उत्तरायण का आरंभ माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार, इस दिन स्नान, दान और तिल गुड़ का सेवन विशेष पुण्यदायी है (महाभारत, अनुशासन पर्व)। अमृत स्नान में अखाड़ों की पेशवाई सबसे आकर्षक होती है- जूना अखाड़ा, निरंजनी, महानिर्वाणी आदि अखाड़े भव्य जुलूस के साथ संगम की ओर बढ़ते हैं। श्रद्धालु सूर्य देव को अर्घ्य देकर स्नान करते हैं।
29 जनवरी 2026 (मौनी अमावस्या): माघ मेले का सबसे महत्वपूर्ण स्नान पर्व। इस दिन मौन व्रत रखकर स्नान करने की परंपरा है, जिससे इंद्रियों पर संयम और आत्मचिंतन होता है। मत्स्य पुराण में कहा गया है कि मौनी अमावस्या पर प्रयाग स्नान से मोक्ष प्राप्ति का द्वार खुलता है और सभी पाप धुल जाते हैं। यह दिन मेले में सबसे अधिक भीड़ वाला होता है, क्योंकि इसे मुख्य स्नान माना जाता है। कल्पवासी विशेष रूप से इस तिथि का इंतजार करते हैं।
2 फरवरी 2026 (बसंत पंचमी): दूसरा अमृत स्नान। यह विद्या, बुद्धि और ज्ञान की देवी माँ सरस्वती की पूजा का पर्व है। पीले वस्त्र धारण कर, सरस्वती पूजन और स्नान से बुद्धि-विवेक की प्राप्ति होती है। भागवत पुराण में वसंत पंचमी का महत्व वर्णित है। पेशवाई फिर से निकलती है और संगम तट पीले फूलों व वस्त्रों से सज जाता है।
12 फरवरी 2026 (माघ पूर्णिमा): तीसरा अमृत स्नान। माघ पूर्णिमा पर चंद्रमा की पूर्ण शक्ति से स्नान करने से जीवन में सुख-समृद्धि आती है। विष्णु पुराण के अनुसार, इस दिन संगम स्नान से हजारों गोदान का फल मिलता है। अखाड़ों की अंतिम भव्य पेशवाई इस दिन होती है।
15 फरवरी 2026 (महाशिवरात्रि): अंतिम स्नान और मेले का समापन। भगवान शिव की आराधना के साथ स्नान से सभी मनोकामनाएँ पूरी होती हैं। शिव पुराण में महाशिवरात्रि पर प्रयाग स्नान को परम पुण्यकारी बताया गया है।
योगी सरकार ने की है भव्य तैयारियाँ
महाकुंभ 2025 की ऐतिहासिक सफलता के बाद योगी आदित्यनाथ सरकार ने माघ मेला 2026 को भी उसी स्तर पर आयोजित करने का लक्ष्य रखा है। मुख्यमंत्री योगी ने कई बार तैयारियों की समीक्षा की और सख्त निर्देश दिए थे कि 31 दिसंबर 2025 तक सभी व्यवस्थाएँ पूरी हो जाएँ, जोकि पूरी हो चुकी है।
मुख्य तैयारियाँ इस प्रकार हैं-
क्षेत्र विस्तार: मेला क्षेत्र को 800 हेक्टेयर तक बढ़ाया गया है। टेंट सिटी, सेक्टर और घाटों का निर्माण तेजी से हुआ।
सुरक्षा व्यवस्था: हजारों पुलिसकर्मी, सीसीटीवी, ड्रोन और एआई आधारित निगरानी। मुख्य स्नान पर VIP प्रोटोकॉल पूरी तरह समाप्त।
स्वच्छता और स्वास्थ्य: संगम तट पर गहरी सफाई, अस्थाई अस्पताल, एम्बुलेंस और डॉक्टरों की टीम।
यातायात और पार्किंग: विशेष ट्रेनें, बसें और पार्किंग व्यवस्था। ट्रैफिक डायवर्जन प्लान तैयार।
बिजली और पानी: पूरे क्षेत्र में 24 घंटे बिजली और स्वच्छ पेयजल।
पर्यटन सुविधाएँ: पहली बार 4 अस्थाई पर्यटन सूचना केंद्र, जहाँ गाइड और होटल की जानकारी मिलेगी।
बजट: शुरुआत में ही ₹42 करोड़ की स्वीकृत, साथ ही महाकुंभ के बचे बजट से अतिरिक्त व्यवस्थाएँ की गई हैं।
मुख्यमंत्री योगी ने कहा कि माघ मेला सनातन परंपरा का जीवंत रूप है। सरकार का लक्ष्य है कि हर श्रद्धालु को सुरक्षित और दिव्य अनुभव मिले।

योगी सरकार में हिंदू त्योहारों की भव्य परंपरा
योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में 2017 से उत्तर प्रदेश में हिंदू त्योहारों और धार्मिक आयोजनों को नई ऊँचाई मिली है। पहले ये पर्व साधारण और स्थानीय स्तर पर मनाए जाते थे, लेकिन अब वे विश्व स्तरीय, रिकॉर्ड बनाने वाले और करोड़ों श्रद्धालुओं को आकर्षित करने वाले हो गए हैं। सरकार का फोकस सनातन संस्कृति के सम्मान, श्रद्धालुओं की सुरक्षा, सुविधा और स्वच्छता पर रहा है। इससे न केवल आस्था मजबूत हुई, बल्कि पर्यटन और अर्थव्यवस्था को भी बड़ा बढ़ावा मिला। यह परंपरा अब उत्तर प्रदेश की पहचान बन चुकी है।
आइए कुछ प्रमुख उदाहरणों से समझते हैं कि कैसे ये आयोजन भव्य और दिव्य बने-
अयोध्या में दीपोत्सव की अनुपम छटा
दीपावली पर अयोध्या का दीपोत्सव अब विश्व प्रसिद्ध है। योगी सरकार ने इसे राम नगरी की आध्यात्मिक गरिमा से जोड़ा। हर साल सरयू तट पर लाखों दीये जलाए जाते हैं। 2025 में 26 लाख 17 हजार से अधिक दीयों से शहर रोशन हुआ, जिसने दो गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाए- सबसे अधिक दीये जलाने और 2,128 वेदाचार्यों द्वारा सामूहिक सरयू आरती का।
यह आयोजन लेजर शो, रामलीला और सांस्कृतिक कार्यक्रमों से सजा होता है। पहले जहाँ कुछ हजार दीये जलते थे, अब लाखों की संख्या और विश्व रिकॉर्ड यह दर्शाते हैं कि सरकार ने सनातन परंपरा को कितनी भव्यता दी है।
महाकुंभ 2025: विश्व का सबसे बड़ा धार्मिक समागम
प्रयागराज में महाकुंभ 2025 ऐतिहासिक रहा। 66 करोड़ से अधिक श्रद्धालुओं ने संगम में डुबकी लगाई, जो विश्व रिकॉर्ड है। योगी सरकार ने इसे सबसे सुरक्षित, स्वच्छ और व्यवस्थित बनाया। इस आयोजन से राज्य की अर्थव्यवस्था को 3.5 लाख करोड़ रुपए का अनुमानित लाभ मिला। पहले कुंभ मेले में व्यवस्थाएं सीमित होती थीं, लेकिन अब यह वैश्विक स्तर का दिव्य आयोजन बन चुका है।
काँवड़ यात्रा: आस्था में पुष्पवर्षा की बौछार
सावन में कांवड़ यात्रा को भव्य बनाया गया। मुख्यमंत्री योगी खुद हेलीकॉप्टर से कांवड़ियों पर पुष्पवर्षा करते दिखे हैं और रूट का हवाई निरीक्षण करते हैं। 2025 में भी मेरठ-मुजफ्फरनगर मार्ग पर यह नजारा देखा गया। हजारों सीसीटीवी, प्रकाश व्यवस्था, पानी और सुरक्षा के इंतजाम से यात्रा सुगम हुई। पहले असुविधाओं की शिकायतें आती थीं, अब यह आस्था का सुरक्षित और दिव्य पर्व बन चुका है।
वाराणसी में देव दीपावली की रोशनी
कार्तिक पूर्णिमा पर काशी के घाट 25 लाख दीयों से जगमगाते हैं। 2025 में लेजर शो, ग्रीन आतिशबाजी और सांस्कृतिक कार्यक्रमों ने इसे और भव्य बनाया। मुख्यमंत्री योगी खुद भी क्रूज से देव दीपावली का भव्य नजारा देख चुके हैं। यह देवताओं की दिवाली के रूप में विश्व स्तर पर प्रसिद्ध हो रही है।
यह परंपरा सनातन संस्कृति के पुनरुत्थान का प्रतीक है। माघ मेला 2026 भी इसी कड़ी का महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो महाकुंभ मॉडल पर आयोजित हो रहा है। प्रयागराज एक बार फिर विश्व को संदेश देगा कि भारत की आस्था और संस्कृति अमर है।