भारत की न्याय व्यवस्था को दुनिया की सबसे मजबूत और स्वतंत्र न्यायपालिकाओं में गिना जाता है। हम सब यही मानते हैं कि अदालत का दरवाजा खटखटाने पर पीड़ित को न्याय मिलेगा, खासकर जब बात नाबालिग बच्चियों के यौन शोषण जैसे जघन्य अपराधों की हो। लेकिन पिछले कुछ सालों में हाई कोर्ट्स से आने वाले कुछ फैसले पढ़कर रोंगटे खड़े हो जाते हैं।
एक 11 साल की बच्ची का स्तन दबाया जाए, पायजामे का नाड़ा खींचकर खोला जाए और उसे सुनसान जगह पर खींच ले जाया जाए और अदालत कह दे कि यह ‘रेप का प्रयास’ भी नहीं है। सोई हुई बच्ची की पैंटी उतारी जाए, चूमा जाए लेकिन ‘पेनिट्रेशन’ नहीं हुआ तो रेप नहीं। कपड़ों के ऊपर से छूना ‘स्किन-टू-स्किन’ संपर्क नहीं, इसलिए POCSO के तहत अपराध नहीं। अकेले आदमी का मुँह दबाकर, कपड़े उतारकर रेप करना ‘असंभव’ लगता है, इसलिए आरोपित बरी…
ये वाक्य कोई कल्पना नहीं, बल्कि अलग-अलग हाई कोर्ट्स के लिखित फैसलों से लिए गए हैं। ये फैसले न सिर्फ कानूनी व्याख्या के नाम पर पीड़िताओं की पीड़ा को कमतर आँकते हैं, बल्कि समाज में यह संदेश देते हैं कि अपराधी तकनीकी दाँव-पेच से बच सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने कुछ मामलों में दखल देकर इन्हें पलटा है और जजों के लिए संवेदनशीलता की नई गाइडलाइंस बनाने की बात कही है, लेकिन सवाल बरकरार है कि क्या न्याय सिर्फ कानून की किताबी परिभाषाओं तक सीमित रह जाना चाहिए? या उसे पीड़िता की गरिमा, उसके ट्रॉमा और समाज की सुरक्षा को भी उतनी ही गंभीरता से लेना चाहिए?
आगे हम इन्हीं कुछ चर्चित और विवादास्पद फैसलों को विस्तार से देखेंगे और उन फैसलों को समझेंगे कि आखिर क्यों सुप्रीम कोर्ट को अब जजों के लिए गाइडलाइन्स बनाने जैसा फैसला देना पड़ा।
इलाहाबाद हाई कोर्ट के विवादित फैसले पर भड़का SC, गाइडलाइन्स बनाने को कहा
सबसे ताजा और चर्चित मामला इलाहाबाद हाई कोर्ट का है, जो 2025 में सामने आया था। इसमें 11 साल की एक मासूम बच्ची के साथ तीन युवकों ने घिनौना काम किया। आरोपियों ने बच्ची का स्तन दबाया, पायजामे का नाड़ा खींचकर खोला और उसे पुलिया के नीचे एक सुनसान जगह पर खींचकर ले जाने की कोशिश की। बच्ची के चिल्लाने पर आसपास के लोग दौड़े आए, जिससे आरोपित भाग निकले। निचली अदालत ने इसे रेप का प्रयास मानते हुए IPC की धारा 376 और POCSO एक्ट की धारा 18 के तहत समन जारी किया।
लेकिन इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्रा ने इसे हल्का करार दे दिया। कोर्ट ने कहा कि सिर्फ स्तन दबाना, नाड़ा तोड़ना और खींचना रेप या रेप के प्रयास की श्रेणी में नहीं आता, क्योंकि आरोपित ने खुद कपड़े नहीं उतारे और आगे का कोई कदम नहीं उठाया। कोर्ट ने इसे सिर्फ महिलाओं की गरिमा भंग करने वाली धारा 354-B में डाल दिया।
यह फैसला आते ही पूरे देश में हंगामा मच गया। लोगों ने कहा कि कोर्ट पीड़िता की तकलीफ को समझने की बजाय कानून की इतनी सख्त व्याख्या कर रहा है कि अपराधी बच निकलें। चार महीने सोच-विचार कर दिया गया यह फैसला संवेदनहीन लग रहा था। आखिरकार सुप्रीम कोर्ट ने 10 फरवरी 2026 को इस फैसले को रद्द कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि स्तन दबाना और पायजामे का नाड़ा खोलना रेप का प्रयास ही है। कोर्ट ने हाई कोर्ट की टिप्पणियों को ‘अमानवीय, संवेदनहीन और घृणित’ बताया। साथ ही कोर्ट ने राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी (NJA) को कमेटी बनाने को कहा, जो जजों के लिए यौन अपराधों के मामलों में संवेदनशीलता और करुणा की नई गाइडलाइंस तैयार करेगी।
यह फैसला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सिर्फ एक केस नहीं, बल्कि पूरे न्यायिक सिस्टम में संवेदनशीलता की कमी को उजागर करता है। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि जजों को पीड़िता की मानसिक और शारीरिक पीड़ा को समझना चाहिए, न कि सिर्फ कानून की किताबी व्याख्या करना। लेकिन सवाल यह है कि जब तक ऐसी गाइडलाइंस नहीं बनतीं, तब तक कितनी और बच्चियाँ न्याय से वंचित रहेंगी? क्या जजों को ट्रेनिंग की जरूरत नहीं कि वे अपराध की गंभीरता को महसूस करें, न कि अपराधी को बचाने के रास्ते ढूँढें?
छत्तीसगढ़ HC का मामला- बिना पेनिट्रेशन के इजैक्युलेशन रेप नहीं
यह मामला लगभग 20 साल पुराना है, जिसमें एक व्यक्ति पर बलात्कार का आरोप लगा था। निचली अदालत ने उसे रेप का दोषी मानकर सजा सुनाई। लेकिन छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने अपील में फैसला पलट दिया। कोर्ट ने कहा कि महिला के निजी अंग पर पुरुष अंग रखकर बिना पेनिट्रेशन के स्खलन हो जाना बलात्कार नहीं है। इसके लिए IPC की धारा 375 के तहत पेनिट्रेशन जरूरी है। कोर्ट ने सजा को रेप से बदलकर रेप के प्रयास (धारा 376 के साथ 511) में कर दिया।
कोर्ट ने तर्क दिया कि कानून की व्याख्या सख्ती से करनी चाहिए और अपराध के हर तत्व को साबित होना जरूरी है। कोर्ट ने माना कि यह कृत्य गंभीर है, लेकिन इसे रेप की श्रेणी में नहीं डाला जा सकता। कोर्ट ने कहा कि अपराध की गंभीरता के हिसाब से सजा होनी चाहिए, लेकिन कानूनी प्रावधानों का पालन भी उतना ही जरूरी है।
यह फैसला उठाता है बड़ा सवाल कि क्या कानून की किताबी व्याख्या पीड़िता की गरिमा और ट्रॉमा से ऊपर है? पीड़िता ने जो सहन किया, उसकी मानसिक पीड़ा को कोर्ट ने नजरअंदाज कर दिया। सिर्फ पेनिट्रेशन न होने की बात पर अपराधी को कम सजा देना क्या न्याय है? ऐसे फैसले अपराधियों को हौसला देते हैं कि अगर पूरा अपराध न कर पाएँ तो सजा भी कम मिलेगी। क्या जजों को यह नहीं सोचना चाहिए कि यौन अपराधों में पीड़िता की सहमति और गरिमा का हनन ही सबसे बड़ा अपराध है?
बॉम्बे हाई कोर्ट का स्किन-टू-स्किन मामला
बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर बेंच ने 2021 में एक चौंकाने वाला फैसला दिया था। एक व्यक्ति पर 12 साल की बच्ची का स्तन दबाने का आरोप था। उसने बच्ची को गुड़ का लालच देकर घर बुलाया। निचली अदालत ने POCSO एक्ट के तहत सजा सुनाई। लेकिन जस्टिस पुष्पा गणेदीवाला ने कहा कि कपड़ों के ऊपर से छूना ‘स्किन-टू-स्किन’ संपर्क नहीं है, इसलिए यह POCSO के तहत यौन शोषण नहीं। कोर्ट ने इसे सिर्फ IPC की धारा 354 (महिलाओं की लज्जा भंग) में डाला।
कोर्ट ने तर्क दिया कि POCSO एक्ट में यौन शोषण के लिए यौन इरादे से सीधा शारीरिक संपर्क जरूरी है। अगर कपड़े उतारे होते या अंडरगारमेंट में हाथ डाला होता, तब बात अलग होती। जज ने कहा कि मामले में टॉप हटाकर स्तन दबाने की पुष्टि नहीं है, इसलिए यह यौन शोषण नहीं।
यह फैसला बेहद संवेदनहीन लगता है। एक बच्ची के साथ ऐसा व्यवहार और कोर्ट कहता है कि कपड़े के ऊपर से छूना अपराध नहीं? क्या बच्ची की मानसिक ट्रॉमा कपड़ों की मोटाई पर निर्भर करती है? यह फैसला पीड़ितों को न्याय से दूर करता है और अपराधियों को तकनीकी बहाने देता है। सुप्रीम कोर्ट ने बाद में इस पर रोक लगाई, लेकिन सवाल है कि ऐसे जज कैसे फैसले देते हैं जो समाज में गलत संदेश जाते हैं?
बॉम्बे हाई कोर्ट का ‘अकेले असंभव’ वाला फैसला
इसी जस्टिस पुष्पा गणेदीवाला ने एक और विवादित फैसला दिया था। एक युवती के साथ रेप के मामले में निचली अदालत ने 26 साल के आरोपी को दोषी ठहराया। लेकिन हाई कोर्ट ने उसे बरी कर दिया। जज ने कहा कि बिना हाथापाई के मुंह दबाना, कपड़े उतारना और रेप करना अकेले आदमी के लिए ‘बेहद असंभव’ लगता है।
कोर्ट ने पीड़िता के बयान पर शक जताया और कहा कि ऐसी घटना अकेले संभव नहीं। जज का मानना था कि पीड़िता का विरोध न होना और कोई चोट न लगना अपराध को कमजोर करता है। इस आधार पर आरोपी को रेप से बरी कर दिया गया।
यह सोच ही गलत है। क्या रेप सिर्फ तभी होता है जब जबरदस्ती हाथापाई हो? कई बार डर से पीड़िता विरोध नहीं कर पाती। जज का यह कहना कि अकेला आदमी ऐसा नहीं कर सकता, पीड़िताओं के अनुभव को नकारता है। ऐसे फैसले अपराधियों को बचाते हैं और पीड़िताओं को शर्मिंदगी महसूस कराते हैं। जस्टिस गणेदीवाला का कार्यकाल बढ़ाया गया, लेकिन ऐसे फैसलों से न्यायिक व्यवस्था पर सवाल उठते हैं।
कलकत्ता HC- सोई बच्ची की पैंटी उतारी, लेकिन पेनिट्रेशन नहीं तो रेप नहीं
साल 2010 की एक घटना में 11 साल की बच्ची घर में सो रही थी। दीपक सिंघा नाम का व्यक्ति रात को घुसा, बच्ची को दबोचा, चूमा और पैंटी उतारकर रेप की कोशिश की। बच्ची के चिल्लाने पर लोग आए और आरोपित भाग निकला। निचली अदालत ने रेप मानकर आजीवन कारावास की सजा दी। लेकिन कलकत्ता हाई कोर्ट ने 2022 में सजा कम कर दी। कोर्ट ने कहा कि पेनिट्रेशन नहीं हुआ, इसलिए यह रेप नहीं, सिर्फ रेप का प्रयास है।
कोर्ट ने तर्क दिया कि रेप के लिए कम से कम स्पर्श स्तर का पेनिट्रेशन जरूरी है। पीड़िता और गवाहों ने भी पेनिट्रेशन न होने की बात मानी। कोर्ट ने कहा कि बच्ची के विरोध और लोगों के आने से आरोपित नाकाम रहा।
फिर वही सवाल कि क्या यौन अपराध सिर्फ पेनिट्रेशन तक सीमित है? बच्ची की पैंटी उतारना, चूमना, दबोचना- ये सब क्या कम अपराध हैं? कोर्ट पीड़िता की उम्र और ट्रॉमा को भूल गया। ऐसे फैसले कानून को तकनीकी बनाते हैं और अपराधी को राहत देते हैं। क्या जजों को यह नहीं समझना चाहिए कि बच्चियों के साथ ऐसा व्यवहार जीवनभर का दाग छोड़ता है?
जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट ने भतीजी के साथ रेप की कोशिश में दी थी जमानत
फैयाज अहमद डार पर अपनी नाबालिग भतीजी के साथ रेप की कोशिश का आरोप था। उसने पीड़िता का मुँह टेप से बंद किया, उसके और अपने कपड़े उतारे। लेकिन भाई के आने पर भाग गया। IPC और POCSO के तहत केस चला। लेकिन जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट ने 2021 में जमानत दे दी। कोर्ट ने कहा कि बिना पेनिट्रेशन के यह रेप का प्रयास नहीं, सिर्फ यौन हमला (धारा 354 और POCSO 7/8) है।
जस्टिस संजीव कुमार ने कहा कि कपड़े उतारना तैयारी है, प्रयास नहीं। मेडिकल रिपोर्ट में कोई चोट नहीं थी। कोर्ट ने कहा कि तैयारी और प्रयास में पतला फर्क है, और जमानत नियम है।
यह फैसला दिखाता है कि कैसे तकनीकी बहाने से अपराधी बाहर घूमते हैं। भतीजी के साथ ऐसा करना कितना घिनौना है, लेकिन कोर्ट ने पेनिट्रेशन न होने को आधार बनाया। क्या परिवार की बच्ची के साथ विश्वासघात की गंभीरता कम है? ऐसे फैसले समाज में डर पैदा करते हैं कि न्याय मिलना मुश्किल है। जजों को पीड़िता की सुरक्षा पहले सोचनी चाहिए, अपराधी की जमानत बाद में।
उम्मीद जगाने वाला है सुप्रीम कोर्ट का फैसला, ये मील का पत्थर
ये तमाम फैसले पढ़कर दिल बैठ जाता है। छोटी-छोटी बच्चियाँ, जो अभी दुनिया को समझ भी नहीं पाईं, उनके साथ जो होता है, वह सिर्फ शरीर पर हमला नहीं, उनकी पूरी जिंदगी पर वार होता है। लेकिन जब अदालतें तकनीकी दलीलों में उलझकर अपराध को हल्का कर दें, तो पीड़िता को लगता है कि उसकी चीख कोई सुन ही नहीं रहा। न्याय का मतलब सिर्फ कानून की किताब पढ़ना नहीं, उस किताब को इंसानी दर्द से जोड़ना भी है।
सुप्रीम कोर्ट का 10 फरवरी 2026 का फैसला और जजों के लिए संवेदनशीलता की नई गाइडलाइंस बनाने का आदेश एक बड़ी उम्मीद जगाता है। यह बताता है कि सबसे ऊपरी अदालत पीड़िताओं की पीड़ा समझ रही है। अब जरूरत है कि ये गाइडलाइंस सिर्फ कागज पर न रहें। जजों की ट्रेनिंग में पीड़िताओं की कहानियाँ शामिल हों, मनोवैज्ञानिकों की राय ली जाए, ताकि हर बेंच पर बैठा जज यह महसूस करे कि उसके एक शब्द से एक मासूम का पूरा बचपन बच या बर्बाद हो सकता है।
हम सबको भी सोचना होगा। जब तक समाज में बच्चियों को सुरक्षित नहीं माना जाएगा, तब तक अदालतें कितनी ही कोशिश कर लें, न्याय अधूरा रहेगा। उम्मीद है, यह नया कदम सच में बदलाव लाएगा और हर बच्ची को भरोसा दिलाएगा कि उसकी आवाज सुनी जाएगी। क्योंकि न्याय तब ही पूरा होता है, जब वो प्रभावित पक्ष को पूरी तरह से न्याय दे।













