रिटायर्ड जस्टिस बालकृष्ण सुदर्शन रेड्डी को विपक्षी INDIA गठबंधन ने 2025 के उपराष्ट्रपति चुनाव के लिए अपना आधिकारिक उम्मीदवार घोषित किया है। इस गठबंधन में कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, राजद, सपा, डीएमके, और अन्य क्षेत्रीय दल शामिल हैं। इस चुनाव में उनका मुकाबला NDA के उम्मीदवार सी.पी. राधाकृष्णन से होगा।
केंद्र की एनडीए सरकार के खिलाफ एकजुट होकर चुनाव लड़ रही INDIA गठबंधन ने रेड्डी को एक न्यायप्रिय, निष्पक्ष और संवैधानिक मूल्यों से जुड़े चेहरे के तौर पर पेश किया है। हालाँकि जस्टिस रेड्डी अपने कार्यकाल के दौरान और सेवानिवृत्ति के बाद भी अपने फैसलों से कॉन्ग्रेस के प्रति अपनी वफादारी को साफ तौर पर जाहिर कर दिया है।
गृह मंत्री ने उजागर की असलियत
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने शुक्रवार (22 अगस्त 2025) को जस्टिस बी. सुदर्शन रेड्डी पर तीखा हमला बोला।,उन्होंने जस्टिस रेड्डी के पुराने न्यायिक निर्णयों के जरिए वामपंथी उग्रवाद का समर्थन करने का आरोप लगाया।
केरल में एक कार्यक्रम में बोलते हुए गृह मंत्री ने कहा, “विपक्ष (कॉन्ग्रेस) के उपराष्ट्रपति पद के उम्मीदवार सुदर्शन रेड्डी वही व्यक्ति हैं जिन्होंने सलवा जुडूम पर ऐसा फैसला दिया जो नक्सलवाद के समर्थन में था। अगर यह फैसला न दिया गया होता, तो 2020 तक उग्रवाद समाप्त हो चुका होता।”
कांग्रेस ने वामपंथियों के दबाव में एक ऐसे व्यक्ति को उपराष्ट्रपति उम्मीदवार बनाया है, जो नक्सलियों के समर्थक हैं। pic.twitter.com/lDW6CkKOLA
— Amit Shah (@AmitShah) August 22, 2025
अमित शाह ने आगे कहा, “केरल ने नक्सलवाद की पीड़ा झेली है और उग्रवाद का दंश सहा है। केरल की जनता निश्चित रूप से देखेगी कि कैसे वामपंथियों के दबाव में कॉन्ग्रेस ने ऐसा उम्मीदवार चुना जिसने सुप्रीम कोर्ट जैसे मंच का इस्तेमाल वामपंथी उग्रवाद और नक्सलवाद को समर्थन देने के लिए किया।”
गृह मंत्री के बयान पर सुदर्शन रेड्डी ने भी अपनी प्रतिक्रिया दी है। रिपोर्ट्स के अनुसार, पीटीआई भोषा से बात करते हुए रेड्डी ने कहा कि सलवा जुडूम पर फैसला उनका अपना नहीं बल्कि सुप्रीम कोर्ट का था। उन्होंने कहा कि इस मुद्दे पर वह गृह मंत्री के साथ बहस नहीं करना चाहते।
जस्टिस के तौर पर विवादित रहा सफर
जस्टिस रेड्डी का जन्म 8 जुलाई 1946 को तेलंगाना के रंगा रेड्डी ज़िले में एक किसान परिवार में हुआ। उनका न्यायिक करियर 1995 में आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट के न्यायाधीश के तौर पर शुरू हुआ। इसके बाद वे गुवाहाटी हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बने। 2007 से 2011 तक भारत के सर्वोच्च न्यायालय में बतौर जस्टिस अपनी सेवा भी दी।
जस्टिस रेड्डी के कार्यकाल में कई अहम फैसले आए, जिनमें मानवाधिकार, प्रशासनिक पारदर्शिता और सामाजिक न्याय से जुड़े विषय शामिल थे। लेकिन उनके कुछ ऐसे भी फैसलों रहे जिन पर विवाद हुआ और उसकी आलोचना आज भी होती आ रही है। आइए जानते हैं उन फैसलों के बारे में।
सलवा जुडूम को भंग करने का फैसला
छ्त्तीसगढ़ में नक्सलवादल को जड़ से खत्म करने के लिए सरकार ने ‘सलवा जुडूम’ अभियान चलाया था। खास बात ये है कि ये अभियान छत्तीसगढ़ की तत्कालीन कॉन्ग्रेस सरकार के समर्थन से ही चलाया गया था। इसका उद्देश्य राज्य में नक्सली हिंसा को रोककर शांति स्थापित करना था। इस अभियान की शुरुआत जून 2005 में कॉन्ग्रेस नेता महेंद्र कर्मा ने की थी।
कई वर्षों तक जनजातीय क्षेत्रों में हिंसा कर अपना गढ़ बना चुके नक्सलियों को खत्म करने में जनजातीय लोगों के हौसलों को सैन्य और पुलिस समर्थन भी मिलने लगा था। लेकिन जस्टिस रेड्डी और जस्टिस एस.एस. निज्जर की पीठ ने अपने फैसले में सलवा जुडूम अभियान को असंवैधानिक करार दिया।
5 जुलाई 2011 ने इसे भंग करते हुए पीठ ने फैसला में कहा कि सरकार गरीब आदिवासियों को बंदूक थमा कर अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी से नहीं बच सकती। जस्टिस रेड्डी के इस फैसले ने नक्सलियों के खिलाफ जंग को स्पष्ट तौर पर कमजोर कर दिया।
भोपाल गैस त्रासदी मामला
1984 की त्रासदी में हजारों लोगों की मौत हुई थी। CBI ने सुप्रीम कोर्ट में क्यूरेटिव याचिका दायर कर पुराने फैसले को चुनौती दी थी। याचिकाकर्ताओं ने यूनियन कार्बाइड और वॉरेन एंडरसन पर गंभीर आरोप लगाने की माँग की थी।
जस्टिस रेड्डी उस पाँच सदस्यीय पीठ का हिस्सा थे जिसने याचिका खारिज कर दी। इसका फैसला मई 2012 में आया था। इस फैसले से पीड़ितों को न्याय मिलने का एक मौका तो गया ही पर साथ ही जस्टिस रेड्डी और पीठ ने कॉन्ग्रेस की छत्रछाया में पल रही अमेरिकी कंपनी को भी साफ तौर पर बचाने का काम किया।
अर्मी कॉलेज की सीटों में आरक्षण मामला
दिल्ली स्थित आर्मी कॉलेज ऑफ मेडिकल साइंसेज़ (ACMS) एक प्रतिष्ठित मेडिकल संस्थान है, जिसकी स्थापना भारतीय सेना द्वारा की गई थी। इस कॉलेज में MBBS की सीटें उपलब्ध हैं और लंबे समय से यह परंपरा रही है कि यहाँ प्रवेश केवल सेना के कार्यरत या सेवानिवृत्त कर्मियों के बच्चों को ही दिया जाता है।
इस नीति के खिलाफ कुछ याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। उनका तर्क था कि कॉलेज सार्वजनिक संसाधनों और रक्षा मंत्रालय के अधीन आता है, इसलिए इसकी सीटें सिर्फ एक वर्ग के लिए आरक्षित करना अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन है।
जस्टिस बी. सुदर्शन रेड्डी की पीठ ने इस याचिका पर सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया कि ACMS की सभी सीटें केवल सैन्यकर्मियों के बच्चों के लिए आरक्षित रहेंगी। फैसले में यह भी कहा गया कि चूंकि यह संस्थान रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत आता है और इसका संचालन सेना की आवश्यकताओं के अनुरूप होता है, इसलिए इसकी प्रवेश नीति को संवैधानिक रूप से वैध माना जा सकता है।
इसके अलावा रेड्डी ने 4 जुलाई 2011 को केंद्र सरकार को काले धन पर ढिलाई बरतने के लिए फटकार लगाई थी और एक विशेष जाँच टीम (SIT) गठित करने का निर्देश दिया। यह फैसला भ्रष्टाचार के खिलाफ एक मजबूत कदम माना गया था। लेकिन अब कॉन्ग्रेस पार्टी के नेतृत्व वाला INDIA गठबंधन अब उसी व्यक्ति को अपना उम्मीदवार बना रहा है। इससे सवाल उठना तो बनता है कि आखिर ऐसे व्यक्ति को उम्मीदवार के तौर पर कॉन्ग्रेस ने क्यों खड़ा किया?
क्यों किया गया जस्टिस रेड्डी का चयन?
रेड्डी की उम्मीदवारी को विपक्ष ने न्यायप्रिय और संवैधानिक मूल्यों से जुड़ा बताया है। लेकिन यह चयन वैचारिक कम और रणनीतिक अधिक है। INDIA गठबंधन के तहत DMK की माँग थी कि उम्मीदवार दक्षिण भारत से हो वहीं, TMC चाहती थी कि चेहरा गैर-राजनीतिक हो, और कॉन्ग्रेस को एक ऐसा व्यक्ति चाहिए था जिसकी छवि बेदाग हो। रेड्डी इन तीनों शर्तों पर खरे उतरते हैं।
इसके साथ ही जस्टिस बालकृष्ण सुदर्शन रेड्डी का नाम उम्मीदवार के तौर पर लाना राजनीतिक गलियारों में अपेक्षित नहीं था। जाहिर तौर पर कॉन्ग्रेस उनके जरिए संविधान की रक्षा, संघ विचारधारा के खिलाफ वैचारिक लड़ाई जैसे विषय पर बात करके और दक्षिण भारत के वोट बैंक को अपनी ओर खींचने की कोशिश कर रही है।
उपराष्ट्रपति जैसे संवैधानिक पद के लिए उनका चयन एक गंभीर सवाल उठाता है। जैसे कि इस पद के लिहाज से क्या क्या विपक्ष ने एक निष्पक्ष न्यायाधीश को चुना है या ढोंग करके एक ऐसा चेहरा लोगों के सामने पेश किया जो उनके वैचारिक और क्षेत्रीय समीकरणों को साधता है?
कब होगा उपराष्ट्रपति के लिए चुनाव
संसद में 21 जुलाई 2025 को मानसून सत्र के पहले दिन जगदीप धनखड़ ने स्वास्थ्य कारणों का हवाला देते हुए अपने उपराष्ट्रपति के पद से इस्तीफा दे दिया। इशके बाद नए उपराष्ट्रपति को लेकर दोबारा चुनाव प्रक्रिया की जानी है।
उपराष्ट्रपति पद के लिए मतदान 9 सितंबर 2025 को होना निर्धारित किया गया है और उसी दिन मतगणना भी होगी। नामांकन दाखिल करने की अंतिम तिथि 21 अगस्त 2025 थी, जबकि प्रत्याशी अपना नाम 25 अगस्त तक वापस ले सकते हैं।
उपराष्ट्रपति का चुनाव संसद के दोनों सदनों के सांसदों द्वारा किया जाता है। यह चुनाव संविधान के अनुच्छेद 64 और 68 के तहत संचालित होता है और 1952 के राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति चुनाव अधिनियम के अनुसार चुनाव आयोग द्वारा अधिसूचित किया जाता है।


