गोयल ने कहा कि US पर इतना ज़्यादा फोकस उन्होंने पहले भी देखा है। उन्होंने कहा, “यह एक ऐसी चीज़ थी जिसे मैंने MPC मेंबर के तौर पर सच में अनुभव किया जब हम मार्केट के साथ बातचीत करते थे। मैंने पाया कि US पर इतना ज्यादा फोकस है। ऐसा शायद इसलिए है, क्योंकि वहाँ से ज्यादा जानकारियाँ आती हैं। वहाँ से बहुत ज्यादा FDI और डेटा उपलब्ध होता है।”
अर्थशास्त्री गोयल ने कहा कि कैपिटल फ्लो और एक्सचेंज रेट जैसे संवेदनशील मामलों में भी भारत को जितना आश्रित माना जाता है, वह उतना नहीं है।
उन्होंने बताया कि भारत में सिलसिलेबार तरीके से कैपिटल अकाउंट कन्वर्टिबिलिटी है। इससे ब्याज दरों के प्रति संवेदनशील विदेशी पूंजी प्रवाह सीमित रहता है। इसी वजह से भारत अमेरिका से अलग रहते हुए अपनी ब्याज दरों पर फैसले ले पाया।
उन्होंने कहा कि अगर अमेरिका सहयोग के लिए तैयार नहीं होता है, तो देश के पास विकल्प है। इसलिए भारत को सिर्फ अमेरिका-ट्रेड डील को लेकर परेशान होने की जरूरत नहीं है, बल्कि उपलब्ध और उभरते विकल्पों पर भरोसा करना चाहिए।
आशिमा गोयल के मुताबिक, भारत की व्यापारिक निर्भरता दूसरे एशियाई देशों जैसे- जापान, दक्षिण कोरिया, की तुलना में अमेरिका पर कम है। इसलिए अमेरिका के साथ व्यापार में आ रही बाधा से भारत की अर्थव्यवस्था को बड़ा झटका नहीं लगेगा। हालाँकि वहाँ बड़ी संख्या में एनआरआई रहते हैं और कई क्षेत्रों में सहयोग होता है, जिससे भारत को फायदा है, लेकिन इसकी कीमत किसान नहीं चुका सकते।
गोयल के मुताबिक, भारत ने अब तक जिन एफटीए (FTA) पर साइन किए हैं, उनमें दोनों देशों की प्राथमिकताओं का सम्मान हुआ है। ऐसे में नतीजे दोनों देशों के लिए बेहतर रहे हैं। अमेरिका के साथ भले देर हो जाए, लेकिन ट्रेड डील ऐसा होना चाहिए जिसमें भारत का सम्मान हो और शर्ते बेहतर मिले, जिससे किसानों और बिजनेसमैन का नुकसान न हो।













