नायरा माइक्रोसॉफ्ट दिल्ली हाईकोर्ट

मार्केटिंग कंपनी नायरा एनर्जी ने माइक्रोसॉफ्ट के खिलाफ दिल्ली हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। यह रूस की भागीदारी वाली भारत की एक प्रमुख तेल रिफाइनिंग और मार्केटिंग कंपनी है। कंपनी का कहना है कि माइक्रोसॉफ्ट ने बिना किसी पूर्व सूचना के उसके ईमेल एक्सेस जैसी जरूरी डिजिटल सेवाएँ अचानक बंद कर दी।

नायरा एनर्जी का कहना है कि माइक्रोसॉफ्ट के इस कदम से पूरे भारत भर के संचालन पर बुरा असर पड़ा है और कंपनी की रोजमर्रा की गतिविधियाँ बाधित हो गई हैं।

प्रतिबंधों का परिणाम और परिचालन पर प्रभाव

हाल ही में यूरोपीय संघ (EU) ने नायरा एनर्जी पर प्रतिबंध लगाए हैं क्योंकि उसका संबंध रूसी तेल कंपनी रोजनेफ्ट (Rosneft) से है। इस फैसले के बाद कई असर दिखाई दिए। हालाँकि माइक्रोसॉफ्ट का मुख्यालय अमेरिका में है और नायरा का तर्क है कि माइक्रोसॉप्ट कंपनी अमेरिकी या भारतीय कानूनों के तहत किसी भी तरह से यूरोपीय संघ के प्रतिबंधों को लागू नहीं कर सकती।

EU के प्रतिबंधों के बाद कम से कम दो जहाजों ने नायरा की वडिनार रिफाइनरी से रिफाइंड प्रोडक्ट्स की लोडिंग टाल दी। साथ ही एक टैंकर जो रूसी Urals क्रूड लेकर आ रहा था, उसे रास्ते में ही मोड़ दिया गया। इस पूरे संकट के बीच नायरा के CEO ने इस्तीफा दे दिया है और उनकी जगह अब सर्गेई डेनिसोव (Sergey Denisov) को नया CEO नियुक्त किया गया है।

नायरा ने की कोर्ट से तत्काल राहत की माँग

याचिका में अंतरिम आदेश और सेवाओं की तुरंत बहाली की माँग की गई है। नायरा का कहना है कि माइक्रोसॉफ्ट ने यह कदम ‘एकतरफा, बिना किसी पूर्व सूचना, सलाह या बातचीत के’ उठाया और इसे ‘कानूनी अनुपालन (compliance)’ के नाम पर किया गया।

खास बात यह है कि नायरा ने जिन सेवाओं का उपयोग किया, वे ‘पूरी तरह से भुगतान की गई लाइसेंस (fully paid-up licences)’ के तहत ली गई थीं। यही वजह है कि यह कार्रवाई और भी अनुचित लगती है।

नायरा का कहना है कि माइक्रोसॉफ्ट की इस कार्रवाई की वजह से उन्हें अपने ही डाटा और खुद के बनाए टूल्स और प्रोडक्ट्स तक पहुँच नहीं मिल पा रही है। मंगलवार (29 जुलाई 2025) को लगाई गई इस रोक से उनके रोजमर्रा के कामकाज पर सीधा असर पड़ा है।

भारत की ईंधन अर्थव्यवस्था में रणनीतिक महत्व

अपनी याचिका में कंपनी ने भारत के ऊर्जा बुनियादी ढाँचे में अपने महत्वपूर्ण योगदान को रेखांकित किया है। कंपनी देश की कुल रिफाइनिंग क्षमता के लगभग 8% हिस्से के लिए जिम्मेदार है और 7% पेट्रोल पंप का संचालन करती है। इसके अलावा कंपनी भारत की 8% पॉलीप्रोपाइलीन उत्पादन क्षमता भी विकसित कर रही है।

कंपनी ने मौजूदा चुनौतियों के बावजूद यह भरोसा दिलाया है कि वह पूरे देश में ईंधन की आपूर्ति बिना किसी रुकावट के जारी रखेगी और भारतीय नियमों का पूरी तरह से पालन करते हुए काम करती रहेगी।

इस महीने की शुरुआत में यूरोपीय संघ ने रूस के खिलाफ प्रतिबंधों के 18वें पैकेज के तहत नायरा की वाडिनार रिफाइनरी पर प्रतिबंध लगा दिए। इन प्रतिबंधों में संपत्तियों को फ्रीज करना, शिपिंग और बीमा पर रोक, और रूसी कच्चे तेल की कीमत की सीमा में कटौती शामिल हैं। हालाँकि, भारत सरकार ने एकतरफा अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों को मानने से स्पष्ट इनकार किया है।

इस पर प्रतिक्रिया देते हुए नायरा एनर्जी ने यूरोपीय संघ के इस कदम को ‘अनुचित और गैरकानूनी’ बताया। कंपनी ने कहा, “नायरा एनर्जी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक दबाव और यूरोपीय संघ के प्रतिबंधों का सामना करना पड़ रहा है, जिनका कोई कानूनी आधार भी नहीं है। यह एकतरफा कदम बिल्कुल निराधार आरोपों पर आधारित है और यह अंतरराष्ट्रीय कानून और भारत की संप्रभुता का उल्लंघन है।

नायरा ने कहा, “ध्यान देने योग्य बात यह है कि कई यूरोपीय देश आज भी रूसी ऊर्जा का आयात कर रहे हैं, लेकिन एक ऊँचे नैतिक स्तर का दिखावा करते हुए एक भारतीय रिफाइनरी पर सवाल उठा रहे हैं, जो कि रूसी कच्चे तेल को परिशोधित करके भारत की 1.4 अरब आबादी और व्यवसायों के लिए उपयोग करती है।”

इस मामले की सुनवाई दिल्ली हाई कोर्ट में जल्दी ही होने की उम्मीद है। वहीं माइक्रोसॉफ्ट ने इस पूरे मामले पर कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया है।

पश्चिमी प्रतिबंधों की रणनीति में भू-राजनीतिक हथियार के रूप में बिग टेक

2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद कई बड़ी पश्चिमी कंपनियों ने रूस में अपने कामकाज को निलंबित कर दिया था। इन कंपनियों ने इसका कारण अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों का पालन करना और बदलती राजनीतिक परिस्थितियों को बताया।

वीजा और मास्टरकार्ड जैसी बड़ी वित्तीय कंपनियों ने रूसी बैंकों से जुड़ी सेवाएँ बंद कर दीं, जिससे रूस के बाहर लेन-देन (cross-border payments) पर बड़ा असर पड़ा।

गूगल जैसी टेक कंपनियों ने भी कई सेवाएँ, विज्ञापन और कमाई के रास्ते (monetisation channels) रूस में सीमित कर दिए। मैकडॉनल्ड्स जैसी कंपनियों ने भी रूस से पूरी तरह कारोबार समेट लिया, लेकिन बाद में उनकी जगह स्थानीय ब्रांडों ने ले ली।

ये सभी कदम उस समय उठाए गए जब कंपनियाँ युद्ध और पश्चिमी देशों द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों को देखते हुए कानूनी, नैतिक और अपनी छवि से जुड़ी जोखिमों का फिर से मूल्यांकन कर रही थीं। इस तरह रूस से कंपनियों का एक बड़ा पलायन देखने को मिला।

Source link

Search

Categories

Recent Posts

Tags

Gallery