भारत एक गुटका- नेशन बन चुका है। घरेलू इस्तेमाल को लेकर हाल में हुए एक सर्वे में बताया गया है कि गाँवों में गुटखा और दूसरे तम्बाकू वाले उत्पादों पर कुल इनकम का 4 फीसदी खर्च होता है, जबकि पढ़ाई पर 2.5 फीसदी खर्च किया जाता है।
ओडिशा सरकार ने लगाया प्रतिबंध
ओडिशा सरकार ने तंबाकू को लेकर बड़ा फैसला किया है। 22 जनवरी 2026 को ओडिशा सरकार ने बीड़ी, सिगरेट, गुटखा, खैनी और जर्दा समेत सभी तंबाकू वाले पदार्थों पर बैन लगा दिया है। इनके प्रोडक्शन, पैकेजिंग, डिस्ट्रीब्यूशन और बेचने पर भी राज्य में प्रतिबंध लगा दिया गया है। इसका नोटिफिकेशन 21 जनवरी को आया था।
ITC In Focus
Official document which states that Odisha imposes complete ban on tobacco & nicotine products
No manufacturing and production as well#ITC pic.twitter.com/XpuEwSmXrb— Soumeet Sarkar (@soumeet_sarkar) January 22, 2026
ओडिशा के स्वास्थ्य विभाग के मुताबिक गुटखा, जर्दा और तंबाकू उत्पादों का सेवन कैंसर की सबसे बड़ी वजह है। इसके अलावा पान मसाला, धुआँ पत्ता, पान-सुपारी जैसे उत्पाद स्वास्थ्य के लिए बेहद हानिकारक हैं। इनसे मुँह, गले, पेट, किडनी, फेफड़े आदि के कैंसर का खतरा बढ़ जाता है। ओडिशा में करीब 25 % वयस्क तम्बाकू का इस्तेमाल करते हैं, जो देश के औसत से दोगुणा है।
गुटखा के सेवन में बेतहाशा बढ़ोतरी
नेशनल स्टैटिस्टिक्स ऑफिस (NSO) ने अगस्त 2023 से जुलाई 2024 तक घरेलू खपत खर्च पर एक सर्वे किया। स्टडी की एक खास बात देश में गुटखा की खपत में बढ़ोतरी थी, इस बात पर EAC-PM (प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद) की सदस्य शमिका रवि और उनके साथी पार्थ प्रोतिम बर्मन ने भी इंडियन एक्सप्रेस के एक हालिया आर्टिकल पर चर्चा की।
नेशनल स्टैटिस्टिक्स ऑफिस, मिनिस्ट्री ऑफ़ स्टैटिस्टिक्स एंड प्रोग्राम इम्प्लीमेंटेशन (MoSPI) का हिस्सा है। यह खाने और नॉन-फूड दोनों तरह के प्रोडक्ट्स पर डेटा इकट्ठा करता है और उसकी एनालिसिस करता है। जनवरी 2026 में पब्लिश हुए हालिया एनालिसिस ने इस बात पर जोर दिया गया है कि कैसे गुटखा का इस्तेमाल सभी राज्यों, खासकर देश के उत्तरी राज्यों में एक आम बात हो गई है। वहीं दक्षिणी राज्यों में इसका इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है।
Rising menace of tobacco consumption (Gutkha & Cigarettes), specially among poorer households, has major implications for both public health and public finance. @ShamikaRavi & @Partha_Protim05 explain the growing moral hazard problem across Indiahttps://t.co/kqOSed0lhI pic.twitter.com/BSpV3DDmeS
— EAC-PM (@EACtoPM) January 21, 2026
द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, रवि और बर्मन ने बताया कि तंबाकू का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है। निचले तबके के लोग इसकी वजह से और गरीब होते जा रहे हैं। यह सब तब हो रहा है जब राज्यों में सब्सिडी वाली हेल्थकेयर बढ़े हैं।
महँगाई के हिसाब से देखें तो 2011-12 और 2023-2024 के बीच तंबाकू पर प्रति व्यक्ति खर्च ग्रामीण इलाकों में 58% और शहरी इलाकों में 77% तक बढ़ गया है। अब तम्बाकू ग्रामीण इलाकों में महीने के प्रति व्यक्ति कंज्यूमर खर्च (MPCE) का लगभग 1.5% और शहरी इलाकों में 1% हिस्सा बन गया है। ये आंकड़े मामूली लग सकते हैं, लेकिन यह चिंता की बात है कि तंबाकू का इस्तेमाल करने वाले परिवारों की संख्या में बेतहाशा वृद्धि हुई है।
ग्रामीण इलाकों से परेशान करने वाले आँकड़े
ग्रामीण भारत में तंबाकू इस्तेमाल करने वाले घरों की संख्या 9.9 करोड़ (कुल घरों का 59.3%) से बढ़कर 13.3 करोड़ (68.6%) हो गई है। महज एक दशक से भी कम समय में 33% की बढ़ोतरी हुई है।
रवि और बर्मन ने बताया कि शहरी भारत में तम्बाकू इस्तेमाल करने वाले लोगों की संख्या में बढ़ोतरी का आंकड़ा और भी चौंकाने वाला है। तंबाकू सेवन करने वाले परिवारों की संख्या 2.8 करोड़ (34.9%) से बढ़कर 4.7 करोड़ (45.6%) हो गई। परेशान करने वाली बात यह है कि तंबाकू का इस्तेमाल शहरी और ग्रामीण दोनों इलाकों में तेजी से बढ़ता जा रहा है। यह अब सिर्फ खास ग्रुप या आबादी तक ही सीमित नहीं है।
ग्रामीण इलाकों में सबसे बड़ा खुलासा गुटखा को लेकर हुआ है। यहाँ गुटखा खाने वाले परिवारों की संख्या 6 गुणा बढ़ी है। पहले यह 5.3% थी, जो बढ़कर अब 30.4% हो गया है। ग्रामीण इलाकों में तंबाकू पर होने वाले कुल खर्च का 41 फीसदी गुटखे पर ही होता है, जिससे यह सबसे बड़ा तंबाकू उत्पाद बन गया है।
दूसरी ओर, शहरी भारत भी इससे अछूता नहीं है. शहरों में सिगरेट सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला तंबाकू उत्पाद है, जिसे 18.1 फीसदी शहरी परिवार इस्तेमाल करते हैं। साथ ही अब करीब 16.8 फीसदी शहरी परिवार भी गुटखा खाते हैं, जो दिखाता है कि यह उत्पाद शहरों में कितनी तेजी से फैल रहा है।
सेंट्रल भारत में गुटखा का इस्तेमाल ज्यादा है
रवि और बर्मन ने बताया कि मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में देश के ग्रामीण औसत लगभग 30% से ज़्यादा गुटखा का इस्तेमाल होता है। मध्य प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में 60% गुटखा खाते हैं और उत्तर प्रदेश पहले ही 50% का आँकड़ा पार कर चुका है। दिक्कत यह है कि शहरी ट्रेंड भी अब ग्रामीण जैसे होने लगे हैं।
मध्य प्रदेश के लगभग आधे शहरी घरों में गुटखा खाया जाता है, जबकि उत्तर प्रदेश, बिहार और राजस्थान में यह आँकड़ा एक-तिहाई से भी ज़्यादा है। रिपोर्ट के मुताबिक, कई नॉर्थ-ईस्ट राज्यों में भी ग्रामीण और शहरी दोनों इलाकों में गुटखा का इस्तेमाल नेशनल औसत से ज्यादा है। दक्षिणी भारत में इसका इस्तेमाल आम तौर पर कम होता है, लेकिन नतीजे परेशान करने वाले हैं। कर्नाटक में चार में से एक ग्रामीण परिवार गुटखा का इस्तेमाल करता है।
अलग-अलग वर्ग में सेवन का तरीका अलग
गरीब ग्रामीण परिवार अपने हर महीने के कुल खर्च का 1.7 फीसदी तंबाकू पर खर्च करते हैं, जबकि सबसे अमीर 20 फीसदी परिवार अपनी हर महीने के कुल खर्च का सिर्फ 1.2 फीसदी तंबाकू पर खर्च करते हैं। शहरी भारत में यह अंतर और भी गहरा है। यहाँ निचले वर्ग के 40 फीसदी परिवारों में आधे से ज्यादा तंबाकू का सेवन करते हैं, जबकि सबसे अमीर 20 फीसदी परिवारों में यह आँकड़ा 37 फीसदी से भी कम है।
तंबाकू का इस्तेमाल निचले तबके के घरों में ज्यादा आम है। इनकम डिस्ट्रीब्यूशन के सबसे निचले 40% हिस्से में 70% से ज्यादा ग्रामीण परिवार तंबाकू का इस्तेमाल करते हैं। यह प्रतिशत बिहार, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के 85% से ज्यादा है।
गुटखा सेहत और पैसे पर भारी
गुटखा खाने से न केवल पैसे खर्च होते हैं, बल्कि इससे गंभीर बीमारियाँ भी होती है। स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के अनुमान के मुताबिक, तंबाकू से भारत में हर साल लगभग 13 लाख मौतें होती हैं। यह कैंसर, दिल की बीमारी, सांस की बीमारियों और हाइपरटेंशन जैसी नॉन-कम्युनिकेबल बीमारियाँ (NCDs) होती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मुताबिक, देश में होने वाली सभी मौतों में से 63% के लिए NCDs जिम्मेदार हैं।
तम्बाकू के इस्तेमाल से हेल्थकेयर पर काफी असर पड़ा है। केन्द्र ने आयुष्मान भारत जैसी योजना को कमजोर परिवारों को मेडिकल खर्चों से बचाने के लिए बनाया था। अक्टूबर 2025 तक लगभग 12 करोड़ परिवारों को 42 करोड़ से ज्यादा आयुष्मान कार्ड मिल चुके थे। इस प्रोग्राम की वजह से परिवारों को मेडिकल खर्चों में लगभग 1.52 लाख करोड़ रुपये की बचत हुई।
FY 2015 और FY2022 के बीच सरकारी हेल्थ खर्च 29% से बढ़कर 48% हो गया।
जब कम इनकम वाले घरों में तंबाकू के बढ़ते इस्तेमाल से बीमारियों पर खर्च बढ़ गया है। इसकी वजह से देश को हेल्थकेयर पर ज्यादा खर्च करना पड़ रहा है। ग्रामीण भारत में सबसे गरीब 40% घर अपने MPCE का सिर्फ 2.5% शिक्षा पर खर्च करते हैं, जबकि शराब, तंबाकू और नशीली चीजों पर 4% खर्च होता है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि तंबाकू के इस्तेमाल में बिना किसी रोक-टोक के बढ़ोतरी, सरकार के सोशल प्रोटेक्शन और यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज के कमिटमेंट के साथ मेल नहीं खाती। HCES (हाउसहोल्ड कंजम्पशन एक्सपेंडिचर सर्वे) ने इसको लेकर चेतावनी भी दी है।
इस संवेदनशील मामले से निपटने के लिए सुझाव भी दिए गए हैं। इसमें कहा गया है कि सिर्फ चबाने वाले तंबाकू पर और टैक्स लगाना काफी नहीं होगा, भले ही सेंट्रल एक्साइज़ (अमेंडमेंट) बिल 2025 में इसकी माँग की गई हो। इसके लिए रेगुलेटरी कंट्रोल को मज़बूत करना ज़रूरी है और बॉलीवुड के बड़े सेलेब्रिटीज के ऐसे प्रचार पर रोक लगनी चाहिए, जो ‘चांदी की परत चढ़ी इलायची’ की आड़ में पान मसाला और गुटखा को प्रमोट करने के लिए सरोगेट एडवरटाइजिंग का इस्तेमाल कर रहे हैं।
(यह लेख अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)
