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कौन है शमाइल नदवी, लोग क्यों बता रहे अगला जाकिर नाईक: ‘ईश्वर के अस्तित्व’ पर जावेद अख्तर के साथ चर्चा के बाद सुर्खियों में है यह मुफ्ती


नदवी मलेशिया से पढ़ाई कर रहे हैं

भारत हमेशा से धार्मिक चर्चाओं का देश रहा है और ‘ईश्वर के अस्तित्व’ जैसे विषय पर एक हाई-प्रोफाइल बहस लोगों को आकर्षित करने का सबसे मारक हथियार मानी जा सकती है। बीते 20 दिसंबर 2025 को गीतकार, लेखक और घोषित ‘इस्लामिक नास्तिक’ जावेद अख्तर ने इस्लामी विद्वान मुफ्ती शमाइल नदवी के साथ एक लाइव चर्चा में हिस्सा लिया, जिसका शीर्षक था ‘क्या ईश्वर का अस्तित्व है?’। करीब 2 घंटे की इस डिबेट के मॉडरेटर ‘द लल्लनटॉप’ के एडिटर सौरभ द्विवेदी थे।

इस बहस ने नदवी को स्पॉटलाइट में ला दिया। उनके समर्थकों ने सोशल मीडिया पर उनके रील्स खूब शेयर किए और दावा किया कि जावेद अख्तर को नदवी ने हरा दिया है। जैसा कि प्रोपेगेंडा होता है, यह भी दावा किया जाना लगा कि इस बहस के बाद लोग इस्लाम की और आने लगे हैं। हालाँकि, प्रोपेगेंडा ज्यादा देर तक टिकता नहीं है और ऐसा ही नदवी के साथ भी हुआ। सोशल मीडिया पर नदवी के पुराने वीडियो शेयर होने लगे। इन वीडियो में नदवी किसी इस्लामी कट्टरपंथी की तरह भाषण देते दिखे और सोशल मीडिया पर लोगों ने उन्हें ‘अगला जाकिर नाईक’ तक बता दिया।

कौन हैं शमाइल नदवी?

नदवी की बहस और वायरल वीडियो पर चर्चा से पहले जानते हैं कि शमाइल नदवी का बैकग्राउंड क्या है। मुफ्ती शमाइल नदवी का पूरा नाम शमाइल अहमद अब्दुल्ला है। उनका जन्म जून 1998 में पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में हुआ। उनकी शुरुआती तालीम कोलकाता में ही हुई, जहाँ अपने अब्बू की सरपरस्ती और रहनुमाई में उन्होंने इस्लामी उलूम की बुनियादी शिक्षा हासिल की।

कोलकाता में कुरआन की शुरुआती तालीम पूरी करने के बाद शमाइल ने 2014 में उत्तर प्रदेश के लखनऊ स्थित प्रसिद्ध इस्लामी शिक्षण संस्था दारुल उलूम नदवतुल उलेमा में दाखिला लिया। यहाँ से उन्होंने मुफ्ती की डिग्री हासिल की। इस दौरान उन्होंने कुरआन, हदीस और फिक्ह यानी इस्लामी कानून जैसे विषयों की पढ़ाई की थी।

दारुल उलूम नदवतुल उलेमा से तालीम हासिल करने के कारण शमाइल अब्दुल्ला ने अपने नाम के साथ नदवी उपनाम जोड़ा। नदवा से पढ़ने वाले छात्रों के लिए अपने नाम के साथ नदवी लिखना एक परंपरागत पहचान मानी जाती है।

नदवा से इस्लामी शरीयत की उच्च शिक्षा पूरी करने के बाद शमाइल नदवी ने आगे की तालीम के लिए मलेशिया का रुख किया। वे वर्तमान में वहाँ इस्लामी शिक्षा के विषय में पीएचडी कर रहे हैं। मलेशिया वही देश है जहाँ भगोड़ा इस्लामी कट्टरपंथी जाकिर नाईक रह रहा है।

शमाइल नदवी मरकज-अल-वहयैन नामक एक ऑनलाइन शैक्षिक संस्थान के संस्थापक और प्रधानाचार्य हैं। इसके अलावा वर्ष 2024 में उन्होंने वाहियान फाउंडेशन नाम से एक धार्मिक ट्रस्ट की स्थापना की। उनके ट्रस्ट द्वारा अरबी भाषा और बुनियादी इस्लामी शिक्षा जैसे कुरआन, हदीस और फिक्ह की ऑफलाइन पढ़ाई भी कराई जाती है।

क्यों शमाइल नदवी की जाकिर नाईक से हो रही तुलना?

शमाइल नदवी के बहस के वीडियो तो खूब वायरल हुए ही, साथ ही उनके कुछ पुराने वीडियो भी सोशल मीडिया पर सामने आए। इन पुरानी वीडियो में इस्लाम के कट्टरपंथी रुख को लेकर नदवी के विचार खूब वायरल है और इन्हीं के कारण उनकी तुलना सोशल मीडिया पर जाकिर नाईक के साथ की जा रही है।

सोशल मीडिया पर वायरल एक वीडियो में शमाइल नदवी देश को सबसे ऊपर रखने और सेक्युलर व्यवस्था के खिलाफ इस्लामी लोगों को भड़का रहे हैं। मेजर सुरेंद्र पूनिया ने X पर यह वीडियो शेयर किया है। पूनिया ने लिखा, “भारत का नया जाकिर नाईक, यह भी कह रहा है कानून संविधान कुछ नहीं…शरीयत ही सब कुछ है। एक दिन यह भी देश छोड़ कर भाग जाएगा।”

इस वीडियो में शमाइल नदवी कह रहे हैं, “अगर हम चाहते हैं कि हमारे मौजूदा हालात सही हो जाएँ तो हालात का हल किसी सियासी पार्टी के पास नहीं है। हालात का हल दीन (इस्लाम) में है। इस मुल्क में हमारा अप्रोच गलत रहा। हम ये कहते फिरते रहे कि हमारा वतन, हमारे दीन से ज्यादा मुकद्दस (पाक-पवित्र) है। हमने ये एहतराफ किया कि सेक्युलर निजाम (व्यवस्था-शासन), हमारे निजाम से ज्यादा मुकद्दस है।”

नदवी आगे कहते हैं, “हम कुफ्रिया अल्फाज कहते रहे। हम ऐसे जुमले अपनी जुबान से निकालते रहे कि फलाँ दरबार से जो फैसला हो जाएगा, हम खामोशी से तस्लीम कर लेंगे। क्या फलाँ दरबार अगर शरीयत के खिलाफ हुक्म दे, क्या तुम तस्लीम करोगे? किसी भी मुस्लिम मर्द या औरत के लिए यह जायज नहीं है कि अगर अल्लाह ने किसी मामले में फैसला कर दिया तो अब अल्लाह को छोड़कर गैर-अल्लाह को हुक्म बनाएँ।”

इस वीडियो को मोटे तौर पर समझें तो नदवी दरअसल ये बता रहे हैं कि हर समस्या का हल इस्लाम के भीतर है और किसी भी मुस्लिम को खुद को सेक्युलर या देश को मजहब से पहले रखने की जरूरत नहीं है। साथ ही वो शरीयत को किसी भी फैसले से ऊपर बता रहे हैं। यहाँ उन्होंने सीधे तौर पर नाम नहीं लिया लेकिन सोशल मीडिया पर लोग दावा कर रहे हैं कि असल में वो अदालतों या किसी संस्था के फैसला को शरीयत की कसौटी पर कसने और अगर फैसला शरीयत के हिसाब से ना हो तो उसका विरोध करने के लिए कह रहे हैं।

इस्लाम में हराम है म्यूजिक: नदवी

नदवी के ऐसे वीडियो की भरमार है। जिसमें वो इस्लामिक कायदों की जानकारी दे रहे हैं। एक वीडियो में उन्होंने म्यूजिक सुनने को हराम बताया है। इस वीडियो में वह कह रहे हैं, “जिस नशीद में हल्का-हल्का म्यूजिक आता है उसे सुनना जायज है क्या? वह कहते हैं कि म्यूजिक तेज हो या हल्का हो इससे फर्क नहीं पड़ता है। जो चीज शरीयत में हराम है, वो हराम है। म्यूजिक को सुनना जायज नहीं है, चाहे वो म्यूजिक किसी भी चीज में इस्तेमाल किया जाए।”

‘भगवा लव ट्रैप’ से लेकर ‘इस्लाम ही इकलौता सच’ तक का प्रोपेगेंडा

शमाइल नदवी ने कथित ‘भगवा लव ट्रैप’ को लेकर भी प्रोपेगेंडा फैलाया था और उसके वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं। यह लव जिहाद के खिलाफ इस्लामी कट्टरपंथियों का प्रोपेगेंडा का एक प्रयास था। वायरल वीडियो में नदवी कह रहे हैं, “तुम अपनी मुस्लिम औरतों को मुशरिकीन (मूर्तिपूजक या अल्लाह के अलावा किसी और को मानने वाले) के निकाह में ना दो। एक गुलाम मुस्लिम वो मुशरिक से बेहतर है अगर वो मुशरिक तुम्हें पसंद ही क्यों ना आ रहा हो।”

शमाइल नदवी ने इस वीडियो में मुस्लिम लड़कियों को यह कहकर भी भड़काने की कोशिश की कि मुशरिकीन से निकाह जायज नहीं है और यह जहन्नम यानी नर्क का रास्ता है।

एक अन्य वायरल वीडियो में सिर्फ इस्लाम को सच्चा बताते हुए नजर आ रहे हैं। सर्वधर्म समभाव की भारतीय अवधारणा से इतर मुफ्ती कह रहे हैं, “ये जो दीन-ए-इस्लाम है, ये वाहिद वो दीन है। जो बरहक (‘सच्चा’) है और इसके अलावा जो भी नजरिया है दुनिया में वो सब बातिल (असत्य-झूठ) हैं। उन्होंने आगे कहा, “कोई भी शख्स तब तक कामयाब नहीं हो सकता है, जब तक वो दीन-ए-इस्लाम में दाखिल ना हो। इस बात को दिमाग में बैठा लें।”

‘नमस्ते’ कहना भी इस्लाम में नाजायज: नदवी

नदवी एक वीडियो में नमस्ते कहने को भी नाजायज बता रहे हैं। नदवी ने कहा कि नमस्ते संस्कृत भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है ‘मैं आपके सामने झुकता हूँ’ और एक मुसलमान अल्लाह के अलावा किसी का आगे नहीं झुकता है। वो कहते हैं कि यह शब्द कहना जायज नहीं है। एक अन्य वीडियो में वो हिजाब को लेकर कह रहे हैं कि मुस्लिम महिलाओं को लिए पूरे शरीर को ढँकना जरूरी है। उन्होंने साफ कहा कि हिजाब कोई विकल्प नहीं है बल्कि इसे पहनना जरूरी है।

शमाइल नदवी की छवि शुरू में एक पढ़े-लिखे, तार्किक इस्लामी विद्वान की बनाई गई लेकिन उनके पुराने और लगातार सामने आ रहे बयानों ने इस छवि की परतें खोल दीं। जिन वीडियो में वे संविधान, सेक्युलर व्यवस्था और न्यायिक फैसलों को शरीयत के अधीन मानने की बात करते हैं, वे सीधे-सीधे लोकतांत्रिक ढाँचे को नकारने की सोच को दर्शाते हैं। किसी भी देश में कानून से ऊपर किसी धार्मिक व्यवस्था को रखने की वकालत अपने आप में कट्टरपंथ का स्पष्ट संकेत है।

नदवी का यह कहना कि देश या संविधान को दीन से ऊपर रखना ‘गलत अप्रोच’ है, यह बताता है कि वे नागरिक पहचान से पहले धार्मिक पहचान थोपना चाहते हैं। यही सोच आगे चलकर सामाजिक विभाजन और टकराव की जमीन तैयार करती है। म्यूजिक को हराम बताना, नमस्ते जैसे सामान्य अभिवादन को नाजायज कहना, या यह दावा करना कि इस्लाम के अलावा सभी धर्म ‘बातिल’ हैं, ये बयान केवल आस्था नहीं बल्कि सांस्कृतिक असहिष्णुता को बढ़ावा देते हैं।



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