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ईरान-इजरायल युद्ध का भारत पर पड़ने लगा असर, लागू किया गया ‘आवश्यक वस्तु अधिनियम’: जानें- क्या है यह कानून और इससे क्या बदलेगा?


मिडिल ईस्ट तनाव

मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और ईरान के खिलाफ अमेरिका-इजरायल की सैन्य कार्रवाई के बाद पूरी दुनिया में ऊर्जा बाजार को लेकर चिंता बढ़ गई है। इसी खतरे को देखते हुए भारत सरकार ने भी एहतियाती कदम उठाने शुरू कर दिए हैं।

केंद्र सरकार ने सोमवार (09 मार्च 2026) को पेट्रोलियम उत्पादों और प्राकृतिक गैस की उपलब्धता बनाए रखने के लिए आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 (Essential Commodities Act – ECA) लागू करने का फैसला किया है ताकि देश में ईंधन की सप्लाई और वितरण पर सख्त निगरानी रखी जा सके।

सरकार का मानना है कि मिडिल ईस्ट में बिगड़ते हालात का असर वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर पड़ रहा है। ऐसे में भारत में पेट्रोलियम उत्पादों, प्राकृतिक गैस और अन्य ईंधनों की उपलब्धता प्रभावित न हो इसके लिए यह कदम उठाया गया है।

इस अधिनियम के लागू होने के बाद केंद्र सरकार को इन संसाधनों के उत्पादन,भंडारण,वितरण और आपूर्ति को नियंत्रित करने का अधिकार मिल जाता है। पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने इस संबंध में एक गजट नोटिफिकेशन भी जारी किया है।

क्या है 1955 का आवश्यक वस्तु अधिनियम?

आवश्यक वस्तु अधिनियम-1955 संसद द्वारा बनाया गया एक महत्वपूर्ण कानून है जिसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि रोज की जिंदगी की जरूरी चीजें लोगों को सही कीमत पर मिलती रहें।

इस कानून के जरिए केंद्र सरकार को यह अधिकार दिया गया है कि वह लोगों के हित को ध्यान में रखते हुए जरूरी वस्तुओं के उत्पादन,आपूर्ति और वितरण को नियंत्रित कर सके ताकि किसी भी स्थिति में आम लोगों को इन वस्तुओं की कमी का सामना न करना पड़े।

समय के साथ इस कानून के तहत कई ऐसी वस्तुओं को आवश्यक वस्तु की श्रेणी में शामिल किया गया है जो लोगों के दैनिक जीवन के लिए बेहद जरूरी मानी जाती हैं। इनमें खाद्यान्न, खाद्य तेल,दवाइयाँ, उर्वरक और पेट्रोलियम उत्पाद जैसे सामान शामिल रहे हैं।

परिस्थितियों के अनुसार केंद्र सरकार के पास यह अधिकार भी होता है कि वह इस सूची में नई वस्तुएँ जोड़ सकती है या जरूरत पड़ने पर किसी वस्तु को इससे हटा भी सकती है। युद्ध, प्राकृतिक आपदा या आपूर्ति व्यवस्था में बाधा जैसी परिस्थितियों में अक्सर जमाखोरी और मुनाफाखोरी की स्थिति पैदा हो जाती है।

ऐसे हालात में यह कानून सरकार को हस्तक्षेप करने की शक्ति देता है जिससे बाजार में आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता बनी रहे और उनकी कीमतें नियंत्रण में रहें। इस अधिनियम की धारा 3 के तहत केंद्र सरकार को यह अधिकार दिया गया है कि वह आवश्यक वस्तुओं के उत्पादन, आपूर्ति और वितरण को नियंत्रित कर सके।

इसके तहत सरकार भंडारण की सीमा तय कर सकती है, व्यापार को नियंत्रित कर सकती है, कीमतों को निर्धारित कर सकती है और जमाखोरी जैसी गतिविधियों पर प्रतिबंध भी लगा सकती है।

इस कानून की धारा 5 के तहत केंद्र सरकार को यह अधिकार भी है कि वह धारा 3 के अंतर्गत प्राप्त अपनी शक्तियों को राज्य सरकारों या अधिकृत अधिकारियों को सौंप सकती है। इसका उद्देश्य यह होता है कि स्थानीय स्तर पर भी इस कानून का प्रभावी और त्वरित तरीके से पालन कराया जा सके और जरूरत पड़ने पर तुरंत कार्रवाई की जा सके। वर्ष 2020 में संसद ने इस कानून में संशोधन भी किया था।

इस संशोधन के बाद केंद्र सरकार की शक्तियों को कुछ विशेष वस्तुओं जैसे अनाज, दालें, आलू, प्याज, खाद्य तिलहन और ईंधन तेल के मामले में केवल असाधारण परिस्थितियों तक सीमित कर दिया गया।

इन असाधारण परिस्थितियों में युद्ध, अकाल, अत्यधिक मूल्य वृद्धि और गंभीर प्राकृतिक आपदाएँ जैसी स्थितियाँ शामिल की गई हैं। पेट्रोलियम उत्पादों को भी इस कानून के तहत आवश्यक वस्तुओं की श्रेणी में रखा गया है और इनमें एलपीजी भी शामिल है। इसका मतलब यह है कि एलपीजी की आपूर्ति और वितरण को भी इस अधिनियम के प्रावधानों के तहत नियंत्रित किया जा सकता है।

क्यों अब सरकार को पड़ी इसकी जरूरत?

केंद्र सरकार का कहना है कि पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष के कारण हॉर्मुज जलडमरूमध्य (स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज)के रास्ते आने वाली तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) की सप्लाई प्रभावित हुई है।

कई गैस सप्लायर कंपनियों ने फोर्स मेज्योर (Force Majeure) का हवाला दिया है, जिसका मतलब यह है कि असाधारण परिस्थितियों के कारण वे अपनी तय आपूर्ति पूरी नहीं कर पा रहे हैं। ऐसे हालात में गैस की उपलब्ध मात्रा को प्राथमिकता वाले क्षेत्रों की ओर मोड़ने की जरूरत है।

सरकार का कहना है कि प्राकृतिक गैस, एलएनजी और री-गैसीफाइड एलएनजी कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों के लिए बेहद जरूरी कच्चा माल हैं। इनका इस्तेमाल घरेलू पाइप्ड नेचुरल गैस (PNG) की सप्लाई, परिवहन के लिए CNG, उर्वरक उत्पादन, LPG उत्पादन और कई अन्य औद्योगिक गतिविधियों में किया जाता है।

इन्हीं परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार का मानना है कि प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में प्राकृतिक गैस की समान और निरंतर उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए प्राकृतिक गैस के उत्पादन, विभिन्न क्षेत्रों के लिए उसके आवंटन, आपूर्ति के डायवर्जन, वितरण, निपटान, अधिग्रहण, उपयोग और खपत को नियंत्रित करना जरूरी है।

इस अधिनियम का अब आपूर्ति पर क्या पड़ेगा असर?

केंद्र सरकार ने प्राकृतिक गैस के उत्पादन, आपूर्ति और वितरण को नियंत्रित करने के लिए कुछ स्पष्ट निर्देश जारी किए हैं जिससे देश में गैस की उपलब्धता बनी रहे। साथ ही इसका मकसद गैस को उसे प्राथमिकता के आधार पर विभिन्न क्षेत्रों में बराबरी से बाँटना भी है। सरकार का कहना है कि प्राकृतिक गैस की सप्लाई को अलग-अलग प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में बाँटा जाएगा और उसी के अनुसार गैस की आपूर्ति सुनिश्चित की जाएगी।

सबसे पहले प्राथमिकता क्षेत्र-1 तय किया गया है। इसमें आने वाले क्षेत्रों को सबसे ज्यादा प्राथमिकता दी जाएगी। इन क्षेत्रों में घरेलू पाइप्ड नेचुरल गैस (PNG) की सप्लाई, परिवहन के लिए इस्तेमाल होने वाली कंप्रेस्ड नेचुरल गैस (CNG), एलपीजी उत्पादन और पाइपलाइन कंप्रेसर ईंधन और पाइपलाइन संचालन से जुड़ी जरूरी जरूरतें शामिल हैं। इन सभी क्षेत्रों को उनकी पिछले छह महीनों की औसत गैस खपत के आधार पर 100% तक गैस आपूर्ति बनाए रखने का प्रयास किया जाएगा।

इसके बाद प्राथमिकता क्षेत्र-2 में उर्वरक (फर्टिलाइजर) प्लांट्स को रखा गया है। इन संयंत्रों को उनकी पिछले छह महीनों की औसत गैस खपत के आधार पर 70% तक गैस की आपूर्ति सुनिश्चित की जाएगी। साथ ही यह शर्त भी रखी गई है कि इन संयंत्रों को मिलने वाली गैस का उपयोग केवल उर्वरक उत्पादन के लिए ही किया जाएगा और किसी अन्य उद्देश्य के लिए इसका इस्तेमाल नहीं किया जा सकेगा।

प्राथमिकता क्षेत्र-3 में गैस मार्केटिंग कंपनियों को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया गया है कि राष्ट्रीय गैस ग्रिड के माध्यम से सप्लाई पाने वाले चाय उद्योग, विनिर्माण क्षेत्र और अन्य औद्योगिक उपभोक्ताओं को उनकी पिछले छह महीनों की औसत गैस खपत के आधार पर 80% तक गैस आपूर्ति मिलती रहे।

इसके अलावा प्राथमिकता क्षेत्र-4 में आने वाली सभी सिटी गैस डिस्ट्रीब्यूशन (CGD) कंपनियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि उनके नेटवर्क से जुड़े औद्योगिक और वाणिज्यिक उपभोक्ताओं को उनकी पिछले छह महीनों की औसत गैस खपत के आधार पर 80% तक गैस सप्लाई मिलती रहे।

देश में कितनी है सालाना LPG खपत?

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारत में हर साल करीब 3.13 करोड़ टन LPG की खपत होती है और इसमें करीब 87% हिस्सा घरेलू रसोई गैस का है। भारत अपनी LPG जरूरत का करीब 62% को बाहर से आयात करता है और मिडिल ईस्ट में संकट के बाद यह आयात प्रभावित हुआ है।

होर्मुज जलडमरूमध्य पर तनाव के चलते यह संकट और गहरा गया है क्योंकि आयात का करीब 85-90% हिस्सा इसी रास्ते से आता है। देश में पर्याप्त है ईंधन का भंडार मिडिल ईस्ट में संकट के बीच कई जगहों पर गैस की कमी की खबरें हैं लेकिन मंत्रालय का कहना है कि देश में ईंधन का पर्याप्त भंडार मौजूद है।

इसके साथ ही पेट्रोलियम रिफाइनरियों को पेट्रोकेमिकल उत्पादन घटाकर LPG उत्पादन बढ़ाने के निर्देश दिए गए हैं। मंत्रालय ने एहतियाती कदम के तौर पर LPG सिलेंडर की दो बुकिंग के बीच का अंतराल भी 21 दिन से बढ़ाकर 25 दिन कर दिया गया है ताकि जमाखोरी और कालाबाजारी रोकी जा सके।



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