सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि अगर कोई उम्मीदवार SC, ST या OBC जैसे आरक्षित वर्ग से है लेकिन उसके नंबर जनरल कैटेगरी की कट-ऑफ से अधिक हैं, तो उसे जनरल (ओपन) कैटेगरी में ही माना जाएगा। हालाँकि, कोर्ट ने इसमें एक शर्त भी बताई है।
कोर्ट का कहना है कि सिर्फ इसलिए कि कोई शख्स आरक्षित वर्ग से आता है उसे जनरल सीट से बाहर नहीं किया जा सकता। यह नियम चयन की शॉर्टलिस्टिंग के चरण में भी लागू होता है। कोर्ट ने जो शर्त बताई है, उसे समझना बहुत जरूरी है। इस शर्त का आधार अतिरिक्त आरक्षण लाभ के तर्क पर रखा गया है, जिसे नीचे डिटेल में बताया गया है।
सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने राजस्थान हाईकोर्ट प्रशासन की अपील खारिज करते हुए राजस्थान हाईकोर्ट के फैसले को सही ठहराया। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि जनरल या ओपन कैटेगरी किसी खास जाति या वर्ग की नहीं होती बल्कि काबिलियत के आधार पर सभी के लिए खुली होती है।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला राजस्थान हाईकोर्ट द्वारा अगस्त 2022 में शुरू की गई भर्ती प्रक्रिया से जुड़ा है। यह भर्ती राजस्थान हाईकोर्ट स्टाफ सर्विस रूल्स 2002 और राजस्थान जिला न्यायालय मंत्रिस्तरीय स्थापना नियम 1986 के तहत निकाली गई थी। इसमें कुल 2,756 पदों पर भर्ती होनी थी जिनमें जूनियर ज्यूडिशियल असिस्टेंट और क्लर्क ग्रेड-II के पद शामिल थे। ये पद राजस्थान हाई कोर्ट, जिला न्यायालयों और न्यायिक अकादमी जैसी संस्थाओं के लिए थे।
यह भर्ती प्रक्रिया दो चरणों में तय की गई थी। पहले चरण में 300 अंकों की लिखित परीक्षा हुई और दूसरे चरण में 100 अंकों की कंप्यूटर आधारित टाइपिंग परीक्षा रखी गई थी। नियम यह था कि लिखित परीक्षा में न्यूनतम तय अंकों से ऊपर अंक लाने वाले उम्मीदवारों में से हर कैटेगरी में पदों की संख्या के 5 गुना उम्मीदवारों को टाइपिंग टेस्ट के लिए शॉर्टलिस्ट किया जाएगा। अंतिम चयन लिखित परीक्षा और टाइपिंग टेस्ट के कुल अंकों के आधार पर होना था।
लिखित परीक्षा का परिणाम मई 2023 में घोषित हुआ। इसके बाद भर्ती प्राधिकरण ने कैटेगरी टाइपिंग टेस्ट के लिए शॉर्टलिस्ट तैयार की। इसमें सामान्य वर्ग का कट-ऑफ लगभग 196 अंक रहा लेकिन अनुसूचित जाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, अति पिछड़ा वर्ग और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग जैसी कई आरक्षित कैटेगरी का कट-ऑफ इससे काफी ज्यादा रहा। कुछ मामलों में तो यह 230 अंकों से भी ऊपर चला गया। इसका असर यह हुआ कि कुछ रिजर्व वर्ग के उम्मीदवार जिन्होंने सामान्य वर्ग के कट-ऑफ से ज्यादा अंक हासिल किए थे लेकिन अपनी ही कैटेगरी के कट-ऑफ से कम अंक लाए थे, उन्हें टाइपिंग टेस्ट के लिए बुलाया ही नहीं गया।

इन उम्मीदवारों की शिकायत यह थी कि वे कई ऐसे सामान्य वर्ग के उम्मीदवारों से बेहतर अंक लाने के बावजूद आगे की प्रक्रिया से बाहर कर दिए गए। वहीं, सामान्य वर्ग के कम अंक वाले उम्मीदवार टाइपिंग टेस्ट में शामिल हो गए। इससे उन्हें टाइपिंग टेस्ट देने का मौका ही नहीं मिला। इसी आधार पर इससे प्रभावित हुए उम्मीदवारों ने राजस्थान हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और तर्क दिया कि इस तरह की शॉर्टलिस्टिंग प्रक्रिया सामान्य या ओपन कैटेगरी को अनारक्षित उम्मीदवारों के लिए ही मानती है। उम्मीदवारों ने इसे संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के तहत समानता और समान अवसर के अधिकार का उल्लंघन बताया था।
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
इस मामले में राजस्थान हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने साफ किया कि कैटेगरी के हिसाब से शॉर्टलिस्ट करना गलत नहीं है लेकिन उसका तरीका और समय बहुत अहम है। अदालत ने कहा कि अगर कोई आरक्षित वर्ग का उम्मीदवार बिना किसी विशेष छूट या रियायत के सामान्य वर्ग के कट-ऑफ से अधिक अंक लाता है, तो उसे उसी स्तर पर ओपन या सामान्य श्रेणी की सूची में शामिल किया जाना चाहिए।
अदालत ने यह भी आदेश दिया कि पूरी मेरिट लिस्ट को दोबारा तैयार किया जाए और जिन उम्मीदवारों को गलत तरीके से टाइपिंग टेस्ट से बाहर कर दिया गया था, उन्हें टाइपिंग टेस्ट में शामिल होने का मौका दिया जाए। साथ ही, कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि वह न तो आरक्षण व्यवस्था को खत्म कर रही है और न ही यह कह रही है कि श्रेणीवार शॉर्टलिस्टिंग हमेशा गलत है। समस्या इस बात की थी कि श्रेणी का इस्तेमाल किस चरण पर और किस तरीके से किया गया।
हाईकोर्ट ने माना कि रिजर्व कैटेगरी के उम्मीदवार को जनरल/ओपन कैटेगरी के कट-ऑफ मार्क्स से अधिक नंबर लाने के बाद भी कैटेगरी की वजह से बाहर करना संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन होगा। हाईकोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 16(1), 16(4) और अनुच्छेद 14 की व्याख्या करते हुए कहा कि अनुच्छेद 16(1) सरकारी नौकरी में समान अवसर की गारंटी देता है जबकि अनुच्छेद 16(4) सामाजिक पिछड़ेपन को दूर करने के लिए आरक्षण की अनुमति देता है। इन दोनों का आधार अनुच्छेद 14 है, जो मनमाने और भेदभावपूर्ण वर्गीकरण को रोकता है।
हाईकोर्ट ने कैटेगरी-वाइज लिस्ट को रिवाइज करने का निर्देश दिया जिसमें सबसे पहले जनरल/ओपन कैटेगरी की लिस्ट मेरिट के आधार पर तैयार की जाएगी। कोर्ट ने कहा कि इसमें आरक्षित कैटेगरी के उन उम्मीदवारों को शामिल किया जाएगा जिन्होंने अनारक्षित कट-ऑफ से ज्यादा नंबर हासिल किए थे, बशर्ते उन्होंने किसी विशेष लाभ (उम्र या अटेम्प्ट आदि में छूट भी शामिल) का फायदा न उठाया हो।
सुप्रीम कोर्ट के सामने सवाल?
इस मामले में जब राजस्थान हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई तो हाई कोर्ट प्रशासन की ओर से तीन मुख्य दलीलें रखी गईं। दावा किया गया कि काबिल रिजर्व कैटेगरी के कैंडिडेट को जनरल कैटेगरी में एडजस्ट करने का नियम फाइनल सिलेक्शन के स्टेज पर लागू होना चाहिए यानी जब फाइनल मेरिट लिस्ट तैयार हो, न कि परीक्षा के दूसरे स्टेज के लिए शॉर्टलिस्टिंग के बीच के स्टेज पर। अगर ऐसा होता है तो उन्हें दोहरा लाभ मिला जाएगा।
दूसरी दलील दी गई कि आरक्षित वर्ग के उम्मीदवारों के ओपन कैटेगरी में आने से जुड़ा जो न्यायिक सिद्धांत पहले से मौजूद है और वह केवल अंतिम चयन के चरण पर लागू होता है, बीच के चरणों पर नहीं। तीसरी दलील यह थी कि जो उम्मीदवार भर्ती प्रक्रिया में शामिल हुए वे बाद में उसी प्रक्रिया को चुनौती नहीं दे सकते क्योंकि उन्होंने भाग लेकर उसे स्वीकार कर लिया था। हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस सभी दलीलों को खारिज कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कई फैसले बताते हैं कि जो उम्मीदवार सिलेक्शन प्रोसेस में हिस्सा लेते हैं, वे बाद में अपनाए गए तरीके को सिर्फ इसलिए चुनौती नहीं दे सकते क्योंकि नतीजा उनके मन मुताबिक नहीं है। हालाँकि, यह नियम पक्का नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “एडवर्टाइजमेंट सरकारी नौकरी के उम्मीदवारों के लिए एक रिप्रेजेंटेशन था कि कैटेगरी के हिसाब से लिस्ट तैयार की जाएँगी। कोई भी ऐसी शर्त पर सवाल नहीं उठाएगा। लेकिन इस बात का कोई संकेत नहीं था कि काबिल रिजर्व कैटेगरी के कैंडिडेट को जनरल/ओपन कैटेगरी के कैंडिडेट नहीं माना जाएगा।”
सुप्रीम कोर्ट ने दोहरे लाभ के सवालों को भी खारिज कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “आवेदन में अपनी आरक्षित श्रेणी बताने से उम्मीदवार अपने-आप आरक्षित पद पर चयनित नहीं हो जाता बल्कि इससे उसे अन्य आरक्षित उम्मीदवारों के बीच अपनी आपसी (इंटर-से) मेरिट के आधार पर दावा करने का अवसर मिलता है।”
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “आरक्षित वर्ग के उम्मीदवारों को ‘डबल लाभ’ मिलने की जो आशंका जताई जाती है, वह इस गलत धारणा पर आधारित है कि आरक्षित वर्ग का उम्मीदवार कई स्तरीय चयन प्रक्रिया के हर या एक से अधिक चरणों में आरक्षण का लाभ ले रहा है। ‘डबल लाभ’ की आशंका गलत और निराधार है।”
माइग्रेन के मुद्दे को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “हमने निष्कर्ष निकाला है कि ‘ओपन’ शब्द का अर्थ केवल और केवल ‘खुला’ ही है यानि जिन रिक्त पदों को ‘ओपन’ के रूप में चिह्नित करके भरा जाना है, वे किसी भी श्रेणी में नहीं आते। इन पर किसी भी उपयुक्त उम्मीदवार की नियुक्ति की जा सकती है चाहे उसकी जाति, जनजाति, वर्ग या लिंग कुछ भी हो।”
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “आरक्षित वर्ग का कोई उम्मीदवार अगर ‘बिना किसी छूट या रियायत के’ केवल अपनी मेहनत के दम पर प्रारंभिक या स्क्रीनिंग परीक्षा में ना केवल आरक्षित उम्मीदवारों बल्कि बल्कि सामान्य वर्ग के उम्मीदवारों से भी अधिक अंक ले आता है तो ऐसे उम्मीदवार को आगे की परीक्षा (दूसरे चरण) में जाने का हक मिलता है तो वहाँ ‘माइग्रेशन’ की जरूरत ही नहीं है।”
हालाँकि, कोर्ट ने कहा कि ऊपर बताई गई हमारी बातें सिर्फ इसी सिलेक्शन प्रोसेस पर लागू होती हैं। अगर किसी भर्ती के नियम कुछ और बताते हैं तो भर्ती नियमों को प्राथमिकता मिलेगी।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “शॉर्टलिस्टिंग के चरण में किसी आरक्षित वर्ग के उम्मीदवार का ओपन मेरिट लिस्ट में शामिल होना ‘माइग्रेशन’ नहीं माना जा सकता क्योंकि इसमें आरक्षण से जुड़ी किसी भी तरह की छूट या लाभ नहीं लिया गया है। अपीलकर्ताओं के तर्क को स्वीकार कर लिया जाए तो इसका न केवल वंचित वर्गों के उम्मीदवारों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा बल्कि संविधान में निहित मूल सिद्धांतों को भी कमजोर करेगा।”
हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में एक कावेयट भी दर्ज कराई है। कोर्ट ने कहा, “इन सिद्धांतों से ऐसी स्थिति पैदा हो सकती है कि कोई आरक्षित वर्ग का उम्मीदवार अपने प्रदर्शन के आधार पर सामान्य/ओपन वर्ग के उम्मीदवारों से बेहतर हो जाए और सामान्य मेरिट सूची में आ जाए लेकिन उसके पास विकल्प सीमित रह जाएँ। ऐसा इसलिए हो सकता है क्योंकि उसे सामान्य वर्ग का उम्मीदवार मान लिया गया हो और जिस सेवा या पद को वह चाहता हो, वह आरक्षित कोटे के लिए निर्धारित हो।”
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश को बरकरार रखते हुए अपीलों को खारिज कर दिया है। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता उम्मीदवारों के मामलों पर विचार करते समय हाईकोर्ट को यह प्रयास करना चाहिए कि पहले से नियुक्त कर्मचारियों को उनके पदों से न हटाया जाए।
फैसले के बड़े मायने
यह सुप्रीम कोर्ट का फैसला सिर्फ राजस्थान हाईकोर्ट की एक भर्ती से जुड़ा तकनीकी निर्णय नहीं है बल्कि यह उस सामाजिक और संवैधानिक बहस को भी स्पष्ट करता है, जो वर्षों से ‘जनरल बनाम रिजर्व कैटेगरी कट-ऑफ’ को लेकर चलती रही है। सोशल मीडिया पर बार-बार ऐसे स्क्रीनशॉट्स दिखाए जाते हैं जिसमें यह दावा किया जाता है कि किसी परीक्षा में SC, ST या OBC का कट-ऑफ जनरल से ज्यादा चला गया है। इसे सहारे मैरिट की बहस शुरू करने की कोशिश की जाती है। यह जजमेंट दरअसल बताता है कि ऐसी स्थिति कैसे पैदा होती है, क्यों पैदा होती है और सबसे महत्वपूर्ण बात कि यह क्यों पूरी तरह वैध और संवैधानिक है।
See this too
General Cutoff less than OBC SC ST Cutoff- Kya bhai merit kahan hai merit https://t.co/mZeCNyw0zM pic.twitter.com/bsWVREq20D— Nethrapal (@nethrapal) November 4, 2025
इस फैसले का दूसरा पहलू और भी ज्यादा महत्वपूर्ण है, जिसे नजरअंदाज कर दिया जाता। इसमें कोर्ट ने स्पष्ट कहा है कि कोई भी उम्मीदवार जो बिना किसी रियायत के परीक्षा में बैठा है उसके लिए यह नियम पूरी तरह लागू होगा। यानी अगर कोई आरक्षित वर्ग का उम्मीदवार किसी प्रकार की रियायत लेकर परीक्षा में बैठा होता जैसे- उम्र में छूट, अटेम्पट में छूट या फिजिकल छूट तो शायद स्थिति बदल जाती। ऐसे उम्मीदवार के ज्यादा अंक होने के बावजूद, वह जनरल सीट के लिए दावा नहीं कर सकता।
आरक्षित वर्ग के उम्मीदवारों को सामान्य श्रेणी के पदों पर नियुक्त इस शर्त के साथ किया जाता कि आरक्षित वर्ग के उम्मीदवार ने परीक्षा में आरक्षण से जुड़ी अन्य सुविधाओं का लाभ ना लिया हो। चूँकि अधिकांश आरक्षित वर्ग के उम्मीदवार इन सुविधाओं का लाभ लेते हैं और इसलिए भले ही वे सामान्य वर्ग के कट-ऑफ से अधिक अंक क्यों न ले आए हों, उन्हें सामान्य श्रेणी के लिए पात्र नहीं माना जाता। यही वह वजह हैं जिनके चलते सामान्य वर्ग का कट-ऑफ से आरक्षित वर्ग का कट-ऑफ से ऊपर चला जाता है।
असल में होता यह है कि कुछ आरक्षित वर्ग के उम्मीदवार उम्र या अन्य रियायत लेकर परीक्षा देते हैं और अच्छा स्कोर करते हैं। लेकिन क्योंकि उन्होंने रियायत ली है इसलिए कानून उन्हें जनरल मेरिट में गिनने की अनुमति नहीं देता। वे अपनी ही श्रेणी में गिने जाते हैं। इसका नतीजा यह होता है कि आरक्षित श्रेणी की मेरिट लिस्ट ऊपर खिसक जाती है और उसका कट-ऑफ कभी-कभी जनरल से भी ज्यादा हो जाता है।
यह जजमेंट इस बात को रेखांकित करता है कि आरक्षण व्यवस्था को दंड या विशेषाधिकार के चश्मे से नहीं बल्कि समावेशन के संतुलन के रूप में समझा जाना चाहिए। आरक्षित वर्ग का अधिक कट-ऑफ दिखना इस संतुलन के टूटने का नहीं बल्कि उसके सही ढंग से लागू होने का ही संकेत है। यही कारण है कि सुप्रीम कोर्ट ने ऐसी स्थिति को न केवल स्वीकार्य माना बल्कि उसे पूरी तरह वैध और संवैधानिक ठहराया।