गुआनो युद्ध का दौर

संयुक्त राज्य अमेरिका ने 3 जनवरी 2026 को वेनेज़ुएला पर एक बड़ा सैन्य हमला किया, जिसे ‘ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिज़ॉल्व’ नाम दिया गया। इस अभियान में अमेरिकी सेना ने 150 से अधिक विमानों, डेल्टा फ़ोर्स और अन्य विशेष सशस्त्र इकाइयों की मदद से वेनेज़ुएला की राजधानी काराकास में हवाई और जमीनी हमले किए। इसके बाद राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सिसिलिया फ्लोरेस को हिरासत में लेकर अमेरिका भेज दिया गया। कई देशों ने इस कार्रवाई को राष्ट्रपति के अपहरण के समान बताया।

अमेरिकी सरकार का कहना है कि उसकी नाराज़गी मादुरो सरकार से इसलिए है क्योंकि वेनेज़ुएला में ड्रग्स और नार्को-आतंकवाद को बढ़ावा दिया गया। लेकिन दुनिया के बड़े हिस्से की राय है कि इस टकराव की असली वजह वेनेज़ुएला का विशाल तेल भंडार और उससे अमेरिकी कंपनियों को होने वाला आर्थिक लाभ है।

वैश्विक तेल भंडार

पिछले कई दशकों में दुनिया के अनेक युद्ध तेल के लिए लड़े गए हैं। हालांकि इतिहास बताता है कि संसाधनों को लेकर संघर्ष हमेशा तेल तक सीमित नहीं रहे हैं। आज जब वैश्विक ध्यान दक्षिण अमेरिका पर है, तो यह जानना रोचक है कि कभी इसी क्षेत्र में एक युद्ध तेल के लिए नहीं, बल्कि पक्षियों की बीट—जिसे गुआनो कहा जाता है—जैसे संसाधन के लिए लड़ा गया था।

यदि कोई यह मानता है कि अमेरिका का ऐसा आक्रामक रवैया हाल की घटना है, तो इतिहास इससे अलग तस्वीर पेश करता है। अन्य औपनिवेशिक और साम्राज्यवादी शक्तियों की तरह अमेरिका भी लंबे समय से प्राकृतिक संसाधनों पर गहरी नजर रखता रहा है। कई बार उसने नैतिकता को पीछे छोड़कर अपने हितों को प्राथमिकता दी। इसी कारण एक समय में अमेरिका ने न केवल सोना और चाँदी, बल्कि पक्षियों और चमगादड़ों की बीट तक को भी ‘राष्ट्रीय हित’ का विषय माना।

पक्षियों के मल क्यों आते थे काम

यह दिलचस्प ऐतिहासिक कहानी 19वीं सदी के मध्य के अमेरिका से जुड़ी है। उस समय अमेरिका में खेती तेजी से फैल रही थी। किसान अब सिर्फ अपने खाने भर की खेती नहीं कर रहे थे, बल्कि बाजार और मुनाफे पर आधारित खेती हर जगह शुरू हो चुकी थी। बड़े-बड़े प्लांटेशन अभी भी मौजूद थे, जहाँ ग़ुलामों से काम लिया जाता था, और यह व्यवस्था अटलांटिक दास व्यापार से जुड़ी हुई थी। खेती का पूरा औद्योगीकरण और उसका वैज्ञानिक ज्ञान अभी आने में कई दशक बाकी थे।

इस मुनाफा-केंद्रित खेती के साथ एक गंभीर समस्या सामने आने लगी। हरके बाद पैदावार घटने लगी। 1850 तक अमेरिका के चौथे-पाँचवें खेतों की जमीन अपनी उपजाऊ शक्ति खोने लगी थी। ऐसा लगने लगा कि लगातार ज्यादा मुनाफा कमाने की लालच किसानों से उनकी मिट्टी की ताकत छीन रही है।

साम्राज्यों का तर्क सीधा और कठोर होता है, मुनाफा लगातार बढ़ना चाहिए। लेकिन बढ़ते मुनाफे के लिए ज्यादा संसाधनों की जरूरत होती है और कई बार ये संसाधन देश की सीमाओं के बाहर होते हैं। जब किसी चीज की कमी होने लगती है, तो वही चीज रणनीतिक संसाधन बन जाती है।

इसी दौर में एक ऐसी चीज अचानक बेहद कीमती बन गई, जिससे आज ज्यादातर लोग दूरी बनाए रखना पसंद करते हैं। जो चीज आज हमारी बालकनियों को गंदा कर देती है, वही 19वीं सदी में दुनिया भर की चाहत बन गई। यह चीज अंतरराष्ट्रीय कानून, नौसेना की तैनाती और यहाँ तक कि युद्धों का कारण बनी।

यह पदार्थ था गुआनो समुद्री पक्षियों और चमगादड़ों की सूखी बीट, जिसे पीसकर खेतों में खाद के रूप में इस्तेमाल किया जाता था। गुआनो मुख्य रूप से गरम और सूखे, बिना आबादी वाले द्वीपों से मिलता था, जो मध्य अमेरिका और प्रशांत महासागर में स्थित थे।

दिलचस्प बात यह थी कि बाजार और मुनाफे की खेती से पैदा हुई समस्या का समाधान भी उसी बाजार में मौजूद था। अमेरिकी किसानों के लिए मिट्टी की उर्वरता लौटाने का जवाब गुआनो बना और इसी ने आगे चलकर पूरी दुनिया की राजनीति और युद्धों को प्रभावित किया।

गुआनो: दुनिया का सबसे असंभावित चमत्कारी पदार्थ

आज सुनने में गुआनो किसी साम्राज्य की नींव जैसा नहीं लगता, लेकिन 19वीं सदी में यह बेहद कीमती संसाधन था। गुआनो में नाइट्रोजन, फॉस्फेट और पोटैशियम भरपूर मात्रा में होते हैं। यही तीन तत्व आज भी NPK खाद के मुख्य घटक हैं। इस वजह से गुआनो एक चमत्कारी जैविक खाद माना जाता था, जो बंजर और थकी हुई मिट्टी को फिर से उपजाऊ खेत में बदल देता था।

गुआनो का असर इतना जबरदस्त था कि कई जगहों पर फसल की पैदावार कई गुना बढ़ गई। उस दौर में जब कृषि पूरी अर्थव्यवस्था की रीढ़ थी और बारूद बनाने के लिए नाइट्रेट्स (खासकर पोटैशियम) की जरूरत होती थी, तब गुआनो दोहरा फायदा देने वाला रणनीतिक संसाधन बन गया खेती के लिए भी और सैन्य ताकत के लिए भी।

इसी कारण औपनिवेशिक शक्तियाँ, जो ज्यादा उत्पादन और सैन्य बढ़त चाहती थीं, गुआनो पर कब्जा जमाने के लिए आपस में होड़ करने लगीं। लेकिन गुआनो हर जगह नहीं मिलता था। इसके भंडार बहुत दुर्लभ थे और दुनिया के कुछ गिने-चुने, दूरदराज़ और निर्जन द्वीपों तक सीमित थे।

ये द्वीप सैकड़ों, बल्कि हजारों वर्षों तक इंसानों की पहुँच से बाहर रहे। इसी वजह से वहाँ समुद्री पक्षियों की बीट की परतें एक के ऊपर एक जमा होती गईं। समय के साथ ये परतें सख़्त होकर चट्टानों जैसी बन गईं और इन्हीं से विशाल गुआनो भंडार तैयार हुए।

इन द्वीपों की जलवायु भी गुआनो को ताक़तवर बनाने में मददगार थी। गर्म और सूखा मौसम, और बहुत कम बारिश, इसके पोषक तत्वों को बहने से बचाता था। इसी कारण इनमें मौजूद तत्व लंबे समय तक सुरक्षित रहते थे।

आज के नज़रिए से यह बात अजीब लग सकती है कि देश कभी पक्षियों की बीट के लिए युद्ध करें। लेकिन उन्नीसवीं सदी के रणनीतिकारों के लिए यह हँसने की नहीं, बल्कि बेहद गंभीर और ज़रूरी बात थी।

सदियों से पक्षियों के मल से ढके द्वीप

वो चट्टानें जिसकी कीमत पहले किसी ने नहीं समझी, बाद में युद्ध हुआ

पेरू के तट के पास स्थित द्वीपों पर उच्च गुणवत्ता का गुआनो बनने के लिए बिल्कुल अनुकूल परिस्थितियाँ थीं। इसी वजह से पेरू का गुआनो दुनिया में सबसे ज्यादा कीमती माना जाता था, क्योंकि उसमें पोषक तत्वों की मात्रा सबसे अधिक थी। औपनिवेशिक ताकतें इन गुआनो द्वीपों को सोने की खान की तरह देखती थीं। इनमें सबसे प्रसिद्ध थे चिंचा द्वीप (Chincha Islands), जो पेरू के समुद्र तट से कुछ दूरी पर स्थित हैं।

ये द्वीप बंजर, तेज हवाओं से घिरे और पूरी तरह निर्जन थे। पहली नजर में ये चट्टानी टापू बिल्कुल बेकार लगते थे। लेकिन इन्हीं परिस्थितियों की वजह से यहाँ बेहद बड़ी मात्रा में सबसे शुद्ध और ताकतवर गुआनो जमा हो पाया था। यह गुआनो सालों तक खेती की उत्पादकता बनाए रखने और उससे मिलने वाली आय के लिए काफी था, इतना कि इसने साम्राज्यों को ईर्ष्या में डाल दिया।

स्पेन, जिसकी अमेरिका पर पकड़ 19वीं सदी की शुरुआत से ही कमजोर पड़ रही थी, उसने इसमें अपना मौका देखा। 14 अप्रैल 1864 को स्पेन ने चिंचा द्वीपों पर कब्जा कर लिया और वहाँ से गुआनो निकालना शुरू कर दिया, ताकि अपनी खराब होती आर्थिक हालत को संभाला जा सके। लेकिन पेरू और उसके पड़ोसी देश गुआनो की कीमत को अच्छी तरह समझते थे और वे स्पेन को यह खजाना बिना विरोध के देने को तैयार नहीं थे।

नतीजा यह हुआ कि पेरू, चिली, इक्वाडोर और बोलीविया की संयुक्त सेनाओं ने स्पेन को चिंचा द्वीपों से पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। सुनने में अजीब जरूर लग सकता है कि इतिहास में कैसे ये अनोखा संघर्ष हुआ जहाँ पक्षियों की बीट को लेकर लड़ाई हुई। लेकिन उस समय इस युद्ध में शामिल देशों के लिए मामला बेहद गंभीर था। गुआनो की बिक्री से सेनाओं को पैसा मिलता था, व्यापार चलता था और कई देशों की आर्थिक हालत इसी पर टिकी हुई थी।

पेरू के तट के पास स्थित चिनचा द्वीप

USA ने उठाया फायदा

इन युद्धों को देखते हुए, अमेरिका ने इसका पहले ही हल निकाला। 1856 में अमेरिकी कॉन्ग्रेस ने गुआनो आइलैंड्स एक्ट नाम का एक कानून पास किया, जो आज भी लागू है। आज यह कानून अजीब लग सकता है, लेकिन उस समय अमेरिकी नेताओं को यह पूरी तरह व्यावहारिक लगा।

इस कानून के तहत किसी भी अमेरिकी नागरिक को यह अधिकार मिल गया कि वह गुआनो से भरपूर किसी निर्जन द्वीप पर अमेरिका की ओर से दावा कर सके। इसके बाद अमेरिकी नागरिक समुद्र यात्राओं पर निकले, गुआनो वाले द्वीप खोजे और उन्हें अमेरिकी क्षेत्र घोषित किया।

1857 में अमेरिका ने 22 तोपों से लैस एक युद्धपोत भेजा, ताकि इन नए दावा किए गए द्वीपों से गुआनो इकट्ठा किया जा सके और उसकी जाँच की जा सके। इसी तरीके से कैरेबियन सागर और प्रशांत महासागर में दर्जनों द्वीपों पर अमेरिका ने दावा किया। वहाँ अमेरिकी झंडे लगाए गए और प्राकृतिक संसाधन निकाले गए।

इन द्वीपों पर बसावट आमतौर पर स्थायी नहीं होती थी। उद्देश्य साफ था गुआनो को अमेरिका भेजो, मुनाफा कमाओ और फिर अगला द्वीप खोजो। अमेरिकी रवैया बेहद व्यावहारिक और सरल था, जहाँ गुआनो है, वहाँ अमेरिका का हित है। गुआनो आइलैंड्स एक्ट के तहत अमेरिका ने सौ से भी ज्यादा द्वीपों पर दावा किया। लेकिन जैसे ही गुआनो खत्म हुआ, ज्यादातर द्वीपों को छोड़ दिया गया।

अमेरिकी गुआनो द्वीप

जिस तरह गुआनो का महत्व अचानक बढ़ा था, उसी तरह वह जल्दी ही खत्म भी हो गया। वैज्ञानिक प्रगति के साथ यह समझ में आ गया कि गुआनो फसलों की पैदावार क्यों बढ़ाता है। इसके पीछे नाइट्रोजन और फॉस्फोरस की भूमिका साफ हो गई।

इसके बाद कृत्रिम (सिंथेटिक) उर्वरकों का उत्पादन शुरू हुआ, जिनसे बड़ी मात्रा में नाइट्रोजन और फॉस्फोरस मिलने लगे। अब कुछ टन पक्षियों की बीट के लिए युद्धपोत भेजने, कूटनीतिक तनाव पैदा करने या तोपें चलाने की जरूरत नहीं रही।

शुरुआत में गुआनो की जगह बोन मील, पिसा हुआ फॉस्फेट पत्थर जैसे विकल्प इस्तेमाल होने लगे। फिर 1910 के दशक में हैबर प्रक्रिया आने के बाद यूरिया खाद आम हो गई।

इतिहासकारों के लिए इसमें एक रोचक सबक है, जिस संसाधनके लिए कभी युद्धों और कानूनों को सही ठहराता था, वह कुछ ही दशकों में बेकार हो गया। बड़े-बड़े साम्राज्यों ने खुद को बदला, नई दिशा अपनाई और आगे बढ़ गए। पीछे रह गए खाली पड़े द्वीप, जिन पर अब भी सफेद, चॉक जैसी परतें जमी हैं, जो इतिहास की अजीब विडंबनाओं की याद दिलाती हैं।

पूरी बात को समझने के लिए गुआनो युग की एक छोटी समय रेखा पर नजर डालना जरूरी है। 1840 के दशक के आसपास यूरोप में मिट्टी की उर्वरता कम होने लगी थी। 1840 से 1860 के बीच पेरू के गुआनो से भरे द्वीपों को बड़े पैमाने पर खोदकर खाली किया गया।

1856 में अमेरिका ने गुआनो आइलैंड्स एक्ट लागू किया। 1864 से 1866 के बीच स्पेनिश साम्राज्य और उसकी पूर्व उपनिवेशों के बीच चिनचा द्वीपों को लेकर युद्ध हुआ। फिर 1800 के दशक के अंत तक दुनिया ने पक्षियों की बीट यानी गुआनो को लगभग नज़रअंदाज़ कर दिया और कृत्रिम उर्वरकों की ओर बढ़ गई।

(मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रारब्ध राय ने लिखी है जिसको पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करे)

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