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सुंदरवन की डेमोग्राफी बदली, हिन्दू भी करने लगे मुस्लिम ‘देवी’ की पूजा: मुर्शिदाबाद हिंसा की दिल दहला देने वाली तस्वीरों की प्रदर्शनी, ये है ग्राउंड की सच्चाई


मुर्शिदाबाद, निशांत आज़ाद

नई दिल्ली स्थित कंस्टीटूशन क्लब में शुक्रवार (25 जुलाई, 2025) को Organiser मीडिया संस्थान द्वारा पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद में अप्रैल 2025 में हुई हिंसा की तस्वीरों की प्रदर्शनी लगाई गई। इसका उद्देश्य था कि लोग इस हिंसा को भूलें नहीं और न्याय मिलने की दिशा में बहस आगे बढ़े। पत्रकार निशांत आज़ाद वहाँ ग्राउंड रिपोर्टिंग करने गए थे और ये तस्वीरें उन्होंने ही वहाँ से लाईं। ख़तरा मोल लेकर इस तरह की बहादुरी भरी रिपोर्टिंग के लिए लोगों ने उनकी प्रशंसा की।

मुर्शिदाबाद में इस्लामी हिंसा की तस्वीरें, कब मिलेगा न्याय?

इस अवसर पर केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के वरिष्ठ सलाहकार कंचन गुप्ता, पूर्व राज्यसभा सांसद व पत्रकार स्वप्न दासगुप्ता, लेखक एवं ‘द प्रिंट’ में कंट्रिब्यूटिंग एडिटर दीप हलदर और Organiser के संपादक प्रफुल्ल केतकर के अलावा आसनसोल (दक्षिण) विधानसभा क्षेत्र की विधायक व पश्चिम बंगाल भाजपा की जनरल सेक्रेटरी अग्निमित्रा पॉल मौजूद थीं।

इन तस्वीरों में हरगोविंद दास और उनके बेटे चंदन दास की विधवाओं और उनके घर के बच्चों की हृदय विदारक तस्वीरें भी शामिल थीं। साथ ही हिन्दू देवी-देवताओं की खंडित मूर्तियों की तस्वीरें भी थीं। इसके अलावा हिंसक इस्लामी भीड़ ने किस तरह गाड़ियों को जलाया, ये भी लोगों ने देखा।

कंस्टीटूशन क्लब में आयोजित इस प्रदर्शनी के दौरान वक्ताओं ने पश्चिम बंगाल में जारी हिंसा, बदलती जनसांख्यिकी और राजनीतिक चुप्पी पर गंभीर सवाल उठाए। वरिष्ठ पत्रकार एवं पूर्व राज्यसभा सांसद स्वप्न दासगुप्ता ने कहा, “पश्चिम बंगाल पश्चिम बांग्लादेश बनने की कगार पर है। अगर आज भी लोग चुप रहे तो आने वाले समय में बंगाल का स्वरूप पहचानना मुश्किल हो जाएगा।”

प्रफुल्ल केतकर, संपादक, Organiser ने कहा, “यह मामला केवल टीएमसी बनाम बीजेपी या पहले का टीएमसी बनाम सीपीएम तक सीमित नहीं है। यह लोकतंत्र और राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा है। सबसे ज्यादा पीड़ित महिलाएँ और अनुसूचित जाति के लोग हैं। हिंदू समाज, जो देश की धर्मनिरपेक्षता का प्रतीक माना जाता है, आज हिंसा का सबसे बड़ा शिकार बन गया है।”

मंदिरों का ध्वस्तीकरण, मूर्तिकारों की हत्या

आसनसोल (दक्षिण) की विधायक अग्निमित्रा पॉल ने अपने संबोधन में कहा कि “मुर्शिदाबाद में 9 हिंदू मंदिरों को ध्वस्त कर दिया गया। यह वही भूमि है जो शक्ति की भूमि कहलाती है – माँ दुर्गा, माँ काली की मूर्तियों को अपवित्र किया गया। जलापूर्ति के स्रोतों को काट दिया गया और जलाशयों को जहर देकर दूषित किया गया। शमशेरगंज के ओसी शिव प्रसाद घोष ने कोई कार्रवाई नहीं की और बीएसएफ को निष्क्रिय बैठा दिया गया।”

उन्होंने आगे बताया कि “मूर्ति बनाने वाले हरगोविंद दास और चंदन दास की नृशंस हत्या कर दी गई। यह हमला न इसलिए हुआ कि वे किसी राजनीतिक दल से जुड़े थे या उन्होंने विरोध किया था, बल्कि इसलिए कि वे हिंदू थे। यह हिंसा अचानक नहीं हुई, बल्कि यह टीएमसी नेता इनामुल हक की साजिश के तहत पूर्व-नियोजित थी। कोलकाता हाईकोर्ट ने भी इस पर सख्त टिप्पणियाँ की हैं।”

वक्ताओं ने इस हिंसा की तुलना कश्मीर के हालात से करते हुए कहा कि बंगाल और कश्मीर में हिंसा का तरीका लगभग एक जैसा है। मस्जिदों से भीड़ को भड़काया गया और केंद्र सरकार के खिलाफ नारेबाजी करवाई गई। हम नहीं चाहते कि आसनसोल भी अनंतनाग बन जाए। यह विधानसभा चुनाव का मुद्दा नहीं है, यह अस्तित्व का सवाल है।

कंचन गुप्ता ने जनसांख्यिकी में हो रहे बदलाव को रेखांकित करते हुए कहा, “पश्चिम बंगाल की जनगणना में हिंदू आबादी का अनुपात तेजी से घट रहा है। 1/4, 1/3, 1/2 के आँकँड़े यह संकेत देते हैं कि मुर्शिदाबाद बंगाल के पतन का एक और मील का पत्थर है। पुलिस की थोड़ी भी सक्रियता से हालात बदले जा सकते थे। लेकिन प्रशासन की भूमिका संदेहास्पद रही।”

सुंदरबन की डेमोग्राफी बदली, ‘बोनबीबी’ की पूजा

कंचन गुप्ता ने कहा कि सुंदरबन की जनसांख्यिकी पूरी तरह बदल चुकी है और हिन्दू भी अब मुस्लिम ‘देवी’ बोनबीबी की पूजा कर रहे हैं। उन्होंने चिंता जताई कि कैसे तबलीगी जमात लगातार सुंदरबन, सिलीगुड़ी और झारखंड में कैंप लगा रही है। बांग्लादेश से समुद्री रास्तों और मुहानों से घुसपैठ हो रही है। ममता बनर्जी अब बंगाली बनाम बीजेपी शासित राज्यों का नैरेटिव खड़ा कर रही हैं। बंगाल की भाषा उर्दू असर में आ रही है। यहां तक कि उनके आधिकारिक लेटरहेड पर बंगाली नहीं बल्कि उर्दू और अंग्रेज़ी प्रमुख हो गई है। उन्होंने पूछा कि क्या यही बंगाली अस्मिता है?

दीप हलदर, लेखक और ‘द प्रिंट’ में कंट्रिब्यूटिंग एडिटर, ने कहा कि पश्चिम बंगाल में अगर ‘पंचायत’ सीरीज बनती तो उसका नाम ‘मिर्ज़ापुर’ हो जाता क्योंकि वहाँ हिंसा से पंचायत चुनाव भी अछूता नहीं है। यह मज़ाक नहीं, बल्कि भयावह यथार्थ है। बंगाल और बांग्लादेश में एकमात्र फर्क यह है कि बांग्लादेश का बौद्धिक वर्ग अब जागरूक है, जबकि यहां चुप्पी साधी हुई है।”

कार्यक्रम के अंत में विहिप प्रवक्ता विनोद बंसल ने कहा, “अब बंगाली हिंदुओं को पलायन की नहीं, पराक्रम की आवश्यकता है। उन्हें अपने अधिकारों और अस्तित्व की रक्षा के लिए संगठित होना होगा।”

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