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पक्षी-घंटी-छिपकली की तस्वीरें, लियानपुई गाँव में पत्थरों पर छपी हैं मिजो परंपराएँ: मिजोरम के मेनहिर को घोषित किया गया ऐतिहासिक स्थल, ASI ने दिया राष्ट्रीय महत्व का दर्जा


लियानपुई ASI मिजोरम

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने मिजोरम के लिआनपुई गाँव स्थित लुंगफुन रोपुई में प्राचीन मेनहिरों को ‘राष्ट्रीय महत्व के स्मारक’ के तौर पर घोषित किया है। अब इस स्थल की सुरक्षा और देखरेख केंद्र सरकार द्वारा की जाएगी।

केंद्र सरकार ने 9 फरवरी को दो महीने की सार्वजनिक अधिसूचना जारी की थी। इसके बाद ASI ने 14 जुलाई को इसकी आधिकारिक घोषणा की। केंद्र सरकार की अधिसूचना अवधि प्राचीन स्मारक और पुरातत्व स्थल एवं अवशेष अधिनियम, 1958 के तहत आवश्यक होती है ताकि किसी स्थल को राष्ट्रीय संरक्षण में लेने से पहले कई भी आपत्ति हों तो उन्हें सामने लाया जा सके।

इस मान्यता की प्रक्रिया 2021 में भारत के राजपत्र में प्रारंभिक अधिसूचना के साथ शुरू हुई थी। 7 जुलाई 2025 को ASI के निदेशक (स्मारक) ने अंतिम अधिसूचना जारी होने से पहले गाँव में स्थित स्थल का दौरा किया था।

लिआनपुई नाम का एक छोटा सा पहाड़ी गाँव चम्फाई शहर से लगभग 54 किलोमीटर दक्षिण-पूर्व में बसा है। इसकी स्थापना 18वीं शताब्दी में लुसेई प्रमुख लिआनपुइया ने की थी। उन्हीं के नाम पर इसका नाम रखा गया है। यह गाँव शुरुआत में मुआलबॉक में स्थापित किया गया था। बाद में वर्तमान स्थान पर स्थानांतरित किया गया।

लिआनपुई के मेनहिर मिजोरम में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा ‘राष्ट्रीय महत्व का स्मारक’ घोषित किए गए दूसरे स्थल हैं। इससे पहले वांगछिया गाँव के कावछुआह रोपुई को यह दर्जा मिला था।

ये मेनहिर प्राचीन मिजो के प्रतीक की नक्काशी के साथ, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक दृष्टि से काफी अहम हैं। इन विशिष्ट रूप से तराशे गए पत्थरों के माध्यम से प्रारंभिक मिजो के लोगों के जीवन, वहाँ होने वाले कार्यक्रमों, रीति-रिवाजों और उस समय के लोगों के विश्वासों की झलक मिलती है।

क्या हैं मेनहिर

मेनहिर (Menhir) शब्द असल में शब्द ब्रिटोनिक भाषा के दो शब्दों से बना है- Maen मतलब पत्थर और Hir अर्थात लंबा। ये एक प्रकार की प्रागैतिहासिक पत्थर की संरचना होती है, जिसे आमतौर पर ऊर्ध्वाधर (खड़ा) रूप में स्थापित किया जाता है। ये इंसानों द्वारा बनाए गए हैं और ऐतिहासिक, धार्मिक या खगोलीय उद्देश्यों से जुड़े होते हैं।

मिजोरम के कला और संस्कृति विभाग के पुरातत्वविद वानलालहुमा ने बताया, “इन पत्थरों पर मानव आकृतियाँ, पक्षी, जानवर, मिथुन के सिर, घंटियाँ और छिपकलियाँ उकेरी गई हैं। ये ईसाई धर्म के आने से पहले मिजो लोगों की सांस्कृतिक परंपराओं की जानकारी देती हैं।”

उन्होंने आगे बताया, “ये मेनहिर आठ पंक्तियों में व्यवस्थित किए गए हैं। इनमें से 4 उत्तर-दक्षिण दिशा में और 4 पूर्व-पश्चिम दिशा में हैं। ये एक तरह से सुनियोजित और धार्मिक उद्देश्य से की गई व्यवस्था का संकेत देती हैं।”

मेनहिर के पत्थर यूरोप, एशिया और अफ्रीका जैसे विभिन्न महाद्वीपों में पाए जाते हैं। पश्चिमी यूरोप में इनकी संख्या सबसे अधिक है। भारत में भी मेनहिर कई राज्यों में पाए जाते हैं। इनमें कर्नाटक, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश शामिल हैं।

विश्व के प्रसिद्ध मेनहिर स्थलों में यूके के स्टोनहेंज और एवबरी, यूके का कार्नवॉल में मेन-एन-टोल, पुर्तगाल में अलमेंद्रेस क्रोमलेक, नीदरलैंड्स में ड्रेंथे और फ्रांस में कार्नाक स्टोन्स आदि हैं।

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