असम सत्र भूमि कब्जा

सीएम हिमंता बिस्वा सरमा ने असम में सत्र भूमि को अतिक्रमण से मुक्ति दिलाने की बड़ी पहल की है। पूर्वोत्तर राज्य असम में कई वैष्णव मठ हैं जिन्हें सत्र कहा जाता है। इनकी स्थापना असमिया संत श्रीमंत शंकरदेव और उनके शिष्यों माधवदेव, हरिदेव और दामोदरदेव ने 15वीं और 16वीं शताब्दी में की थी।

सत्र एक आध्यात्मिक संस्था है और राज्य में पारंपरिक साहित्य, संगीत और अन्य सांस्कृतिक का केंद्र रहा है। आम तौर पर सत्र भूमि में एक बड़ा प्रार्थना कक्ष, स्नान कक्ष, शयनगृह और अतिथि गृह होते हैं।

असम के सत्र ( फाइल फोटो, साभार- पर्यटन विभाग, असम सरकार )

राज्यभर में करीब 900 सुत्रा है जो चारों ओर फैले हुए हैं। ये लोग सामाजिक-सांस्कृतिक परंपरा से जुड़े हुए हैं। इनमें औनियाती, कमलाबारी, दखिनपत, गरमुर, बेंगनाती, समागुरी और नतुन कमलाबारी शामिल हैं।

सैकड़ों वर्षों से राजाओं और स्थानीय हिंदुओं ने सांस्कृतिक, आर्थिक और धार्मिक प्रचार के लिए सत्रों को भूमि दान में देते आ रहे हैं। इन जमीनों को ‘सत्र भूमि’ के रूप में जाना जाता है। इसका उल्लेख आधिकारिक भूमि अभिलेखों में भी है।

इस सत्र भूमि का इस्तेमाल भिक्षुओं की मदद और धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यों में होता था। असमिया पहचान को बनाए रखने में सत्र आज भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

सत्र भूमि पर कब्जा

पूरे असम में सत्र भूमि के बड़े हिस्से पर अवैध कब्जा हो चुका है। सत्र भूमि की समस्याओं की समीक्षा और मूल्यांकन के लिए बने आयोग ने अपने रिपोर्ट में कहा है कि असम के 11 जिलों में 303 सत्रों की 15,288.52 बीघा (1,898 हेक्टेयर से अधिक) भूमि पर अवैध रूप से कब्जा कर लिया गया है।

सीएम हेमंता बिस्वा सरमा ने कहा है कि बोंगाईगांव, माजुली, डिब्रूगढ़, नागांव, बाजाली, कामरूप, लखीमपुर और धुबरी जैसे जिलों में बड़े पैमाने पर अतिक्रमण किया गया है। राजधानी दिसपुर के आकार से दोगुने क्षेत्रों पर अतिक्रमण कर लिया गया है।

सरमा ने ट्वीट किया, “हमारी राजधानी दिसपुर से दोगुना बड़ा क्षेत्र! हां, असम में सत्र भूमि पर अतिक्रमण का यह परिणाम है। सत्रों पर अतिक्रमण का विशाल पैमाना असम की संस्कृति और पहचान पर सीधा हमला है।”

जनसांख्यिकीय परिवर्तन, भू-माफिया की संलिप्तता और राजनीतिक संरक्षण जैसे कारकों ने इस खतरे को बढ़ाने में योगदान दिया है। उन्होंने अवैध अतिक्रमण से सख्ती से निपटने का प्रण लिया है।

असम सरकार ले रही है भूमि वापस

हाल के वर्षों में, असम में हिमंत बिस्वा सरमा सरकार ने सत्र भूमि को अवैध कब्जे से मुक्ति दिलाने में अहम भूमिका निभाई है।
नवंबर 2021 में इसको लेकर एक उच्च स्तरीय समिति का गठन किया गया। इसे ‘असम में सत्र भूमि की समस्याओं की समीक्षा और आकलन के लिए आयोग (CRAPSLA) कहा जाता है। आयोग में असम के तीन विधायक प्रदीप हजारिका, रूपक सरमा और मृणाल सैकिया शामिल थे।

एक साल बाद दिसंबर 2022 में, CRAPSLA ने अपनी अंतरिम रिपोर्ट हिमंत बिस्वा सरमा को सौंपी। रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने असम के 62 सत्रों का दौरा किया और अवैध अतिक्रमणों की जाँच की। आयोग का कार्यकाल आगे बढ़ाया गया ताकि अधिक प्रभावित सत्रों का दौरा किया जा सके।

9 जून 2023 को CRAPSLA ने अपनी अंतिम रिपोर्ट हेमंत बिस्वा सरमा को सौंपी। आयोग ने 126 सत्रों का दौरा किया, अपना विस्तृत मूल्यांकन दिया और नीतिगत कार्रवाई के लिए सिफारिशें की।

असम के मुख्यमंत्री ने कहा, “यह रिपोर्ट सत्र भूमि पर कब्जे की पूरी जानकारी देती है। सरकार निष्कर्षों की गहन जाँच करेगी और सिफारिशों पर कार्रवाई करेगी।” उन्होंने एक वर्ष के भीतर एक स्थायी सत्र आयोग के गठन की भी घोषणा की। आयोग के पास प्रशासनिक स्वायत्तता, न्यायिक अधिकार और राज्य में सत्रों की आर्थिक मदद के लिए वित्तीय अनुदान होगा।

सीएम सरमा ने कहा, “आयोग को संस्थागत बनाने के लिए सितंबर या फरवरी के विधान सत्र में एक कानून पेश किया जाएगा। यह सत्र संस्थानों की सुरक्षा और आधुनिकीकरण के लिए 25 साल का विजन तैयार करेगा।”

अतिक्रमण करने वालों पर होगा एक्शन

दिसंबर 2022 में CRAPSLA की अंतरिम रिपोर्ट प्रकाशित होने के तुरंत बाद असम सरकार एक्शन में दिखी। सरकार ने नागाँव जिले में श्रीमंत शंकरदेव के जन्मस्थान के पास 1000 बीघा भूमि को अतिक्रमण से मुक्त करवाया।

असम सरकार ने फरवरी 2023 में गोपाल अता सत्र के पास 55 बीघा कब्जे वाली जमीन वापस ली। जुलाई 2024 में इसी तरह के अतिक्रमण हटाओ अभियान से सत्र को 34 बीघा भूमि वापस मिली।

अगस्त 2024 में हिमंता सरकार ने 250 साल से ज्यादा पुराने हेरिटेज संस्थानों के 5 किलोमीटर के दायरे में बाहरी लोगों को जमीन खरीदने पर रोक लगा दिया। इसके लिए ‘असम भूमि और राजस्व विनियमन (दूसरा संशोधन) विधेयक’ पारित किया। इसके अलावा सत्र को आर्थिक सहायता देने की भी घोषणा की।

असम सरकार ने अक्टूबर 2024 में सत्रों को भूमि दिए जाने और कानूनी रूप से कोई दिक्कत न हो, इसके लिए ‘मिशन बसुंधरा 3.0’ के तहत कई उपाय किए।

हेमंता विस्वा सरमा ने इस ओर इशारा किया कि मस्जिदों का निर्माण सत्र की जमीन पर हो रहा है साथ ही सत्र संस्कृति को नुकसान पहुँचाने के लिए बीफ खाया जा रहा है।

उन्होंने कहा, “जब सत्र के पास गाय का मांस खाया जाता है और मस्जिद से अज़ान की आवाज सत्र के कार्यक्रमों को बाधित करती है।” उन्होंने कहा कि ऐसी गतिविधियाँ सत्रों से 10 किलोमीटर दूर की जा सकती हैं।

भाजपा 2016 की शुरुआत में ही सत्र की भूमि पर अतिक्रमण का मुद्दा उठाती रही है, जबकि कॉन्ग्रेस शासन ने इसे ‘सरकार की साजिश’ करार दिया है।

पिछले 9 वर्षों में, भाजपा सरकार (अब एक मिशन मोड में) सत्रों को उसकी भूमि वापस दिलाने के काम में लगी हुई है।



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