जम्मू-कश्मीर में पुलिस द्वारा कुछ पत्रकारों को पूछताछ के लिए बुलाए जाने के बाद एक नया राजनीतिक और मीडिया विवाद खड़ा हो गया है। यह विवाद उन खबरों को लेकर है, जिनमें घाटी की मस्जिदों और मदरसों की जानकारी जुटाने की सुरक्षा प्रक्रिया पर सवाल उठाए गए थे। जहाँ एक तरफ मीडिया संगठनों और क्षेत्रीय नेताओं ने इसे प्रेस की आजादी पर हमला बताया है, वहीं दूसरी ओर इस घटना ने यह भी साफ कर दिया है कि कैसे कुछ प्रभावशाली संस्थाएँ आतंकवाद के खिलाफ उठाए जाने वाले पारदर्शी कदमों को फौरन गलत ठहराने की कोशिश करती हैं। अक्सर इस शोर-शराबे में वर्षों से चले आ रहे टेरर फंडिंग नेटवर्क और उन ढाँचों की सच्चाई छिप जाती है, जो कश्मीर में आतंकी घटनाओं को बढ़ावा देने में आगे रहे हैं।

गौरतलब है कि जम्मू-कश्मीर की सीमा पाकिस्तान जैसे संवेदनशील देश से लगती है, जिसे ‘फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स’ (FATF) समेत दुनिया की कई संस्थाएँ आतंकवाद को बढ़ावा देने के लिए बार-बार फटकार लगा चुकी हैं। इसी गंभीर स्थिति को देखते हुए, भारत की सुरक्षा एजेंसियाँ अब अपना पूरा ध्यान टेरर फंडिंग की कमर तोड़ने पर लगा रही हैं, जिसे घाटी में उग्रवाद की जीवनरेखा (लाइफलाइन) माना जाता है।

आतंकी फंडिंग पर केंद्र के फोकस से जुड़ा पुलिस अभियान

पुलिस की वर्तमान कार्रवाई, जिसे कुछ खबरों में मस्जिदों की ‘प्रोफाइलिंग’ (जानकारी जुटाना) कहा जा रहा है, उसे अलग करके नहीं देखा जा सकता। दरअसल, यह मोदी सरकार की उस व्यापक नीति का हिस्सा है जिसका मकसद आतंकवाद की जड़ यानी ‘टेरर फंडिंग’ पर सीधा प्रहार करना है।

सुरक्षा एजेंसियों का हमेशा से यह मानना रहा है कि मस्जिदें और मदरसे भले ही वैध धार्मिक संस्थान हैं, लेकिन इतिहास में इनके एक छोटे हिस्से का इस्तेमाल चरमपंथी संगठनों के लिए चंदा, दान या धार्मिक संग्रह की आड़ में धन जुटाने और उसे ठिकाने लगाने के लिए किया गया है। याद दिला दें कि 1990 के दशक में भी ऐसी खबरें आई थीं कि कैसे आतंकियों ने कश्मीरी पंडितों को डराने और उन्हें घाटी छोड़ने पर मजबूर करने के लिए मस्जिदों के लाउडस्पीकरों का इस्तेमाल किया था।

इन्हीं पुराने अनुभवों को देखते हुए, मौलवियों के संपर्क विवरण, उनकी विचारधारा (पंथ) और वित्तीय रिकॉर्ड जैसी बुनियादी जानकारी माँगना आतंकवाद के खिलाफ एक सामान्य सुरक्षा प्रक्रिया है। यह कदम उन इलाकों के लिए बेहद जरूरी हो जाता है जहाँ कट्टरपंथ और विदेशी समर्थन वाले उग्रवाद का खतरा बना रहता है, खासकर एक ऐसे क्षेत्र में जिसकी सीमा एक दुश्मन देश से लगती है जो भारत को अस्थिर करने के लिए लगातार आतंकी घुसपैठ कराता रहता है।

जम्मू-कश्मीर पुलिस की यह मुहिम कोई अचानक उठाया गया कदम नहीं है, बल्कि यह उस रणनीति का हिस्सा है जिसके सकारात्मक परिणाम पहले भी जमीन पर देखने को मिल चुके हैं।

अतीत से सबक: फंडिंग पर चोट, सड़क पर फैली हिंसा का अंत

टेरर फंडिंग के खिलाफ भारत की इस कड़ाई की सबसे बड़ी सफलता तब देखने को मिली, जब एनआईए (NIA) जैसी एजेंसियों ने व्यवस्थित तरीके से हवाला नेटवर्क, अलगाववादी फंडिंग चैनलों और गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) व धार्मिक संस्थाओं की आड़ में काम करने वाले पाकिस्तानी हैंडलर्स पर नकेल कसना शुरू किया।

पैसे की इस किल्लत का सीधा और बड़ा असर घाटी में पत्थरबाजी की घटनाओं में आई भारी कमी के रूप में दिखा। एक समय था जब पत्थरबाजी लगभग रोज की बात थी, जिससे जनजीवन पूरी तरह ठप हो जाता था और आतंकी संगठन इसे दबाव बनाने के पैंतरे के रूप में इस्तेमाल करते थे। जाँच में यह साफ हुआ कि इनमें से कई विरोध-प्रदर्शन अचानक नहीं होते थे, बल्कि संगठित चैनलों के जरिए इनके लिए पैसे दिए जाते थे और युवाओं में हिंसा भड़काने के लिए रकम बाँटी जाती थी। जैसे ही फंडिंग के ये स्रोत सूखे, ‘आजादी’ के नाम पर किए जाने वाले खोखले दावों की भी हवा निकल गई।

हाई-प्रोफाइल आतंकी फंडिंग मामलों में सजा

आतंकी ईकोसिस्टम को पूरी तरह खत्म करने के मोदी सरकार के संकल्प को उस समय और मजबूती मिली, जब प्रमुख अलगाववादी नेताओं के खिलाफ कड़े फैसले लिए गए। इसी कड़ी में, प्रतिबंधित संगठन ‘दुख्तरान-ए-मिल्लत’ की प्रमुख आसिया अंद्राबी को गिरफ्तार किया गया और कश्मीर में अलगाववाद व हिंसा भड़काने के लिए फंड जुटाने (टेरर फंडिंग) के मामले में दोषी ठहराया गया।

इससे भी महत्वपूर्ण कार्रवाई जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (JKLF) के प्रमुख यासीन मलिक के खिलाफ हुई। मीडिया के एक वर्ग ने लंबे समय तक यासीन मलिक को एक ‘शांतिप्रिय अलगाववादी’ के तौर पर पेश करने की कोशिश की थी, लेकिन NIA ने उसे टेरर फंडिंग के एक बड़े मामले में गिरफ्तार किया और बाद में वह दोषी भी पाया गया। साल 2022 में, एक विशेष अदालत ने मलिक को गैरकानूनी तरीके से धन जुटाने, आपराधिक साजिश रचने और आतंकी संगठनों से संबंध रखने के जुर्म में ‘UAPA’ के तहत उम्रकैद की सजा सुनाई।

इस अदालती फैसले ने उस भ्रम को पूरी तरह खत्म कर दिया कि कश्मीर में अलगाववादी हिंसा अपने आप या बिना किसी नेतृत्व के हो रही थी। इसके बजाय, इस केस ने पाकिस्तान और उसके एजेंटों द्वारा समर्थित एक संगठित फंडिंग तंत्र की पोल खोलकर रख दी।

पुलिस मंशा पर सवाल उठाने वाली रिपोर्टों के बाद पत्रकारों को समन

जब कुछ खबरों में पुलिस की इस कार्रवाई को ‘निगरानी’ (surveillance) या ‘प्रोफाइलिंग’ के तौर पर पेश किया गया, तब राष्ट्रीय अखबारों के पत्रकारों को पूछताछ के लिए बुलाया गया। ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ ने इस बात की पुष्टि की कि कश्मीर में उनके असिस्टेंट एडिटर, बशारत मसूद से एक बॉन्ड पर साइन करने को कहा गया, जिसमें यह लिखा था कि वे ऐसी किसी भी गतिविधि में शामिल नहीं होंगे जिससे ‘शांति भंग’ हो सके।

इसी तरह, कुछ अन्य रिपोर्टरों को भी उनकी खबरों के सिलसिले में श्रीनगर के साइबर पुलिस स्टेशन बुलाया गया। हालांकि पुलिस ने अभी तक इस पर कोई सार्वजनिक बयान जारी नहीं किया है, लेकिन खबरों के मुताबिक यह पूछताछ इस बात को लेकर थी कि पूरी प्रक्रिया को किस तरह पेश किया गया। दरअसल, कश्मीर में कुछ ‘पत्रकारों’ पर अक्सर ऐसे नैरेटिव (विमर्श) चलाने के आरोप लगते रहे हैं जो तनाव भड़का सकते हैं या आतंकवाद के खिलाफ उठाए गए कदमों को गलत तरीके से सांप्रदायिक रंग दे सकते हैं।

मीडिया संगठनों का विरोध, आतंकी फंडिंग की सच्चाई से किनारा

‘एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया’ (EGI) और ‘प्रेस क्लब ऑफ इंडिया’ (PCI) ने तुरंत पुलिस पर डराने-धमकने और दबाव बनाने का आरोप लगाया और डर का माहौल पैदा होने की चेतावनी दी। इसके बाद ‘कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स’ (CPJ) और ‘डिजीपब न्यूज इंडिया फाउंडेशन’ जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने भी सुर में सुर मिलाया।

लेकिन, इन बयानों में सुरक्षा से जुड़ी उस सबसे अहम बात को जानबूझकर नजरअंदाज कर दिया गया कि धार्मिक और चैरिटेबल संस्थाओं के जरिए टेरर फंडिंग कश्मीर में कोई काल्पनिक खतरा नहीं, बल्कि एक हकीकत है जिसके पुख्ता सबूत मौजूद हैं। आतंकवाद के खिलाफ बने वैश्विक ढांचे, चाहे वो FATF हो या संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव, स्पष्ट रूप से ऐसी संस्थाओं की वित्तीय जांँच का निर्देश देते हैं जिनका गलत इस्तेमाल होने की संभावना हो।

मस्जिदों के वित्तीय कामकाज की किसी भी जांच को ‘दमन’ बताकर ये संस्थाएँ और पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाने वाले लोग न केवल अपनी ड्यूटी कर रहे अधिकारियों पर दबाव बनाते हैं, बल्कि अनजाने में उन्हीं जगहों को सुरक्षा कवच प्रदान करने का जोखिम उठाते हैं जिनका इस्तेमाल चरमपंथी नेटवर्क ऐतिहासिक रूप से करते आए हैं।

राजनीतिक विरोध और चयनात्मक चुप्पी

महबूबा मुफ्ती जैसे क्षेत्रीय राजनीतिक नेताओं ने मस्जिदों को ‘निशाना’ बनाए जाने पर आपत्ति जताई और तर्क दिया कि अन्य धार्मिक संस्थानों की भी जाँच होनी चाहिए। हालाँकि, आतंकवाद से जुड़ी पिछली जाँचों में यह साफ तौर पर सामने आया है कि कश्मीर में उग्रवाद की फंडिंग का सीधा संबंध कट्टरपंथी इस्लामी नेटवर्क से रहा है, न कि हिंदू या अन्य धार्मिक संगठनों से।

वहीं, सत्ताधारी नेशनल कॉन्फ्रेंस ने पत्रकारों को पूछताछ के लिए बुलाए जाने की निंदा तो की, लेकिन इसकी जिम्मेदारी उपराज्यपाल मनोज सिन्हा पर डालते हुए खुद को पुलिस की इस कार्रवाई से अलग कर लिया। कॉन्ग्रेस नेताओं ने भी प्रेस की आजादी कम होने पर चिंता जताई, लेकिन उन्होंने इस बात को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया कि 1990 और 2000 के दशक की शुरुआत के मुकाबले अब टेरर फंडिंग के तरीके कितने बदल चुके हैं और कितने आधुनिक हो गए हैं।

असहज सच्चाई

देखा जाए तो पत्रकारों को पुलिस सम्मन भेजे जाने पर मचा यह बवाल एक बुनियादी सवाल से ध्यान भटकाता है: क्या किसी आतंक प्रभावित क्षेत्र में सुरक्षा एजेंसियों को सिर्फ इसलिए वित्तीय जाँच (financial trails) करने से हिचकिचाना चाहिए क्योंकि उसमें धार्मिक संस्थान शामिल हैं?

मोदी सरकार का दृष्टिकोण स्पष्ट रहा है- पैसे के लेनदेन पर नजर रखना, हवाला नेटवर्क को खत्म करना, बड़े टेरर फाइनेंसर्स पर मुकदमा चलाना और पारदर्शिता लागू करना। इस नीति से जम्मू-कश्मीर की सुरक्षा व्यवस्था में पहले ही बड़े और सकारात्मक बदलाव आए हैं। पुलिस की वर्तमान मुहिम पूरी तरह से इसी सुरक्षा ढाँचे का हिस्सा है।

ऐसी कोशिशों पर कीचड़ उछालना और इन्हें ‘तानाशाही’ बताना दरअसल उन तंत्रों को ढाल प्रदान करने जैसा है, जो घाटी में आतंकवाद को जिंदा रखते हैं। इसमें स्वार्थी राजनेताओं और मीडिया निकायों की भूमिका, चाहे अनजाने में हो या जानबूझकर, बेहद विवादास्पद है।

दशकों से पाकिस्तान प्रायोजित हिंसा झेल रहे इस क्षेत्र में जम्मू-कश्मीर पुलिस के सामने चुनौती बिल्कुल साफ है- या तो वे मीडिया संगठनों और अवसरवादी राजनेताओं के इस बनावटी गुस्से के आगे झुक जाएँ, या फिर अपनी ईमानदारी से ड्यूटी करते हुए आतंक की ‘वित्तीय जीवनरेखा’ पर सीधा प्रहार जारी रखें।

(यह रिपोर्ट मूल रुप से अंग्रेजी में अमित केलकर ने लिखी है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

Source link



Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Search

Categories

Tags

Gallery