राजस्थान के हनुमानगढ़ के टिब्बी और संगरिया में अनाज आधारित इथेनॉल फैक्ट्री लगाने का फैसला हुआ, तो लगा राजस्थान में अब इस तरह के उद्योगों की बाढ़ आ जाएगी। अशोक गहलोत के समय एक कार्यक्रम में चंडीगढ़ बेस्ड कंपनी ने हनुमानगढ़ के चावल बेल्ट में इथेनॉल फैक्ट्री लगाने का ऐलान किया, जिसमें ₹450 करोड़ का निवेश होना तय हुआ था। जमीन ले ली गई। प्रक्रिया पूरी हो गई और फिर तभी यहाँ किसानों ने बीते कई माह से मोर्चा संभाल लिया।
आरोप लगाया गया कि इस फैक्ट्री की वजह से मिट्टी दूषित हो जाएगी। भूमिगत जल खराब हो जाएगा। चिमनी से निकले धुएँ से वातावरण जहरीला हो जाएगा। लोगों में बीमारियाँ फैलेंगी और विकास के नाम पर हर तरफ विनाश हो जाएगा। इसके बाद विरोध प्रदर्शन शुरू हुआ। कई दिनों तक शांति से विरोध हुआ और फिर विरोध प्रदर्शन ने हिंसक रूप से लिया। फैक्ट्री की बाउंड्री वॉल गिरा दी गई, जमकर हंगामा हुआ।
कॉन्ग्रेस जो अब विपक्ष में आ चुकी है, उसके सांसद-विधायक हिंसा की अगुवाई करने लगे। आखिरकार किसानों के लगातार विरोध-प्रदर्शन के बाद फैक्ट्री प्रबंधन ने तय किया कि वो अब हनुमानगढ़ में अपनी इथेनॉल फैक्ट्री नहीं लगाएगी।
इस घटनाक्रम के दूसरे ही दिन हनुमानगढ़ के संगरिया में लगने जा रही दूसरी फैक्ट्री को लेकर बवाल शुरू हो गया। महापंचायतें बुलाई जाने लगी। पंजाब जैसे राज्यों से प्रदर्शनकारी हनुमानगढ़ पहुँचे थे, अब वो संगरिया का रुख करने वाले हैं। बहरहाल, ये सब इसलिए बताया जा रहा है, ताकि आपके मन भी सवाल उठे कि क्या वाकई इथेनॉल की फैक्ट्री लगने से इतनी व्यापक तबाही आ जाएगी कि हर तरफ मातम मच जाएगा?
सवाल ये है कि क्या इथेनॉल फैक्ट्री से इतनी तबाही होगी भी या फिर ये सिर्फ डर की वजह से है। दरअसल, 3 साल पहले पंजाब के फिरोजपुर जिले के जीरा कस्बे में विरोध प्रदर्शन की वजह से एक इथेनॉल फैक्ट्री बंद की जा चुकी है। जीरा का यह प्लांट पहले 2006 में एक डिस्टिलरी के रूप में शुरू हुआ था और 2014 में इसे इथेनॉल उत्पादन इकाई में बदल दिया गया. प्लांट के आसपास के गांवों के निवासियों ने शिकायत की थी कि इससे ज़हरीला कचरा निकल रहा है, जिससे भूजल और जमीन प्रदूषित हो रही है।
यह मामला राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) तक पहुँचा, जहाँ 2023 में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने एक रिपोर्ट दाख़िल की। रिपोर्ट में औद्योगिक इकाई के आसपास के इलाक़ों में भूजल और मिट्टी के गंभीर रूप से प्रदूषित होने की बात कही गई थी। लगातार बढ़ते विरोध के बीच जुलाई 2022 में जीरा का यह प्लांट बंद कर दिया गया था। अब इसी तरह के प्रदूषण के डर की वजह से इस फैक्ट्री का विरोध किया जा रहा है।
हालाँकि सच ये है कि जीरा की फैक्ट्री एक स्थानीय अकाली नेता के मालिकाना हक वाली फैक्ट्री थी। जिसकी प्रदूषण संबंधी अनदेखियों के चलते इतना नुकसान हुआ। चूँकि जीरा में नुकसान सामने आ चुका है, तो लोगों में डर है। ऐसे में सवाल ये है कि क्या वाकई इथेनॉल बनाने वाली फैक्ट्रियाँ इतनी ही घातक होती हैं या फिर जीरा का मामला एक अपवाद है?
क्या इथेनॉल फैक्ट्रियों का प्रदूषण जानलेवा है?
इथेनॉल प्लांट्स (विशेषकर जो अनाज/चावल/मक्का आधारित होते हैं) को प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) द्वारा ‘Red Category’ (लाल श्रेणी) के उद्योगों में रखा जाता है। इसका अर्थ है कि अगर आधुनिक तकनीक का उपयोग न हो, तो ये आत्यधिक जानलेवा और प्रदूषणकारी हो सकते हैं। यहाँ ये ध्यान देना है कि ये फैक्ट्री गन्ना नहीं, चावल से चलती।
क्या प्रदूषण को रोका जा सकता है?
तकनीकी पक्ष के साथ जवाब दें तो हाँ, आधुनिक तकनीक से इसे 99% तक नियंत्रित किया जा सकता है। आज के समय में सरकार ने इथेनॉल प्लांट्स के लिए ZLD (Zero Liquid Discharge) तकनीक अनिवार्य कर दी है। इसमें फैक्ट्री से एक बूंद भी गंदा पानी बाहर नहीं निकलना चाहिए। फैक्ट्री को पानी को रिसाइकिल करना होता है और बचे हुए ठोस कचरे (DDGS) को सुखाकर पशु आहार के रूप में बेचा जाता है। वहीं, हवा के प्रदूषण को रोकने के लिए चिमनियों में ESP (Electrostatic Precipitators) लगाना अनिवार्य है जो हवा में राख के कणों को जाने से रोकता है।
अनाज से इथेनॉल और गन्ने से इथेनॉल बनाने में मुख्य अंतर
इथेनॉल एक जैव ईंधन है जो मुख्य रूप से किण्वन (Fermentation) और आसवन (Distillation) प्रक्रिया से बनता है। भारत में यह पेट्रोल में मिलाकर उपयोग होता है। अनाज (जैसे मक्का, चावल, क्षतिग्रस्त अनाज) और गन्ना दोनों से इथेनॉल बनता है, लेकिन प्रक्रिया, उपज, पर्यावरण प्रभाव और लागत में काफी अंतर है।
कच्चा माल और प्रक्रिया का अंतर
गन्ने से इथेनॉल बनाने की प्रक्रिया: गन्ने को कुचलकर रस निकाला जाता है। चीनी बनाने के बाद बचा मोलासेस (गुड़ की गाढ़ी चाशनी), B-हैवी मोलासेस या सीधे गन्ने का रस/सिरप उपयोग होता है। इसमें शुगर (सुक्रोज) सीधे यीस्ट से किण्वित होकर इथेनॉल बनाती है। प्रक्रिया सरल और तेज है।
अनाज से इथेनॉल बनाने की प्रक्रिया: अनाज (मक्का, चावल आदि) में स्टार्च होता है। पहले स्टार्च को पीसकर गर्म पानी में मिलाया जाता है, फिर एंजाइम (अमाइलेज) से शुगर में बदला जाता है (सैकरीफिकेशन)। उसके बाद यीस्ट से किण्वन होता है। यह प्रक्रिया लंबी और अधिक ऊर्जा वाली है।
उपज (यील्ड) और दक्षता: अनाज से प्रति टन कच्चे माल से अधिक इथेनॉल मिलता है (चावल से 450-480 लीटर, अन्य अनाज से 380-460 लीटर)। वहीं गन्ने की मोलासेस से कम उपज होती है, लेकिन गन्ने की प्रक्रिया में बगासे (खोई) से बिजली बनाई जा सकती है, जो ऊर्जा बचाती है।
भारत में इथेनॉल उत्पादन की वर्तमान स्थिति: भारत में इथेनॉल पहले गन्ना मुख्य स्रोत था, लेकिन अब अनाज (खासकर मक्का) से अधिक इथेनॉल बन रहा है। साल 2023-24 में कुल इथेनॉल का 60% अनाज से और 40% गन्ने से आया। दोनों तरीके भारत के 20% इथेनॉल ब्लेंडिंग लक्ष्य (2025 तक) के लिए जरूरी हैं, लेकिन अनाज आधारित उत्पादन अधिक टिकाऊ और विविधता वाला विकल्प है। ऐसे में अब सरकार अनाज आधारित डिस्टिलरी को प्रोत्साहन दे रही है।
चावल (अनाज) से इथेनॉल vs गन्ना से इथेनॉल बनाने में प्रदूषण की तुलना
राजस्थान में चावल आधारित इथेनॉल प्लांट की योजना है, जो अनाज (ग्रेन-बेस्ड) श्रेणी में आता है। दोनों प्रक्रियाओं में मुख्य अंतर प्रदूषण के स्तर में है- गन्ना आधारित (मोलासेस) प्रक्रिया ज्यादा प्रदूषण फैलाती है, खासकर पानी और मिट्टी का। अनाज आधारित (जैसे चावल या मक्का) कम प्रदूषण वाली और पर्यावरण अनुकूल मानी जाती है।
प्रदूषण कौन ज्यादा फैलाता है?
गन्ना आधारित इथेनॉल बनाने में जल प्रदूषण (सबसे बड़ा) का खतरा है। दरअसल, इथेनॉल बनाने की प्रक्रिया में ‘स्पेंट वॉश’ (Spent_Wash) निकलता है। यह बहुत ही जहरीला और गहरे रंग का तरल पदार्थ होता है। यदि इसे बिना ट्रीट किए जमीन पर छोड़ दिया जाए या नहर में डाल दिया जाए, तो यह मीलों तक भूजल (Groundwater) और मिट्टी को बंजर बना सकता है। भारत में कई शुगर मिल्स/डिस्टिलरी से अनट्रीटेड एफ्लुएंट डिस्चार्ज के केस हैं, जो गंगा जैसी नदियों को प्रभावित करते हैं।
इस तरह की फैक्ट्रियों से वायु प्रदूषण भी होता है। बॉयलर चलाने के लिए यदि धान की भूसी (Rice husk) या कोयले का इस्तेमाल होता है, तो उससे राख (Fly ash) और धुआँ निकलता है। वहीं, किण्वन (Fermentation) की प्रक्रिया के कारण आसपास के 2-3 किलोमीटर के क्षेत्र में एक अजीब सी खट्टी गंध रह सकती है।
अनाज आधारित कम प्रदूषित: कम पानी लगता है (मक्का से ~2570 लीटर पानी प्रति लीटर इथेनॉल vs गन्ना से 3000+), और ज्यादातर प्लांट ZLD (Zero Liquid Discharge) होते हैं, ऐसे में कोई तरल कचरा बाहर नहीं निकलता। ठोस कचरा (DDGS) उपयोगी होता है। भारत में ग्रेन-बेस्ड प्लांट को सरकार ज्यादा प्रोत्साहन दे रही है क्योंकि ये पर्यावरण के लिए बेहतर हैं।
कचरे का निपटान कैसे होता है?
गन्ना आधारित: स्पेंट वॉश को बायोमेथेनेशन, कंसंट्रेशन (इवैपोरेशन) और इंसीनरेशन से ट्रीट करते हैं। नए नियमों से ZLD अनिवार्य है, लेकिन पुराने प्लांट में अक्सर अनट्रीटेड डिस्चार्ज होता है। बगासे (खोई) से बिजली बनती है।
अनाज आधारित: इवैपोरेशन और ड्राइंग से ठोस DDGS बनता है, जो चारा बनकर बिकता है। ZLD आसान होता है, कोई तरल प्रदूषण नहीं। राजस्थान जैसे सूखे इलाके में ये ज्यादा उपयुक्त।
कुल मिलाकर, राजस्थान में चावल आधारित प्लांट बेहतर विकल्प है क्योंकि कम पानी और प्रदूषण। लेकिन स्थानीय विरोध (हनुमानगढ़ में) ZLD होने के बावजूद पानी निकासी और हवा प्रदूषण की आशंका से है। सरकार ZLD सुनिश्चित करती है तो समस्या कम हो सकती है।
ZLD तकनीक क्या है?
ZLD का फुल फॉर्म है Zero Liquid Discharge (जीरो लिक्विड डिस्चार्ज)। यह एक उन्नत वेस्टवाटर ट्रीटमेंट तकनीक है जिसमें इंडस्ट्री से निकलने वाले वेस्टवाटर (गंदे पानी) का 100% ट्रीटमेंट किया जाता है, ताकि बाहर कोई लिक्विड वेस्ट न निकले। पूरा पानी रिसाइकल हो जाता है और बचा ठोस कचरा (सॉलिड्स) सुरक्षित तरीके से डिस्पोज किया जाता है।
यह तकनीक मुख्य रूप से पानी की कमी वाले इलाकों, सख्त पर्यावरण नियमों वाले देशों (जैसे भारत) और प्रदूषण करने वाली इंडस्ट्रीज (डिस्टिलरी, टेक्सटाइल, केमिकल, फार्मा, शुगर मिल्स) में इस्तेमाल होती है। भारत में CPCB (सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड) ने कई इंडस्ट्रीज के लिए ZLD अनिवार्य कर दिया है, खासकर इथेनॉल डिस्टिलरी में।
ZLD क्यों जरूरी है?
- पर्यावरण संरक्षण: नदियों, झीलों या जमीन में गंदा पानी नहीं जाता।
- पानी की बचत: 95-99% पानी रिसाइकल होकर दोबारा इस्तेमाल होता है।
- संसाधन रिकवरी: कचरे से नमक, केमिकल या फर्टिलाइजर जैसे उपयोगी पदार्थ निकाले जा सकते हैं।
- कानूनी अनुपालन: भारत में कई राज्यों में ZLD प्लांट लगाना अनिवार्य है।
ZLD प्रक्रिया से प्रदूषण कैसे किया जा सकता है कम
ZLD सिस्टम आमतौर पर कई स्टेज में काम करता है। हर इंडस्ट्री के वेस्टवाटर के हिसाब से थोड़ा बदलाव होता है, लेकिन बेसिक फ्लो ऐसा है-
प्री-ट्रीटमेंट (Pretreatment): वेस्टवाटर से बड़े कण, तेल, ग्रीस या सस्पेंडेड सॉलिड्स हटाए जाते हैं। इसमें फिल्ट्रेशन, सेडिमेंटेशन या केमिकल ट्रीटमेंट (जैसे pH एडजस्टमेंट) होता है।
बायोलॉजिकल ट्रीटमेंट: ऑर्गेनिक मैटर (BOD/COD) को बैक्टीरिया से ब्रेकडाउन किया जाता है। इथेनॉल डिस्टिलरी में स्पेंट वॉश का यह स्टेज महत्वपूर्ण है।
मेम्ब्रेन टेक्नोलॉजी (RO/Ultrafiltration): रिवर्स ऑस्मोसिस (RO) या अल्ट्राफिल्ट्रेशन से नमक और अशुद्धियाँ अलग की जाती हैं। इससे 70-90% साफ पानी निकलता है (परमिएट) और कंसंट्रेटेड ब्राइन बचता है।
इवैपोरेशन (Evaporation): बचे कंसंट्रेट को मल्टी-इफेक्ट इवैपोरेटर (MEE) से गर्म करके पानी उड़ाया जाता है। इससे और पानी रिकवर होता है।
क्रिस्टलाइजेशन या ड्रायिंग: आखिरी स्टेज में बचा गाढ़ा ब्राइन क्रिस्टलाइजर या स्प्रे ड्रायर से ठोस नमक/सॉलिड्स में बदल दिया जाता है। कोई लिक्विड नहीं बचता।
इथेनॉल डिस्टिलरी में खास: गन्ना आधारित में स्पेंट वॉश बहुत प्रदूषित होता है, इसलिए बायो-मेथेनेशन के बाद MEE + क्रिस्टलाइजर इस्तेमाल होता है। अनाज आधारित में DDGS बनता है, जो आसान ZLD देता है।
भारत में कई कंपनियाँ जैसे Uttam Energy, Alfa Laval, Saltworks ZLD प्लांट बनाती हैं, खासकर इथेनॉल प्लांट्स के लिए। ZLD पर्यावरण के लिए बेहतरीन है, लेकिन सही डिजाइन और ऑपरेशन जरूरी है। राजस्थान जैसे सूखे इलाकों में इथेनॉल प्लांट्स के लिए यह परफेक्ट सॉल्यूशन है।
उद्योग बंद करना समस्या का हल नहीं
बहरहाल, इथेनॉल फैक्ट्री हो या कोई भी फैक्ट्री, भारत में प्रदूषण को लेकर नियम कागजों पर बहुत सख्त हैं, लेकिन धरातल पर उनका पालन कई कारकों पर निर्भर करता है। चूँकि भारत सरकार इथेनॉल ब्लेंडिंग (ई-20 पेट्रोल) पर बहुत जोर दे रही है, इसलिए इन प्लांट्स पर केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) की सीधी निगरानी रहती है।
वैसे, आजकल ‘ऑनलाइन मॉनिटरिंग सिस्टम’ (OCEMS) लगे होते हैं जो सीधे बोर्ड को डेटा भेजते हैं। कई बार स्थानीय अधिकारी रात के समय या भारी बारिश के दौरान निगरानी में ढिलाई बरतते हैं, उस समय कुछ फैक्ट्रियाँ गंदा पानी छोड़ देती हैं। ZLD प्लांट और ESP को चलाने का खर्च (बिजली और केमिकल) बहुत ज्यादा होता है। मुनाफा बढ़ाने के लिए कभी-कभी मालिक इन मशीनों को बंद कर देते हैं।
हालाँकि फैक्ट्री का विरोध करने की बजाय, स्थानीय लोगों और जागरूक नागरिकों की एक ‘निगरानी समिति’ होनी चाहिए जो यह सुनिश्चित करे कि फैक्ट्री से गंदा पानी बाहर न निकले और रोजगार में स्थानीय युवाओं को प्राथमिकता मिले। उद्योग बंद करना समस्या का हल नहीं है, लेकिन नियमों का पालन न करना एक अपराध है। दोनों के बीच का संतुलन ही सही विकास है।
चूँकि कॉन्ग्रेस की विध्वसंक नीतियों के चलते अब फैक्ट्री बंद हो गई, तो ये राजस्थान के विकास और उद्योग के लिए बड़ा झटका है। एक फैक्ट्री आने के बाद 10 और फैक्ट्रियाँ भी आती। हनुमानगढ़ एक इंडस्ट्रियल हब बन सकता था, लेकिन कॉन्ग्रेस की राजनीति की वजह से पूरे राजस्थान को झटका लगा है। इस प्रोजेक्ट के बाहर जाने से दूसरे कई प्रोजेक्ट भी नहीं आएँगे।












