जमीन पर थे कई मुश्किल मोर्चे, पर अमित शाह की रणनीतियों से सब हुए ढेर: पहले बागियों को मनाया, फिर विरोधियों को चटाई धूल


केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह

2014 के लोकसभा चुनाव से पहले जब भारतीय जनता पार्टी ने उत्तर प्रदेश के चुनाव की कमान अमित शाह के हाथों में सौंपी थी तो बहुत से जानकारों ने इसे एक खतरनाक दाँव माना था। UP की सामाजिक संरचना, जातीय समीकरण और दशकों से चली आ रही राजनीतिक खेमेबंदियों के बीच BJP के लिए पैठ बनाना आसान नहीं था।

मगर शाह के लिए यह चुनाव उन्हें चाणक्य बनाने वाला साबित हुआ। 2014 में यूपी के लोकसभा चुनाव के नतीजों ने साबित कर दिया कि वो संगठन के असल रणनीतिकार और जमीनी राजनीति के प्रबंधन के मास्टर हैं। बिहार के नतीजों ने इस पर एक बार फिर मुहर लगा दी है।

बिहार को समझना किसी भी नेता के लिए आसान नहीं रहा है। यहाँ का सामाजिक परिवेश, अलग-अलग इलाके के लोगों की अलग महत्वाकाँक्षाएँ और मानसिकता के साथ-साथ स्थानीय राजनीति को समझकर लोगों को भरोसा जीतना बिल्कुल आसान नहीं है। बिहार को भी उसी तरह से समझने, बूछने और लोगों भरोसा जीतने में अमित शाह को 11 वर्ष लगे लेकिन जब उन्होंने यह भरोसा जीता है तो तमाम जानकार और रणनीतिकारों के गणित को ध्वस्त कर दिया।

जो कर रहे थे बगावत वही बनाए गए जिम्मेदार

इस चुनाव में यह सही है कि JDU के लिए मैदान कुछ हद तक अनुकूल था। नीतीश कुमार को लेकर सहानुभूति थी, मोदी की लोकप्रियता थी, महिलाओं को 10,000 रुपए दिए जाने और वृद्धावस्था पेंशन बढ़ाए जाने का असर था। मगर बीजेपी के लिए यह लड़ाई कहीं से आसान नहीं थी। कई सीटों पर बगावत, कुछ जगहों पर भीतरघात को लेकर असमंजस की स्थिति थी और यहीं काम आया अमित शाह का चुनावी अनुभव।

चुनाव प्रचार शुरू होने से पहले उन्होंने पहला बड़ा काम किया बागियों को मनाने का, जहाँ कुछ लोगों ने चुनाव लड़ने का मन बना लिया था उम्मीदवारी वापस कराई और भीतरघात का खतरा लगभग खत्म कर दिया। खास बात यह थी कि जब बागी मान गए तो शाह ने उन्हें किनारे नहीं किया बल्कि अपने ही इलाके की चुनावी जिम्मेदारी देकर उन्हें सक्रिय भूमिका में रखा। इससे संगठन में ऊर्जा भी बढ़ी और अनुशासन भी मजबूत हुआ।

सिर्फ बड़ी सभाएँ नहीं छोटी-छोटी बैठकों से बनाई रणनीति

चुनाव अभियान के बीच में भी जहाँ अमित शाह को लगा कि इस इलाके में नेतृत्व को बदला जाना जरूरी है तो वहाँ प्रचार के बीच ही उन्होंने कमान हाथों-हाथ बदली। शाह को किसी फैसले को टालने या लंबा खींचने की आदत नहीं है। हर सीट की अलग प्रकृति, अलग संरचना और अलग चुनौतियों को देखते हुए उन्होंने ताबड़तोड़ फैसले लिए।

चुनाव अभियान के दौरान भी जब वह किसी इलाके में गए तो केवल सभा तक ही सीमित नहीं रहे, वे जहाँ भी जाते सुबह सबसे पहले प्रबुद्ध वर्ग, स्थानीय कार्यकर्ताओं और जमीन से जुड़े लोगों की अलग-अलग बैठकें लेते। यह सिर्फ फॉर्मेलिटी नहीं होती थी बल्कि इससे जो फीडबैक मिलता, उसके आधार पर उसी दिन रणनीति में बदलाव भी कर देते।

देर रात तक समीक्षा बैठकें करते शाह

दिन में रोड शो, सभाएँ, रैलियाँ और देर रात सीट-दर-सीट समीक्षा, चुनावों के बीच शाह का यह सिलसिला लगातार चलता रहा। उन्होंने इन दर रात तक चलने वाली बैठकों में सिर्फ आँकड़े नहीं जुटाए बल्कि हर संभावित बदलाव, हर नए मौके और विपक्ष की गतिविधियों का बारीकी से विश्लेषण किया था। इसके आधार पर फैसले लिए और धीरे-धीरे पार्टी के लिए जमीन मजबूत होती गई।

मिथिला-कोशी इलाके में बनाई खास रणनीति

बीजेपी के लिए बिहार का सबसे मुश्किल इलाका मिथिला-कोशी रहा है। दरभंगा, मधुबनी, सीतामढ़ी जिलों में वर्षों से बीजेपी के भीतर उठापटक चल रही थी लेकिन शाह ने इस चुनौती से दूरी नहीं बनाई। उन्होंने यहाँ डेरा डाल दिया। कई दिनों तक वहीं रहे, स्थानीय नेताओं को साथ बैठाया और उनके बीच के मतभेद दूर कराए। इसके साथ ही, बूथ स्तर की टीमों को दुरुस्त किया और यह स्पष्ट संदेश दिया कि संगठन का अनुशासन सर्वोपरि है।

उनका लक्ष्य केवल चुनाव जीतना नहीं था बल्कि संगठन को स्थायी रूप से मजबूत करना था। उनके इस प्रयास का असर यह हुआ कि चुनाव के नतीजों में बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभर रही है। 101 सीटों पर चुनाव लड़ी बीजेपी 90 के करीब सीटें जीतता दिख रही है। शाह की मेहनत, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का प्रभाव और नीतीश की साख ने NDA को अभेद्य किला बना दिया है।

Source link

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top