बिहार में नार्वे की दिलचस्पी क्यों?
भारत में नॉर्वे की राजदूत एलिन स्टेनर ने राजनीतिक रणनीतिकार से राजनेता बने प्रशांत किशोर से पटना में उनके आवास पर बैठक की है। देखने में यह एक सामान्य कूटनीतिक मुलाकात लग सकती है। लेकिन नॉर्वे के इतिहास और बिहार के लिए प्रशांत किशोर की महत्वाकांक्षा को देखते हुए कई राजनीतिक जानकार इस मुलाकात की जाँच कराने की माँग कर रहे हैं।
Pleased to meet @PrashantKishor and hear about his ambition for #Bihar and the newly founded @jansuraajonline party. pic.twitter.com/c0d8VO7Jrj
— Ambassador May-Elin Stener (@NorwayAmbIndia) July 7, 2025
अलग-अलग राजनीतिक दलों के लिए चुनावी रणनीतियाँ बनाने वाले प्रशांत किशोर अब जन सुराज पार्टी बना कर बिहार के चुनावी राजनीति में पैर जमाने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में ये मुलाकात कहीं बिहार से संबंधित तो नहीं है? क्या किसी इंटरनेशनल संगठन की बिहार में विशेष रुचि हैं? ये भारत की अस्थिर करने की साजिश तो नहीं? या बिहार में निवेश को लेकर प्रशांत किशोर गंभीर हो रहे हैं, हालाँकि उन्होंने पहले ही कह दिया है कि बिहार को किसी बड़े कारखाने की जरूरत ही नहीं है। इस दौरान उन्होंने नार्वे के विकास की बात भी कही थी।
तो क्या निवेश और पर्यावरण के नाम पर अब प्रशांत किशोर को नार्वे अपने एजेंडे के तहत सेट कर रहा है? प्रशांत किशोर को बिहार का अभिजात्य वर्ग भी पसंद कर रहा है। ऐसे में प्रशांत किशोर के सहारे अनौपचारिक किंगमेकर बनने की कोशिश नार्वे कर सकता है, ताकि भारत के संघीय ढाँचे को नुकसान पहुँचाया जा सके। कई लोग तो प्रशांत किशोर और उनकी पार्टी की विदेशी फंडिंग की जाँच की माँग भी कर रहे हैं।
रामलीला मैदान से शाहीन बाग तक हुई विदेशी फंडिंग
ये पहली बार नहीं है जब विदेशी फंडिंग को लेकर चर्चा हो रही है। दिल्ली के रामलीला मैदान में हुआ अन्ना आंदोलन और उससे निकलने वाली आम आदमी पार्टी और पूर्व सीएम अरविंद केजरीवाल के विदेशी फंडिंग की जाँच सरकार कर रही है। ED ने आम आदमी पार्टी को 2014 से 2022 के बीच 7.08 करोड़ रुपए का विदेशी फंड मिलने की जानकारी गृहमंत्रालय को दी थी। इसमें अमेरिका,कनाडा, सऊदी अरब, यूएई से लेकर कई यूरोपीय देश शामिल हैं। कहीं ऐसा तो नहीं है कि अब केजरीवाल का ग्राफ नीचे जाते ही प्रशांत किशोर विदेशियों के लिए नए विकल्प के रूप में सामने आ रहे हैं।
इससे पहले सीएए के खिलाफ देशभर में हुई हिंसा और शाहीन बाग आंदोलन में विदेशी ताकतों का हाथ होने की बात सामने आई। ईडी ने साफ तौर पर पीएफआई की फंडिंग की बात की थी। इतना ही नहीं पीएफआई से कॉन्ग्रेस और आम आदमी पार्टी के संपर्क की बात भी ईडी ने कही थी।
किसान आंदोलन में विदेशी फंडिंग की जाँच
यही हाल किसान आंदोलन और महिला पहलवानों के विरोध का भी रहा। केन्द्र सरकार ने अमेरिकन अरबपति जॉज सोरोस के नेतृत्व वाला ऑपन सोसाइटी फाउंडेशन पर आंदोलन को आर्थिक मदद करने का आरोप लगाया था। आंदोलन का मकसद भारत की आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करना और देश को अस्थिर करना था। किसान आंदोलन का नेतृत्व करने वाले राकेश टिकैत पर खुद उनके सहयोगियों ने भी विदेशी फंडिंग का आरोप लगाया था।
भारत के आंतरिक मामलों में दिलचस्पी
नॉर्वे ने भारत-पाकिस्तान के बीच कश्मीर को लेकर खुद को ‘तटस्थ’ बताते हुए मध्यस्थता का प्रस्ताव दिया था। लेकिन भारत ने इसे सिरे से खारिज कर दिया क्योंकि कश्मीर मामले में ‘बाहरी हस्तक्षेप’ हमें कभी कबूल नहीं रहा। अब बिहार के बहाने भारत में फिर से दिलचस्पी लेना एक पूर्वनियोजित रणनीति का हिस्सा लगता है।
क्या है डीप स्टेट?
डीप स्टेट खुफिया तंत्रों सीआईए, एफबीआई जैसे अमेरिकन इंटेलिजेंस एजेंसी का नेटवर्क है। इनमें दुनिया के सरकारी और गैर सरकारी अभिजात्य वर्ग शामिल हैं, जो लोकत्रांतिक रूप से चुनी गई सरकार से ज्यादा ताकतवर है। ये दुनिया के किसी भी कोने में सरकारों को बनाने- गिराने का माद्दा रखती है।
ओस्लो का डीप स्टेट के साथ रिश्ता काफी गहरा है। नाटो के साथ उसका ऐतिहासिक समझौता है और डीप स्टेट का सेंटर ऑस्लो में है। दुनिया का सबसे बड़ा हथियार निर्यातक देश नॉर्वे हर हाल में सीआईए को भी सूट करता है।
डीप स्टेट का टूलकिट
नॉर्वे की सोच और उसका ‘इंटरनेशनल लगाव’ जगजाहिर है। खास पैटर्न को अपनाते हुए ये लोग पहले उन क्षेत्रों की पहचान करते हैं जिन्हें पहले से ही अस्थिर या असफल माना जाता है, जैसे- लीबिया, इथियोपिया, कोलंबिया या बिहार, भारत। एक बार लक्ष्य तय होने के बाद ये अपनी ‘ऑयल फंड’ का इस्तेमाल करते हैं। इसके लिए गैर-सरकारी संगठनों, खास दलों और विदेशी सहायता से कार्यक्रमों का आयोजन करते हैं ताकि स्थानीय स्तर पर प्रभाव बढ़ाया जा सके।
नॉर्वे रहा है टूलकिट का हिस्सा
नॉर्वे प्रगतिशील और निष्पक्ष, मानवाधिकार की बात करने वाले देश होने की बात करता है लेकिन इसकी विदेश नीति लोकतंत्र को बढ़ावा देने की आड़ में बार-बार संप्रभु राष्ट्रों को अस्थिर करने की रही है। श्रीलंका में लिट्टे जैसे संगठन का समर्थन कर सालों तक देश को अस्थिर रखा गया। वही हाल लीबिया, इथियोपिया, सीरिया, कोलंबिया जैसे देशों का हुआ।
लीबिया में हस्तक्षेप की बात नॉर्वेजियन अधिकारियों ने खुद स्वीकार किया है। 2011 में गद्दाफी को हटाने के लिए नाटो अभियान में नॉर्वे शामिल हुआ। उसने 596 हमले किए और 588 बम गिराए। इसका नतीजा ये रहा कि आतंकवाद और अराजकता से घिरा एक ऐसे राष्ट्र के रूप में लीबिया सामने आया जहाँ की स्थिति बद से बदत्तर होती चली गई। खुद नार्वे ने माना कि “गर्व करने लायक फैसला नहीं था”।
नॉर्वे के विदेशी कारनामे किसी से छिपे नहीं हैं। ओस्लो में “डीप स्टेट” मशीनरी का इस्तेमाल कर इसे आसान बनाया जाता है। इस मशीनरी में नाटो, अमेरिकी खुफिया विभाग और ऑपरेशन ग्लैडियो जैसे खुफिया नेटवर्क शामिल हैं।
नॉर्वे दुनिया का सबसे बड़े हथियार निर्यातक देशों में शामिल है और उसने हाल के युद्धों में अमेरिका और इज़राइल को छोड़कर बाकी सभी देशों से ज्यादा हिस्सा लिया है।
तेल का हथियार के रूप में इस्तेमाल
नॉर्वे का 1.4 ट्रिलियन डॉलर का सॉवरेन ऑयल फंड उसे मजबूत बना रहा है। ये मुनाफा रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान यूरोप के ऊर्जा संकट से हुए रिकॉर्ड “युद्ध मुनाफ़े” पर आधारित है। क्योंकि कई देशों ने रूस से ऑयल खरीदना बंद कर दिया था। इसका फायदा नॉर्वे को मिला।
सॉवरेन ऑयल फंड की वैल्यू दुनिया में दखलंदाजी के लिए काफी है। इसने क्लिंटन फाउंडेशन, बिल गेट्स की परियोजनाओं और नाटो से जुड़े दुनिया के कई देशों में शासन बदलने की कोशिशों में लगे संगठनों को मदद करता है। यही वजह है कि अर्थशास्त्री अब नॉर्वे से आग्रह कर रहे हैं कि वह इस फंड का उपयोग यूक्रेन की आर्थिक मदद के लिए करे।
प्रशांत के बहाने बिहार आएगा ‘ऑयल फंड’
दिल्ली में केजरीवाल सरकार का जाना, आम आदमी पार्टी का कमजोर पड़ना और शाहीन बाग- किसान विरोध जैसे आंदोलन के नहीं चलने के बाद अब डीप स्टेट टूलकिट के जद में प्रशांत किशोर आ गए हैं। ये टूलकिट ऐसे लोगों की तलाश करते हैं जो महत्वाकांक्षी हो, जमीन पर दिख रहा हो और जिसे मिला कर ‘अनौपचारिक किंगमेकर’ बन सकें।
खास बात ये हैं कि ये टूलकिट ऐसे प्रयासों को किसी देश के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं मानते बल्कि लोकतंत्र या मानवीयता के लिए ‘जरूरी’ मानते हैं। इस सोची-समझी रणनीति का खुलासा नॉर्वे के पूर्व प्रधानमंत्री जेन्स स्टोलटेनबर्ग (अब नाटो महासचिव) ने लीबिया के संबंध में किया था- “नॉर्वे लीबिया पर हमले में शामिल हुआ क्योंकि ‘यह नॉर्वेजियन वायु सेना के लिए एक अच्छा अभ्यास होगा’।”
प्रशांत किशोर और नार्वे के राजदूत के बीच बैठक महज कूटनीतिक नहीं है। ये भारत को अस्थिर करने की रणनीति का हिस्सा है। इसके लिए तरह- तरह से फंडिंग कर चुनाव को अपने पक्ष में मोड़ने की कोशिश किए जाने का अंदेशा है। इसलिए भारत को सभी गैर-सरकारी संगठनों को होने वाली फंडिंग का ऑडिट करना चाहिए।
बिहार का भविष्य बिहारियों द्वारा तय किया जाना चाहिए। एक खरब डॉलर वाले डीप टूलकिट स्टेट इसको तय नहीं कर सकते। नॉर्वे आर्कटिक तेल के भंडार का खनन करते हुए भारत को जलवायु परिवर्तन पर उपदेश दे रहा है। इसकी संपत्ति उन्हीं जीवाश्म ईंधनों से आती है जिसको बचाने और जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए दुनिया को वह ‘सचेत’ कर रहा है।